बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६३ स्वस्वाष्टवर्गे यदि वेदहीनाः क्लेशाय सौख्यायच वेदपुष्टाः ॥४८॥ इससे अधिक हो तो उत्तम बल होता है इसमें शरीर का सुख, धन और यश का लाभ होता है। अपने-अपने अष्टक वर्ग में ४ से अल्प रेखा हो तो कष्टकारक और ४ से अधिक हो तो सुखकारक होता है।।४८।। मध्यात्फलाधिके लाभो मध्यात्क्षीणफलेव्ययः । यस्य रेखाधिकं लग्नं भोगवानर्थवान् भवेत् ॥४९॥ दशम भाव की रेखा से लाभ भाव की रेखा अधिक हो और इससे अधिक लग्न की रेखा हो तो जातक के भोगसम्पत्ति की हानि होती है। यदि दशम भाव के फल से लाभभाव की रेखायें अधिक हों और दशम भाव की रेखा से व्यय भाव की रेखा अल्प हो और लग्न की रेखायें अधिक हो तो वह जातक भोगवान् और धनी होता है।।४९।। प्रादक्षिण्यादिभानां सकलफलयुतिं दिक्चतुष्कक्रमेण कृत्वात्तद्भागतो यः समदधिकफलतः शोभनं हानिमल्पात्। सौम्यां स्वोच्चस्वगेहोदितखचरयुते दिग्विभागे स्वकार्ये वित्तेशाशासु वित्तं मृतिपतिगतदिग्भागगे देहनाशः।।५०।। लग्नादि द्वादश भावों की तीन-तीन राशियां पूर्व से दक्षिण क्रम से (सव्य गणना से) पूर्वादि दिशा कल्पना करना अर्थात् लग्न व्यय, लाभ भाव को पूर्व दिशा में, दशम, नवम, अष्टम भाव को दक्षिण दिशा में, सप्तम, षष्ठ, पंचम भाव को पश्चिम दिशा में और चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय भाव को उत्तर दिशा में कल्पना करके प्रत्येक दिशा के भावों के संपूर्ण फलों का योग करके विचार करना जिन-जिन दिशाओं में अल्पफल हो उन-उन दिशाओं में हानि होती है।।५०।। अथ भावफलम्। भावं विलोक्य सदसत्फलदायकंयत्तद्राशि संभवफलैश्च तदुक्तपिंडम् । पिंडे रेखा ताडिते भावशेषे राशौ तस्मिन्याति सौरिः समायाम् ॥५१॥