भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 676

६६४ | बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । शुभ-अशुभ फल देने वाले भाव के फल को पूर्वोक्त लग्नपिंड से गुणाकर २७ का भाग देने से शेष राशि में जब शनि जाता है।।५१।। यस्यां तद्भावहानिं च विद्यात्राहूर्वशेऽथवा तत्रिकोणे । कृत्वा विन्दुभ्यस्तु कालं सुधीमांस्तस्माद्वाच्यः प्राप्तिकालः शुभत्वे ।।५२।। तब उस भाव जनित फल की हानि होती है। लग्नपिंड को भावफल से गुणाकर उसमें १२ का भाग देने से शेष राशि में जिस वर्ष शनि जाता है अथवा उसके त्रिकोण राशि में जब शनि जाता है तब उस भाव की हानि होती है।।५२।। अथ समुदायाष्टकवर्गफलम् – सर्वकर्मफलोपेते ह्यष्टवर्ग उच्यते । अन्यथा फलविज्ञानं दुर्गमं गुणदोषजम् ।।५३।। सभी कर्मों के फल के उपयुक्त अष्टकवर्ग होता है, अन्यथा फल विज्ञान दुर्गम और दोषपूर्ण होता है।।५३।। त्रिंशाधिकफलाये स्युः राशयस्ते शुभप्रदाः । त्रिंशांतं पंचविंशादि राशयो मध्यमाः स्मृताः ।।५४।। जो राशि ३० से अधिक फल वाली हैं वह शुभफलद होती है, २५ से ३० तक फलवाली मध्यम फल वाली होती है।।५४।। अतिक्षीणफला ये च राशयः कष्टदुःखदाः । श्रेष्ठराशिषु सर्वेषु शुभकार्याणि कारयेत् ।।५५।। और अत्यन्त क्षीण फल वाली जो राशि होती है वह कष्ट और दुःख देने वाली होती है। जो श्रेष्ठ फल देने वाली राशियाँ हैं उन सभी में शुभकर्मों को करना चाहिये।।५५।। श्रेष्ठात्राशीन्मुहूर्तेषु योजयेन्मतिमान्नरः । तत्तज्जन्मप्रभावास्तु पुंसस्तैः सार्धमाचरेत् ।।५६।।