भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६५ और श्रेष्ठ राशियों को मुहूर्तों में योजित करना चाहिये।।५६।। लग्ने यावत्फलं चास्ति तद्दशायां फलं वदेत् । मूर्त्यादिव्ययपर्यन्तं दृष्ट्वा भवफलानि वै ।।५७।। लग्न में जो फल होता है वही दशा का फल होता है, लग्न से व्यय पर्यन्त प्रत्येक भाव के फल को देखे।।५७।। अधिके शोभनं विद्यात्क्षीणे हीने च मृत्यवे । मध्यमे मध्यमं चैव विचार्यैवं फलं वदेत् ।।५८।। जिस भाव का फल अधिक हो वह शुभफलदायक, न्यून अथवा शून्य फल वाले भाव कष्टकारक होते हैं और मध्यम फलवाले मध्यम होते हैं यह विचार कर फल को कहे।।५८।। मेषादियद्गृहगता वसुसंख्ययातास्तद्भाव- पुष्टिवलवृद्धिकरा भवंति । षट्पंचसप्तसहितानि शुभप्रदानि त्रिव्येक- कर्णयुतभानि न शोभनानि ।।५९।। मेषादि जिस राशि में ८ रेखा हो उस राशि के भाव का फल शुभ और वृद्धि कारक होता है। ६।५।७ रेखा से युक्त हो तो शुभप्रद होता है और ३, २, १ रेखा वाले शुभद नहीं होते हैं।।५९।। मिश्रंफलंभवतिसागरकर्णयोगे रोगापवादभयदा यदि शून्यभावाः । एकादिकर्णयुतभानुमुखग्रहाणां भिन्नाष्टवर्गजनि सर्वफलं प्रवच्मि ।।६०।। और ४ रेखा से युक्त भाव मिश्रित फल को देने वाला होता है और शून्य रेखा वाला भाव रोग कलंक और भय देने वाला होता है, यह एकादि रेखा का सूर्यादि ग्रहों का फल भिन्नाष्टक वर्ग से कहा जाता है।।६०।। रेखाशान्तिफलम् - रेखाभिः सप्तभिर्युक्ते मासे मृत्युर्भवेन्नृणाम् । सुवर्ण विंशति पलं दद्याद्वौ तिलपर्वतौ ।।६१।।