बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२२, बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ षष्ट्यंश फलम् - अध्यापकस्तु वेदानां सेवकः शास्त्रपाठकः ।।१९०९।। यदि विषम लग्न हो तो क्रम से वेद का अध्यापक १, सेवक २, शास्त्र पढ़ाने वाला ३।।१९०९।। अश्वसादीभसादी च लिपिलेखनतत्परः । मदुरावंधको नट्यौ देशिको याज्ञिको गुरुः ।।१९१०।। घोड़सवारी में कुशल ४, हाथी के कार्य में कुशल ५, पुस्तकादि लिखने में कुशल ६, घोड़े के शाला का अधिकारी ७, वाचक ८, पाठशाला में पढ़ाने वाला ९, यज्ञ करने वाला १०, गुरु ११।।१९१०।। दानशीलस्तु तृणको ग्रामणीर्व्यसनाधिपः । आरामकरणोद्युक्तः पुष्पविक्रयतत्परः ।।१९११।। दानशील तृण बेचने वाला १३, ग्राम प्रधान १४, व्यसन का अधिकारी १५, बाग लगाने में कुशल १६, फूल माला बेचने वाला।।१९११।। राजकार्यरतः सेनालतापुष्पफलक्रयी । नृत्यगीते च कुशलस्ताम्बूलफलविक्रयी ।।१९१२।। राजकर्मचारी १८, फल-फूल खरीदने वाला १९, नाचगाने में प्रवीण २०, पान बेचने वाला २१।।१९१२।। निषिद्धविक्रयकरो ग्रामाणामधिकारकृत् । वंदी च देशिकः प्राज्ञो धूपकश्चौषधिक्रियः ।।१९१३।। निंदित पदार्थ बेचने वाला, २२ ग्राम का अधिकारी २३, राज कर्मचारी २४, देशिक २५, बुद्धिमान् २६, धूप बेचने वाला २७, दवा बेचने वाला २८।।१९१३।। कायस्य करणोद्यक्तो भारको भांडविक्रयी । कृषिकृच्च वणिग्धातुचर्मकारी च कर्षकः ।।१९१४।। बहुरूप धारण करने वाला २९, भार ढोने वाला ३०, बर्तन बेचने वाला ३१, खेती करने वाला ३२, वैश्य वृत्ति करने वाला ३३, धातुचर्म का व्यापारी ३४, कृषक ३५।।१९१४।।