बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२३ शास्त्राधिकारी विज्ञानी पुस्तकोरंजकोवणिक् । वेदवेदांगवेत्ता च शास्त्रज्ञोवंदिपाठकः ।।११५।। शास्त्राधिकारी ३६, विज्ञान को जानने वाला ३७, पुस्तक का संग्राही ३८, रंगने वाला ३९, वैश्य वृत्ति करने वाला ४०, वेदवेदांग को जानने वाला ४१, शास्त्र को जानने वाला ४२।।११५।। ग्रामणीरधिकारी च गणको दंडकारकः । भारकश्चेंधनाहारी फलमूलादिविक्रयी ।।११६।। ग्राम प्रधान ४३, अधिकारी ४५, गणक ४६, दंड देने वाला ४७, भारक ४८ ईंधन का व्यापारी ४९, फल फूल बेचने वाला ५०।।११६।। शांतकृत्स्वर्णकारी च कृषिकृत्पलविक्रयी । याजकोऽध्यापकोऽध्यक्षःप्रतिग्रहपरः फली ।।११७।। शांतिस्थापन करने वाला ५१, सुनार का काम करने वाला ५२, खेती करने वाला ५३, मांस बेचने वाला ५४, यज्ञ करने वाला ५५, अध्यापक ५६, अध्यक्ष ५७, दान लेने वाला ५८, फल बेचने वाला ५९।।११७।। क्रमाद्व्युत्क्रमतश्चैव षष्ठिः स्यादंशकेषु च । कुछ भी काम न करने वाला ६० होता है, और समराशि में जन्म हो तो विलोम से फल जानना चाहिये। षष्ठ्यंश के विशेषः- रवीशहरिविष्णीशदुर्गागणपतिष्वथ ।।११८।। षष्ठ्यंश के दो दो अंशों को एक साथ करने से ३० होते हैं इस क्रम से जिस अंश में जन्म नक्षत्र हो उसका फल क्रम से रवि १, ईश २, हरि ३, विष्णु ४, हिरण्यगर्भ ५, दुर्गा ६, गजपति ७।।११८।। चंडिकायां च चंडेश चंद्रविष्णावीशपावके । त्रिपुराचेंदिराविष्णुहरिशंकरशंभुषु ।।११९।। चंडिका ८, चंड ९, महादेव १०, चंद्र ११, विष्णु १२, ईश १३, अग्नि १४, त्रिपुरा १५, इंदिरा १६, विष्णु १७, हरि १८, शंकर १९, शम्भु २०।।११९।। क्षेत्रेशे गुरुडेस्कंदे शास्तरिब्रह्माणीश्वरे । विषापहरणोद्युक्ते जिने बुद्धे क्रमात्तथा ।।१२०।।