बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२५ शूलाशनिक्षतजपित्तसमावृतानि शीतज्वरप्रभृतिराशिवशात्क्रमेण ।।१२५।। शूल वज्रपातादि से १०, पित्तरोग से ११, शीतज्वरादि से १२ मृत्यु होती हैं।।१२५।। अथ कालादि सूर्य्यान्त चतुर्दशग्रहाणामंशेन मृत्युज्ञानम् – कालादिरव्यंतखगोक्तजाता चेद्दुर्गपातपतनज्वरसन्निपातात्। गोपातसत्वजनिता च मृतिः क्रमेण वामेन चापि पुनरेवमथांशकेषु।। काल आदि १४ ग्रहों के क्रम से दुर्गपात से १, पतन से २,.ज्वर ३, सन्निपात से ४, बैल से ५, पतन से ६, प्राणि निमित्त से ७।८, पतन से १३, दुर्गपात से १४ मृत्यु होती है।।१२६।। अथ रश्मिद्वारा वर्षानयने हरांशज्ञानम् – आचतुर्थात्खभूतानि त्रयोद्वादश हारकौ । अथस्यादष्टमात्षष्ठिः पंचाष्टौ दशमात्ततः ।।१२७।। पञ्चपञ्चाशदकाःस्युस्त्रयोरत्नानि हारकाः । एकादशेऽष्टषष्ठिःस्यात्सप्तकाष्ठाश्च हारकाः ।।१२८।। त्रयोदशे च तानाः स्युर्द्विसप्ततिरथो मनौ । रश्मयः पंचदश चेत्पंचसप्ततिरेव च ।।१२९।। वेदपंचरसा हारो दशरुद्राश्च रश्मयः । आत्रिंशतः क्रमादंका अशीतिरथ सप्ततिः ।।१३०।। खेषवः खाब्धयः खाद्रिवेदसप्ततिः । षष्ठीरुद्रादिरिष्टेषु पंचसप्ततिरिद्रियुक् ।।१३१।। रश्मि द्वारा वर्ष लाने के लिये हारक्यांक कहते हैं शेष चक्र से स्पष्ट है।।१२७- १३१।। एकाशीतिश्चतुर्युक्ता चत्वारिंशत्स्मृताःसमाः । सप्तांकरसतर्केषु नवाद्रिरसषट्कराः ।।१३२।।