बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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७२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । रश्मिवर्षहारज्ञानायचक्रम् –
| र. | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व. | ० | ० | ० | ५० | ५० | ५० | ५० | ६० | ० | ५५ | ६८ | ० | ४९ | ७५ | ७५ | ८० | ७० | ५० | ४० | ७ |
| हा. | ० | ० | ० | ३ | ३ | ३ | ३ | ५ | ० | ३ | ७ | ० | ७३ | ५४ | १० | ७ | ९ | ६ | ६ | ५ |
| हा. | ० | ० | ० | १२ | १२ | १२ | १२ | ८ | ० | ९ | १० | ० | ० | ६ | ११ | ० | ० | ० | ० | ० |
| रं. | २१ | २२ | २३ | २४ | २५ | २६ | २७ | २८ | २९ | ३० | ||||||||||
| व. | ७४ | ७४ | ६० | ७८ | ५८ | ७५ | ७७ | ८१ | ८५ | ४० | ||||||||||
| हा. | ९ | ७ | ६ | ६ | २ | ११ | १० | ९ | ६ | १२ | ||||||||||
| अथ अंशायुहारः- | ||||||||||||||||||||
| रुद्रा दिङ्नवतर्काकी अंकहाराः क्रमादमी । | ||||||||||||||||||||
| रुद्रार्कमनुविश्वेऽष्टिः सप्तांकेष्वर्कदिक्छराः ।।१३३।। | ||||||||||||||||||||
| ११।२३।१४।१३।१६।७।५९।१२।१०।५।५४।९०। ये ये अंशायुर्दाय | ||||||||||||||||||||
| के हार हैं।।१३३।। | ||||||||||||||||||||
| राशीनामशायुर्दाये हारः- | ||||||||||||||||||||
| वेदेषुवेदकांशाःस्युरंशहारा प्रकीर्तिताः । | ||||||||||||||||||||
| पंचानां च चतुर्णां च तत्तत्षण्णवतिःशतम् ।।१३४।। | ||||||||||||||||||||
| ५।४।६।९०।१०० ।।१३४।। | ||||||||||||||||||||
| दशरुद्रानखामूर्छा हाराःस्युःक्रमशःस्मृताः । | ||||||||||||||||||||
| शते रसार्कुरुद्राश्च दशविंशोत्तरं शतम् ।।१३५।। | ||||||||||||||||||||
| १०।११।२०।२१ ये क्रम से नवांशायुर्दाय के हार हैं शतायुर्दाय के क्रम | ||||||||||||||||||||
| से ६।१२।११।१०।१२० हार होते हैं।।१३५।। | ||||||||||||||||||||
| एते हाराःक्रमात्प्रोक्ताःकेषांचित्परमायुषः । | ||||||||||||||||||||
| केषांचिदनयोर्योगदलमाब्दाः षिशेषतः ।।१३६।। | ||||||||||||||||||||
| किसी के मत से हार शतायु के योग का करना वही वर्ष होता है।।१३६।। | ||||||||||||||||||||
| अथ पूर्वोक्तानां फल विचारः- | ||||||||||||||||||||
| दशमं यावदायातःस्वकुटुम्बं विभर्त्ति च । | ||||||||||||||||||||
| कृच्छ्रेण दशमे पुत्रबाहुल्यानेकसंयुतः ।।१३७।। |