भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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: ७२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ग्रह हों तो मध्य अवस्था में और तीन ग्रह हों तो अंतिम अवस्था में दरिद्र होता है।।१४४।। योगान्तरम् - नवयोगा इमे प्रोक्तास्त्रिषुस्थानेषु रेकदाः । कर्कटाद्वृश्चिकान्मीनाच्चतुर्ष्वेव क्रमात्स्थिताः ।।१४५।। ये नवयोग तीन २ स्थानों के कहे गये हैं जो कि कर्क, वृश्चिक मीन राशि से आरंभ होते हैं।।१४५।। शत्रुगेहे स्थिताः पापा मध्येऽन्त्ये प्रथमे क्रमात् । सुखान्मृत्योर्व्ययात्पुत्राद्धर्माल्लग्नात्तथैव च ।।१४६।। कर्क राशि से ४ राशि के अन्दर पापग्रह हों और शत्रु राशि में हों तो मध्य अवस्था में योगफल होता है, वृश्चिकादि चार राशियों में हों तो अंत्य अवस्था में और मीनादि चार राशियों में हों तो प्रथम अवस्था में योग का फल होता है। इसी प्रकार ४।८।१२।५।९।१ भावों से भी योगों का विचार करना चाहिये।।१४६।। एवमक्षा यदि न्यूनाश्चाष्टवर्गसमुद्भवाः । केन्द्रेषु च त्रिकोणेषु शुभा उपचये परे ।।१४७।। केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (९।५) स्थानों में शुभ ग्रह हों और ३।६।११ स्थानों में पापग्रह हों।।१४७।। धनदेषु शुभांश्चान्ये परेषु च यदि स्थिताः । इष्टरश्मिफलाधिक्यैकश्च द्वौ च त्रयोपि वा ।।१४८।। धन स्थान में शुभग्रह हों इष्टरश्मि फल अधिक हो और उच्च मूल त्रिकोण राशि के एक, दो, तीन ग्रह हों।।१४८।। उच्चादि पंचकस्थाने नवांशेष्वेव वा यदि । लक्ष्मीयोगा इमे प्रोक्तास्सुहृद्दृष्टास्तथापरे ।।१४९।। अथवा उच्चादि के नवांश हों तो लक्ष्मी योग होता है।।१४९।। योगान्तरम् - रेके प्रोक्ताधिकालांशाः शुभारिःफाष्टषड्विना । उच्चौ द्वौ वा त्रयःकोणे चत्वारोऽतिसुहृत्स्थिताः ।।१५०।।