बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२९ रेखा आदि दरिद्रयोग में जो अधिक कालांश कहे हैं वे और १२।८।६ इन स्थानों को छोड़कर शेष स्थानों में उच्च त्रिकोण में हो के एक दो तीन वा चार ग्रह हों अथवा अनिमित्र स्थान के होकर पांच, छः यां सात ग्रह हों तो श्रीलक्ष्मीयोग होता है।।१५०।। योगांतरम् - मित्रेण पंच षट् सप्तखेटाश्चेच्छ्रीप्रदाःस्मृताः । द्विर्द्वादशे शुभो चन्द्रात्सप्तमे वा तयोस्तथा ।।१५१।। चन्द्रमा से २।१२ स्थान में शुभग्रह हो अथवा लग्न से ७ स्थान में शुभ ग्रह हों और लग्न में गुरु हों।।१५१।। गुरौ लग्ने द्वितीये ज्ञे व्यये शुक्रेऽथवा भवेत् । भावदृग्बलकष्टेष्टफलभावस्वभावतः ।।१५२।। दूसरे स्थान में बुध हो अथवा १२ वें स्थान में शुक्र हों तो लक्ष्मीयोग होता हैं किन्तु भाव बल दग्वाल इष्टकष्ट फल के तारतम्य से फल होता है।।१५२।। योगान्तरम् - दायानां च फलैरेव भाववर्गेशसंयुतैः । रश्म्यंशसंभवादेव वर्षचर्यां च दैववित् ।।१५३।। आयुर्दाय के फल के साथ भावेश और वर्गेश के फलों का समन्वय करके रंश्म्यंश के तारतम्य से वर्षचर्या का फल कहना चाहिये।।१५३।। एषामंशाश्च संभूताःकारकादिग्रहेरपि । मासचर्या दिनोत्थां नाप्यष्टवर्गसमुद्भवात् ।।१५४।। तथा कारकादि ग्रहों के अनुसार मासचर्या और अष्टकवर्ग के अनुसार दिनचर्या को कहना चाहिये।।१५४।। अन्य विशेषः- भावदृष्ट्योःप्रधानत्वात्कारको वोधको वले । इष्टकष्टफले त्वन्ये पाचको रश्मिसंभवे ।।१५५।। इति वृहत्पाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽब्दचर्यावर्णनं नामश्रतुर्दशोऽध्यायः भाव और दृष्टि के विचार में कारक ही प्रधान होता है उसी को लेना चाहिये। वलावल के विचार में बोधक ग्रह की प्रधानता होती है अतः उसी को लेना चाहिये। इष्टकष्ट और रश्मि के विचार में पाचक ग्रह की प्रधानता होने के कारण पाचक को ही लेना चाहिये।।१५५।।