भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 800 में से

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पृष्ठ 742

. ७३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अंतर्दाये तु भावानां प्रधानो वेधकःस्मृतः । अंतर्दाये दशानां तु कारको बोधकस्मृतः ।।१५६।। अंतर्दाय के विचार में सभी भावों का वेधक प्रधान होता है, दशा के अंतर्दाय विचार में बोधक और कारक प्रधान होते हैं।।१५६।। भावस्वभावविषये पाचकस्त्वन्यथा भवेत् । पाचकस्त्वन्यथासूर्यश्चन्द्रमा बोधकःस्मृतः ।।१५७।। और भाव स्वभाव के विचार में पाचक ग्रह प्रधान होता है। सूर्य स्वभावतः पाचकग्रह है और चन्द्रमा बोधक ग्रह है।।१५७।। इतिपाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽब्दचर्याध्यायश्चतुर्दशः । अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः।।९५।। तत्रादौ रश्म्यंशफलम् - षष्ठादिरश्मिष्वाद्येऽंशे जनको जन्मतोधृशम् । धनादिहीनो रिक्तश्च द्वितीयेऽंशे पितुर्मृतिः ।।१।। छठें रश्मि के पहले अंश में जन्म हो तो उसका पिता निर्धन होता है दूसरे अंश में जन्म हो तो पिता की मृत्यु होती है।।१।। निःस्वस्तृतीये दासश्च चतुर्थे रंकसंयुतः । व्याधिभिः पीडितस्तद्वत्पंचमेभृशदुःखितः ।।२।। तीसरे अंश में जन्म हो तो दरिद्र और सेवक होता है, चौथे अंश में दरिद्र और व्याधिग्रस्त होता है, पाचवें अंश में अत्यन्त पीड़ित।।२।। नवमे दशमे चैवं षष्ठेऽंशे सप्तमेऽपि च । व्याधियुक्तो दरिद्रश्च यदि जीवति जीवति ।।३।। नवें, दशम, छठें और सातवें अंश में रोगी और दरिद्र तथा जीवने में भी संदेह यदि जीवे तो जी सकता है।।३।। एकादशेऽपि रश्मौ चेदाद्येऽशेपितृलालितः । पितुर्धनव्ययकरो द्वितीये वंधकीपतिः ।।४।। ग्यारहवें रश्मि के प्रथमांश में पिता पालन पोषण करने वाला और पितृधन हारक होता है। दूसरे अंश में हो तो स्त्री पुंश्चली होती है और स्वयं वेश्यासक्त होता है।।४।।