बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
. ७३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अंतर्दाये तु भावानां प्रधानो वेधकःस्मृतः । अंतर्दाये दशानां तु कारको बोधकस्मृतः ।।१५६।। अंतर्दाय के विचार में सभी भावों का वेधक प्रधान होता है, दशा के अंतर्दाय विचार में बोधक और कारक प्रधान होते हैं।।१५६।। भावस्वभावविषये पाचकस्त्वन्यथा भवेत् । पाचकस्त्वन्यथासूर्यश्चन्द्रमा बोधकःस्मृतः ।।१५७।। और भाव स्वभाव के विचार में पाचक ग्रह प्रधान होता है। सूर्य स्वभावतः पाचकग्रह है और चन्द्रमा बोधक ग्रह है।।१५७।। इतिपाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽब्दचर्याध्यायश्चतुर्दशः । अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः।।९५।। तत्रादौ रश्म्यंशफलम् - षष्ठादिरश्मिष्वाद्येऽंशे जनको जन्मतोधृशम् । धनादिहीनो रिक्तश्च द्वितीयेऽंशे पितुर्मृतिः ।।१।। छठें रश्मि के पहले अंश में जन्म हो तो उसका पिता निर्धन होता है दूसरे अंश में जन्म हो तो पिता की मृत्यु होती है।।१।। निःस्वस्तृतीये दासश्च चतुर्थे रंकसंयुतः । व्याधिभिः पीडितस्तद्वत्पंचमेभृशदुःखितः ।।२।। तीसरे अंश में जन्म हो तो दरिद्र और सेवक होता है, चौथे अंश में दरिद्र और व्याधिग्रस्त होता है, पाचवें अंश में अत्यन्त पीड़ित।।२।। नवमे दशमे चैवं षष्ठेऽंशे सप्तमेऽपि च । व्याधियुक्तो दरिद्रश्च यदि जीवति जीवति ।।३।। नवें, दशम, छठें और सातवें अंश में रोगी और दरिद्र तथा जीवने में भी संदेह यदि जीवे तो जी सकता है।।३।। एकादशेऽपि रश्मौ चेदाद्येऽशेपितृलालितः । पितुर्धनव्ययकरो द्वितीये वंधकीपतिः ।।४।। ग्यारहवें रश्मि के प्रथमांश में पिता पालन पोषण करने वाला और पितृधन हारक होता है। दूसरे अंश में हो तो स्त्री पुंश्चली होती है और स्वयं वेश्यासक्त होता है।।४।।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३१ वेश्यासक्तस्तृतीये स्यान्निर्धनः कुलपांशनः । मृतपुत्रोऽथवाऽभाग्यश्चतुर्थे स्त्रीविमानितः ॥५॥ तीसरे अंश में निर्धन और कुलहीन होता है। अथवा मृत्यु मृतपुत्र वाला भाग्यहीन होता है। चौथे अंश में स्त्री से पराजित हो॥५॥ पंचमेत्वल्पपुत्रः स्यात्षष्ठे चाप्यरुजा युतः । स्त्रीयोगे धनवान्कश्चित्सप्तमे दुःखितोऽधनः ॥६॥ पांचवें अंश में अल्पपुत्र छठें अंश में रोग रहित हो, स्त्री के योग से धनी हो, सातवें अंश में दुःखी और निर्धन हो॥६॥ आद्येंऽशे द्वादशेरश्मौ नैव तस्य शुभाशुभौ । द्वितीये बलवान्मूर्खश्चौर्यद्रव्येण जीवति ॥७॥ बारहवें रश्मि के प्रथमांश में जन्म हो तो शुभ अशुभ समान हो, दूसरे अंश में बलवान, मूर्ख चोर हो॥७॥ तृतीये च चतुर्थे च वेश्यापतिररिंदमः । नृपपुरुष मृत्युश्च भार्याहीनोऽसुतोऽधनी ॥८॥ तीसरे तथा चौथे अंश में वेश्यापति हो और शत्रु का नाश करने वाला राजपुरुष के हाथ से मृत्यु हो और यदि जीवे तो स्त्रीहीन, पुत्रहीन और धनहीन हो॥८॥ विद्वांश्चतुर्दशे त्वाद्ये पितृभ्यांलालितः सुखी । द्वितीये क्लेशभाग्वापि शत्रुजिच्च रणाजिरे ॥९॥ पितृभ्यां हीन एवाथ लब्धकिंचिद्धनार्जकः । देशाद्देशागऽत्येव तृतीये धनतत्परः ॥९-१०॥ चौदहवीं रश्मि के प्रथम अंश में जन्म हो तो विद्वान हो, दूसरे अंश में माता पिता से ललित और सुखी, तीसरे अंश में क्लेशयुक्त, शत्रु को जीतने वाला मातृ- पितृ हीन हो और भ्रमणशील हो॥१०॥ सद्भिरेड्यः सुखी ख्यातः शांतबुद्धिररिंदमः । चतुर्थे धनवान् क्षेत्री विद्यार्जितपोषकः ॥११॥ चौथे अंश में धनी, सुखी, प्रसिद्ध, शांतबुद्धि, शत्रुनाशक, स्तुत्य, पांचवें अंश में धनी, भूमि युक्त विद्या से जीविका करने वाला॥११॥ सती स्त्रीयोगसंयुक्तः पंचमेदुःखभाग्धनी । पुत्रादिसंपत्संयुक्तः एवं पंचदशे भवेत् ॥१२॥
: ७३२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । उत्तम स्त्री से युक्त हो, छठें अंश दुःखी, धनपुत्र से सुखी, पंद्रहवे रश्मि का फल ऊपर कहे हुये पांच अंश के सदृश ही समझना चाहिये।।१२।। अस्मिन्षष्ठे धनी प्राज्ञो विद्यया सद्यशोभवेत् । एवं च षोडशे चांशे त्वतीव धनवान् भवेत् ।।१३।। छठें अंश में बुद्धिमान् धनी सोलहवें और सत्रहवें रश्मि के प्रथम अंश में अत्यंत धनी ।।१३।। स्वबंधुभ्योऽधिकोऽन्येऽंशे विद्ययाऽथधनेनवा । पुत्रादिसंयुतः श्रीमांस्थ्यंशे स्यात्स्वजनेश्वरः ।।१४।। दूसरे अंश मे बंधु से अधिक प्रतापी, तीसरे अंश में विद्या, धन पुत्रादि से सुखी, चौथे अंश में अपने देश में अधिकार प्राप्त हो।।१४।। इष्टापूर्तेन संयुक्तस्त्वष्टादशोनविंशके । पूर्ववद्विंशरश्मौ तु लब्धधामपरायणः ।।१५।। पांचवें अंश में यज्ञ करने वाला, बावली, कूप, तालाब बगीचा लगाने वाला, अठारह और उन्नीसवीं रश्मि का फल सत्रहवी रश्मि के अनुसार ही होता है। बीसवीं रश्मि में भूमि प्राप्त करने वाला।।१५।। वदान्यः पूर्वधर्माणं मनुवद्बहुपुत्रकः । एकविंशे धनैर्युक्तमाद्येऽनंतरभागके ।।१६।। दानशील मनु के समान बहुपुत्रवान् हो, इक्कीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में तथा दूसरे अंश में धनी हो।।१६।। तृतीये तु भुवि ख्यातो दानेन च धनेन च । द्विनामत्वं तु वा यज्वा यानवाहनसंयुतः ।।१७।। तीसरे अंश में दान धर्म से प्रसिद्धि युक्त वाहन युक्त, यज्ञ कर्त्ता, श्रीमान् बहुधन से युक्त।।१७।। श्रीमान्वहुधनानां च साधकश्च चतुर्थके । अग्निमांन्द्येन रोगार्तश्चतुर्थे धनवान्सुखी ।।१८।। चौथे अंश में अग्नि मांद्य रोग से पीड़ित, श्रीमान्, अनेक धनों का साधन धनी सुखी होता है।।१८।। पंचमे देशयोविद्वान्वदान्यो दंतुरोऽथवा । सप्तमे धनहानिःस्याद्राजयोगैश्चमृत्युयुक् ।।१९।।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३३ पाचवें अंश में धनी सुखी, छठें अंश में वक्ष्य, दंतुर सातवें अंश में निर्धन हो और राजनिमित्त से मृत्यु पाने वाला।।१९।। अष्टमे निर्धनस्थानां जनानां पोषणे रतः । द्वाविंशे प्रथमेऽंशे तु पितुःपुत्रो धनस्य तु ॥१२०॥ आठवें में निर्धन दरिद्रों का पोषक, बाइसवें के प्रथम अंश में पितृधन का रक्षक होता है।।१२०।। द्वितीये धनहीनश्च किंचित्कृषिकरःसुखी । तृतीये राजकार्यार्थी तत्क्रमार्जितवित्तकः ॥१२१॥ बाइसवीं रश्मि के दूसरे अंश में निर्धन, थोड़ी खेती करने वाला और सुखी होता है। तीसरे अंश में राजकार्य से धन प्राप्त करनेवाला।।१२१।। चतुर्थे तु प्रभुश्चान्यनामभाग्दृढ़वंधनात् । पंचमे तद्वदेव स्यात्षष्ठे कार्यस्यहानिकः ॥१२२॥ चौथे अंश में समर्थ दो नाम से प्रसिद्ध, पांचवें अंश में चौथे के समान फल, छठें अंश में कार्य की हानि करने वाला।।१२२।। सर्वव्ययश्च रिक्तश्च सप्तमे रोगयुग्धनी । त्रयोविंशे तु जनकलालितश्च सुखी भवेत् ॥१२३॥ सातवें अंश में रोगी और धनी हो। तेइसवीं रश्मि के प्रथम अंश में पिता से सुखी दूसरे अंश में सुखी।।१२३।। तृतीये मूर्खकृत्येन पराभव समन्वितः । चतुर्थे चौरकृत्येन पंचमे व्याधिसंभवः ॥१२४॥ तीसरे अंश में मूर्खतावश हारखाने वाला चौथे अंश में चोर, पांचवें अंश में रोगी।।१२४।। षष्ठे दरिद्रःपुरुषो व्याधिना पीडितो भवेत् । श्रीमान् पुत्रश्चतुर्विंशे प्रथमेलालितोभृशम् ॥१२५॥ छठें अंश में दरिद्र, रोगी। चौबीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में धनी।।१२५।। स्वजात्यनुगुणो विद्वान्प्रथमे च द्वितीयके । तेन ख्यातस्तृतीयेस्यात्स्वतंत्रः सर्वसम्मतः ॥१२६॥
७३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पिता से सुखी, विद्वान्, स्वजातिगुण से युक्त, दूसरे अंश में पूर्व का ही फल, तीसरे अंश में स्वतंत्र।।२६।। क्षेत्रदारसुहृत्पुत्रकलत्रैर्बहुभिर्वृतः । पंचमेव्याधितः षष्ठे बहुव्ययपरायणः ।।२७।। छठें अंश में अधिक व्यय करने वाला होता है।।२७।। पंचविंशे तु षष्ठांशे फलहीनस्तु जीवति । षड्विंशे प्रथमांशे तु दरिद्रः स्यात्सुतोऽपिसन् ।।२८।। पच्चीसवीं रश्मि के छठें अंश में निष्फल जीवन वाला, छब्बीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में दरिद्र।।२८।। पितुःकार्ये तु वृद्धिःस्याद्द्वितीये पितृवेश्मतः । अन्यत्रगत्वा तत्रैव स्वयोगेन च कर्मणा ।।२९।। दूसरे अंश में अपने गृह से अन्यत्र दूसरे स्थान में शरीर पोषण करने वाला।।२९।। स्वदेहपोषकोऽन्येंऽशेधनी च कृत्यवित्स्थितः । चतुर्थे पंचमे चैव पट्टबंधादिसंयुतः ।।३०।। तीसरे अंश में धनी कार्य को जानने वाला, चौथे पांचवें अंश में पट्टबंधादि से युक्त।।३०।। अतीवधनवान्सस्यात्षष्ठेत्वंशे स्वदेहभाक् । क्षेत्रदारादिवृध्या तु व्यथा व्याधिसमन्वितः ।।३१।। छठें अंश में धनी, सातवें अंश में देह पोषण करने वाला, आठवें अंश में खेत और स्त्रियों की वृद्धि से जीवन चलाने वाला।।३१।। नवमे धनहानिःस्यात्पुत्रदारविवर्जितः । यावद्दश नवांशाश्च षड्विंशवदथ द्वये ।।३२।। नवें अंश में मानसिक रोग से युक्त, दशम अंश में धनहीन, स्त्रीपुत्रहीन हो, सत्ताइस और अट्ठाइस रश्मि के फल पूर्वोक्तवत्।।३२।। राजप्रियस्तत्रंशंडः शुद्धः स्यादंशकेततः । एकोनत्रिंशे रश्मौ तु सुखी स्याच्च द्वितीयेके ।।३३।। उनतीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में जन्म हो तो सुखी होवें, दूसरे अंश में राजसेवी तीसरे अंश में सत्कर्म करने वाला।।३३।।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३५ राजसेवी तृतीयेऽशे कृत्याकृत्यविदीश्वरः । बहुबंधुयुतः श्रीमान्मानवाहनसंयुतः ॥३४॥ चौथे अन्श में अधिपति पांचवें अन्श में बंधुओं के समागम में रहनेवाला, छठें अन्श में श्रीमान्, सातवें अन्श में संतानयुक्त, आठवें अन्श में देशाधिपति और नवम अन्श में ग्राम का अधिकारी हो।।३४।। देशाग्रामाधिकारी च त्रिंशे त्वेतैःसमन्वितः । सेनानीनीतिमाञ्छूरः पंचमांशे भवेदिदम् ॥३५॥ तीसवीं रश्मि में भी पूर्वोक्त फल ही होता है इकतीसवीं रश्मि के पांचवें अन्श में सेनाधिपति नीतिमान् शूर हो।।३५।। षष्ठे तु विजयो युद्धे सप्तमेऽपिरुजा युतः । न्यूनायतिस्तु वस्वंशे नवांशे त्वधिकायतिः ॥३६॥ छठें अन्श में युद्ध में विजयी सातवें अन्श में रोगी, आठवें अन्श में थोड़े लाभ वाला, नवम में अधिक लाभ वाला होता है।।३६।। त्रयस्त्रिंशेतु राजानःषष्ठांशे वा तृतीयेके । अभिषिक्तो भवेद्यद्वा पट्टबंधस्तुयोगतः ॥३७॥ बत्तीसवीं रश्मि का फल पूर्व के अनुसार ही होता है। तैंतीसवीं रश्मि के छठें और तीसरे अन्श में राजा होता है शेष पूर्ववत् फल होता है।।३७।। रश्मौ तथा चतुस्त्रिंशे चतुर्थांशे पराजयः । तृतीये पंचमे षष्ठे युद्धे यु विजयी भवेत् ॥३८॥ चौतीसवीं रश्मि के चौथे अन्श में पराजयं, तीसरे, पांचवें, छठें अन्श में विजेता।।३८।। अष्टमे नवमेंऽशेतू वृद्धिःस्यात्शमेन हि । षडंशविषये यस्माच्चत्वारिशत्ततःपरे ॥३९॥ आठवें नवें अन्श में वृद्धियुक्त हो, चौतीस चालीस रश्मि तक के।।३९।। द्वितीये च तृतीये च चतुर्थे चाद्यके तथा । राजा स्यात्पंचमेषष्ठेसप्ताष्टनवमेततः ॥४०॥ प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ अन्शों में राजा, सातवें अन्श में युद्ध आठवें में व्याधि नवम में व्याधि।।४०।।
७३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दशमे च क्रमाद्युद्धं व्याधिर्वाऽथ पराजयः । इतरांशेषु संख्यातः सर्वसम्पत्समन्वितः ।।४१।। और दशम में पराजय शेष अंशों में सर्वसम्पत्तिमान् हो ।।४१।। ततःपरंच सम्राट् स्याच्चतुर्थे पंचमेजयी । अंशास्तुल्यास्तु तेष्वेवं विपरीत फलंविदुः ।।४२।। इसके आगे की रश्मियों में सम्राट् होता है, और चौथे पाचवें में विजयी होता है। अंश तुल्य हो तो विपरीत फल होता है।।४२।। व्याधिरुक्तदेव स्याद्यावद्विंशतिरश्मयः । यद्यप्यंशाःपरं नात्र अधिकारंभजन्ति ते ।।४३।। बीस रश्मि तक उक्तवद् व्याधिभयं होता है, इसके बाद व्याधिका अधिकार नहीं होता है।।४३।। सूर्यादिग्रहाणां द्वादशभाव फलम्। अथ स्थानगतानां ख्यादीनां क्रमात्फलम् । ततो रविःशिरोरोगंबंधूनां च विरोधताम् ।।४४।। यदि सूर्य लग्न में हो तो शिर के रोग और बंधु विरोध।।४४।। द्वितीये धनहानिश्च तृतीये मित्रवर्धनम् । धनलाभं सुखे सौख्यं शत्रुभिश्च समागमम् ।।४५।। दूसरे भाव में हों तो धन हानि, तीसरे में मित्रवृद्धि और धन लाभ, चौथे भाव में शत्रु समागम से सुख।।४५।। पंचमे पुत्रलाभं च बुद्धिमुद्यमसिद्धिकृत् । षष्ठे धनं जयं कुर्यात्सप्तमे स्त्रीविरोधनम् ।।४६।। पांचवें भाव में पुत्रलाभ, बुद्धि में वृद्धि उद्योग में सिद्धि, छठें भाव में धन लाभ और विजय, सातवें भाव में स्त्री से विरोध।।४६।। अष्टमे व्याधिहानिं च नवमे मित्रबंधनम् । भाग्यहानिं च दशमे धनलाभं सुखंजयम् ।।४७।। ८ भाव में व्याधि और हानि, ९ वें भाव में मित्रका बंधन और भाग्य हानि, १० भाव में धन लाभ, सुख और विजय की प्राप्ति।।४७।।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३७ एकादशेधनानां च सिद्धिंः मित्रसमागमम् । द्वादशे धनहानिं च जयं वा कुक्षिरुक्क्रमात् ॥४८॥ ११वें भाव में धन का लाभ और मित्र समागम और १२ वें भाव में होतो धन हानि, खर्चीला स्वभाव और कुक्षिरोग हो॥४८॥ अथ चन्द्रस्य द्वादशभाव फलम्। चन्द्रलग्ने च कलहं द्वितीये धनयोजनम् । तृतीये भ्रातृभिर्लाभं धनवस्त्रादि संग्रहम् ॥४९॥ यदि चन्द्रमा लग्न में हो तो कलह करनेवाला, २ रे भाव में हो तो धन प्राप्ति करनेवाला, ३ रे भाव में हो तो भाई से लाभान्वित वस्त्रादि का संग्रह॥४९॥ चतुर्थे धनवस्त्रादि वाहनादिसुसंयुतम् ॥५०॥ ४ भाव में धन वस्त्र वाहन प्राप्ति॥५०॥ तीक्ष्णे धनी सुतयुतः परिपूर्णसंपत्षष्ठे तु रोगसहितं कुमतिं च कामे । विद्याधनक्षितिसुखादिसमन्वितश्च मृत्यौ च मृत्युविषयः खलु कुक्षिरोगी ॥५१॥ ५ भाव में धन पुत्रादि सर्व संपत्तिमान्, ६ भाव में रोगी कुबुद्धि से युक्त, ७ भाव में विद्या-धन-भूमि और भूमि का सुख, ८ भाव में मृत्यु, दुःख और कुक्षिरोग से युक्त॥५१॥ स्त्रीस्वर्णदासायतिरेवधर्मे माने सुचारित्रगुणं धनं च । लाभे तु चैतत्सकलं व्यये तु धनस्य रिःफं कुरुते शशी तु ॥५२॥ ९ भाव में स्त्री सुवर्ण और दास की प्राप्ति, १० भाव में उत्तमगुण और धन का लाभ, ११ भाव में १० के समान फल, १२ वें भाव में धन का व्यय करनेवाला होता है॥५२॥ अथ भौमस्य द्वादशभाव फलम् – कुजे लग्ने तु चापल्यात्क्षतं स्वेधननाशनम् । विक्रमे भ्रातृमरणं धनलाभः सुखं यशः । चतुर्थेबन्धुमरणं शत्रुवृद्धिर्धनव्ययम् ॥५३॥ भौम लग्न में होतो चंचल स्वभाव के कारण चोट लगने से रोग, २ रे भाव में हो तो धन का नाश, ३ भाव में भ्रातृनाश, धन-यश की प्राप्ति और सुख, ४ भाव में बंधुहानि शत्रुवृद्धि, धन का खर्च॥५३॥
७३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पञ्चमे पितृहानिं च धनायति सुतौयशः । षष्ठे रिपुसमृद्धिं च जयं बंधुसमागमम् ।।५४।। ५ भाव में पिता की हानि, धनप्राप्ति, पुत्र और यश का लाभ, ६ भाव में शत्रुवृद्धि, विजय, बंधुसमागम और धन लाभ।।५४।। अर्थवृद्धिं स्त्रियां दार मरणं नीचसेवनम् । नीचस्त्रीसंगमो मृत्यौ धननाशं पराभवम् ।।५५।। ७ भाव में स्त्री को कष्ट, नीच की सेवा और नीच स्त्रीसंगम, ८ भाव में धननाश, पराभव और अनर्थ।।५५।। पराभवमनर्थं च धर्मेपांपरुचिक्रिया । धनव्ययं च दशमे धनलाभं कुकर्म च ।।५६।। ९ भाव में पापकर्म में रुचि धन का व्यय, १० भाव में धनी, कुकर्मी हो।।५६।। लाभे धनं सुखं वस्त्रं स्वर्णक्षेत्रादिसंग्रहम् । व्यये नेत्ररुजं भ्रातृनाशं च कुरुते कुजः ।।५७।। ११ भाव में धन वस्त्र सुवर्ण-भूमि का लाभ, १२ भाव में हो तो नेत्ररोगी, भाई का अनिष्ट करने वाला होता है।।५७।। अथ बुधस्य द्वादशभावफलम् – बुधे षष्ठेऽरिवृद्धिं च युद्धे सति पराजयम् । मृतौ बंधुविहीनत्वं बंधनं व्ययभे व्ययम् ।।५८।। लग्न से पांचवें भाव तक बुध सभी भावों की वृद्धि करता है। ६ भाव में शत्रु की वृद्धि और पराजय करता है, ७ भाव में स्त्री सुख ८ भाव में बंधुहीनता और बंधन, ९ भाव में भाग्यवृद्धि, १० में व्यापार में वृद्धि, ११ भाव में लाभ और १२ भाव में खर्च कराने वाला होता है।।५८।। गुरु-शुक्रयोः द्वादशभावफलम् – भावोक्तफलवृद्धिं तु परे तु कुरुते तथा । गुरुशुक्रौ तृतीये तु शत्रुवृद्धिं धनक्षयम् ।।५९।। जिन भावों का मूल में उल्लेख नहीं किया है उन स्थानों में गुरु, शुक्र हों तो उनकी वृद्धि करते हैं तीसरे भाव में हों तो शत्रु की वृद्धि और धन का नाश करते हैं।।५९।।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः ॥ ७३९ षष्ठे पराजयं व्याधिमष्टमे बंधनं तथा । रिष्फे चोरहृतस्वं तु नेत्ररोगपराजयम् ॥६०॥ ६ भाव में हों तो पराजय और व्याधि करते हैं, ८ वें भाव में बंधन, १२ वें भाव में चोरों द्वारा द्रव्य का अपहरण नेत्र रोग और पराजय॥६०॥ सप्तमे च चतुर्थे च सेनापत्यधनाप्तिः । सर्वसम्पत्समृद्धिं च नवमे राजसंपदम् ॥६१॥ सातवें और चौथे में सेनापत्य, धनलाभ, सभी सम्पत्तियों की वृद्धि, नवम में राजसम्पत्ति वा भाग्योदय होता है॥६१॥ अथ शनेः स्थानान्तर फलम् – पूर्वोक्तफलसंयोगमन्येष्वपि समं भवेत् । कुजवद्रविवन्मन्दः पापत्र्यंशं दलं गतः ॥६२॥ शनि का फल भौम और रवि के भाव फल के समान ही होता है॥६२॥ पादोनमेकं मित्राधिमित्रस्वर्क्षे च कोणभे । उच्चे तु नीचे त्रिगुणमध्यरौ द्विगुणं ततः ॥६३॥ यदि ग्रह मित्रगृह का हो तो चतुर्थांश फल, अधिमित्र गृह का हो तो तृतीयांश, स्वक्षेत्र और मूलत्रिकोण का हो तो तीन भाग फल देता है, उच्चराशि का हो तो संपूर्ण फल देता है। यदि नीच राशि का हो तो तृतीयांश न्यून, अधिशत्रुगृही हो तो द्विगुणहीन और शत्रुगृही हो तो आधा फल देता है॥६२-६३॥ ग्रहाणां दृष्टिवशात् सूर्यादीनां फलम् – अरौ सार्धं क्रमात्कालफलजस्त्वेवनिर्णयः । शुभैर्दृष्टो रवी राजा राजसेनापतिस्तु वा ॥६४॥ यदि सूर्य शुभग्रह से देखा जाता हो तो राजा वा राजा का सेनापति हो॥६४॥ शत्रुभिः कलहं दुःखं रूजं जठरनेत्रयोः । मित्रदृष्टो जयं बंधुलाभं पापैश्च रोगिताम् ॥६५॥ शत्रुओं से देखा जाता हो तो कलह, पेट और नेत्र में रोग हो मित्रग्रह से देखा जाता हो तो विजय और बंधु से लाभ तथा पाप ग्रह से देखा जाता हो तो रोगी हों॥६५॥
७४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चन्द्रस्य फलम् - धनहानिं शशीपापैः शिरोनेत्ररुजं व्यथा । शत्रुभिः पापकरणं धननाशं गमागमौ ॥६६॥ चन्द्रमा पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो धन की हानि, शिर और नेत्र में रोग होता हैं। शत्रुग्रह से दृष्ट हो तो पापकर्म करने वाला, धननाशक और भ्रमण करने वाला होता हैं॥६६॥ शुभैररोगतां सौख्यं धनलाभं च बंधुभिः । मित्रैश्च धन संसिद्धिं करोतीह न संशयः ॥६७॥ शुभग्रहों से दृष्ट हो तो नैरूज्य, सुख, द्रव्य का लाभ भाइयों से होता है। मित्रग्रह से दृष्ट हो तो मित्रों द्वारा धन का लाभ होता है।।६७।। भौमस्य फलम् - पापैर्दृष्टः कुजः क्षेत्रधनधान्यादिनाशनम् । शत्रुभिर्बंधनं रोगं चाहवे दूरवासनम् ॥६८॥ यदि भौम पापग्रहों से देखा जाता हो तो क्षेत्र (भूमि) धन, धान्य का नाश करता हैं, शत्रुग्रह की दृष्टि हो तो बंधन, रोग, युद्ध दूर यात्रा हो।।६८।। शुभैस्तु विजयं देशक्षेत्रलाभं सुहृच्छुभम् । मित्रैश्च धन संसिद्धिं करोतीह न संशयः ॥६९॥ शुभग्रह की दृष्टि हो तो विजय, देश, भूमि का लाभ, मित्र से लाभ होता हैं, मित्रग्रह से दृष्ट हो तो धन का लाभ होता है।।६९।। बुधस्यफलम् - शुभैर्बुधोलिपिज्ञानं विद्यालाभं च कौशलम् । मित्रैर्भूषाधनक्षौमरत्नलाभं च शत्रुभिः ॥७०॥ बुध शुभग्रहों से देखा जाता हो तो लिपि का ज्ञान, विद्या का लाभ कुशलता प्राप्त हो। मित्रग्रहों से देखा जाता हो तो आभूषण, धन, ऊन और रत्न का लाभ हो।।७०।। अतिसारं च दुर्बुद्धि प्रतीकेषु सदोद्यमम् । पापैर्महाविवादं च कुक्षौ शूलं च वर्धते ॥७१॥ शत्रुग्रहों से दृष्ट हो तो अतिसार, दुर्बुद्धि, शरीर के लिये उद्योगी हो, पापग्रहों से दृष्ट हो तो बड़े विवाद से युक्त और कुक्षि में शूलरोग की वृद्धि वाला हो।।७१।।
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७४१ गुरोः फलम् - गुरुः शुभैस्तु संदृष्टो धर्मकार्योद्यमं सुखम् । जयं धनायतिमित्रैर्दारक्षेत्रादिसंग्रहम् ।।७२।। गुरु शुभग्रह से देखे जाते हों तो धर्मकार्य में उद्यमशील और सुखी हो, विजयी : और धनी हो, मित्रग्रह से दृष्ट हो तो स्त्री, भूमि आदि का संग्रही ।।७२।। शत्रुभिः कुष्ठरोगं च त्वग्दोषकलहं रणम् । पापैः पराजयं बुद्धेः कुदारादिवियोजनम् ।।७३।। शत्रुग्रहों से दृष्ट हो तो चर्मरोग कुष्ठरोग कलह और संग्राम, पापग्रह से दृष्ट हो तो बुद्धि दोष से पराजय सुख, स्त्री आदि से वियोग हों।।७२-७३।। भृगोः फलम् - शुभैः शुक्रः सुखं योषालाभं भूषाधनायतिम् । मित्रैस्तु पट्टवंथादि देशलाभादि चाखिलम् ।।७४।। शुक्र शुभग्रहों से दृष्ट हो तो सुख, स्त्री लाभ आभूषण, धन का लाभ हो, मित्रग्रह से दृष्ट हो तो पट्टबंधन, देश का लाभ।।७४।। पापैः पराजयं योषावियोगं धननाशनम् । शत्रुभिर्याप्यरोगं च मूत्रकृच्छादिकं तथा ।।७५।। पापग्रह से दृष्ट हो तो पराजय, स्त्री वियोग और धन का नाश होता है, शत्रुग्रहों से दृष्ट हो तो कष्टसाध्य रोग, मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) रोग हो।।७५।। मंदः पापैस्तथा कुक्षिरोगं बंधनकं क्षयम् । शत्रुभिः शत्रुबाधां च पराभवमथामयम् ।।७६।। शनि पापग्रहों से देखा जाता हो तो कुक्षिरोग, बंधन और क्षय होता है। शत्रुओं से देखा जाता हो तो शत्रुबाधा, पराभव और व्याधि होती है।।७६।। अथ स्थानबलयुक्तसूर्यादिग्रहाणां फलम् - शुभैररोगतां मित्रैर्दृष्टो बंधुसमागमम् । रवौ स्थानवलेपूर्णे स्वदेशे विद्यायावली ।।७७।। सूर्य स्थान बल से युक्त हो तो स्वदेश में विद्या से बली होता है।।७७।।
७४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चन्द्रे प्रभुतया भौमे ग्रामण्येन बुधे सति । श्रौतया विद्यया वाऽर्थलिपिलेखनकर्मणा ॥७८॥ चन्द्रमा बली हो तो प्रभुता, भौम बली हो तो ग्राम में प्रभुतायुक्त, बुध बली हो तो श्रौतकर्म, विद्या लेखन कला से द्रव्ययुक्त हो॥७८॥ जनैर्धनैरमात्येषु बुद्ध्या च बलवान्गुरौ । यद्वा स्वदेशराजस्तु कार्येणैवंवली मतः ॥७९॥ गुरु बली हो तो जन-धन-मंत्री और बुद्धि से बली हो या स्वदेश में शासन कार्य में बली हो॥७९॥ शुक्रे स्वदेशमुख्यो वा त्वाधिपत्येन योषिताम् । मंदे भृतकदासानां मुख्यः स्याद्बलवानपि ॥८०॥ शुक्र बली हों तो स्वदेश में मुख्य, स्त्रियों के आधिपत्य से सुखी, शनि बली हो तो नौकर दासों का प्रधान होता है। स्थानबल से रहित ग्रह हो तो दास होता है॥८०॥ उक्तैस्तु पीडितः प्रेष्यः स्थानवीर्योनितेषु तु । समन्यूनाधिकाद्वीर्याद्दृष्टोत्कर्षात्फलं वदेत् ॥८१॥ इसी समन्यून अधिक बल से युक्तग्रह के फल का विचार करना चाहिये॥८१॥ दिग्वलयुक्त ग्रहाणां फलम् - दिग्वलेनाधिके सूर्ये वाणिज्येन धनायतिः । यशश्च धनवृद्धिश्च चन्द्रे तु राजसेवया ॥८२॥ सूर्य दिग्वल से पूर्ण हो तो रोजगार से धन की प्राप्ति, यश और धन की वृद्धि होती है। चन्द्रमा बली हो तो राजसेवा से धन का लाभ॥८२॥ भौमे तु सेवया ख्यातिर्वेदाभ्यासेन सर्वदा । बुधे धनायतिः कृष्या यशः स्याद्बुद्धिमत्तया ॥८३॥ भौम दिग्वल से युक्त हो तो सेवा से वेदाभ्यास से प्रसिद्धि होती है। बुध बली होतो बुद्धिमंता से यश और कृषि से धन का लाभ होता है॥८३॥ गुरौ धनायतिस्तैन वीर्येण धन शुभ्रता । राजकार्येण शुक्रे च वदान्यत्वेन वा यशः ॥८४॥
अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७४३ गुरु वली हो तो शुभ धन का लाभ होता है, शुक्र बली हों तो राजकार्य से द्रव्य और यश का लाभ होता है।।८४।। मंदे दासाधिपत्येन धनायतिररिंदमात् । कालयानबलाधिक्ये रवौ भौमे शनैश्चरे ।।८५।। शनि बली हो तो दासों की स्वामिता और शौर्य से धन का लाभ होता है।।८५।। काल-अयनबलयुक्तग्रहफलम् - मंत्रोपदेशविधिना पाखंडिपदसंश्रयात् । दासभावेन कृष्णोन्दौ कृषितो विद्यायान्यथा ।।८६।। सूर्य-भौम-शनि काल और अयन बल से युक्त हों तो मंत्रोपदेशपाखंड और दासता से जीवन निर्वाह करने वाला, कृष्ण पक्ष का चंद्रमा यदि दोनों बलों से युक्त हो तो खेती और विद्या से जीवन निर्वाह करने वाला, गुरु, शुक्र, बुध और शुक्लपक्ष का चन्द्रमा दोनों बलो से युक्त हो तो विद्या और धन से जीवन निर्वाह करनेवाला होता है।।८६।। चेष्टाबलयुक्त ग्रहाणांफलम् - गुरौ शुक्रे बुधे पाथोनिधिजेचात्रिसंभवे । विद्यांया वाधने संख्यावलदिग्वलवृद्धिः ।।८७।। नानाविध यतिः प्रोक्ता इति चेष्टाधिकेषु तु । केचिदुक्तं यथापूर्वं विशेषादेव निर्णयः ।।८८।। यदि सूर्यादिग्रह चेष्टाबल से युक्त हों तो अनेक प्रकार की विद्या द्वारा द्रव्य का लाभ होता है।।८७-८८।। बलिष्ठो दायंरश्म्युक्त फलं सर्वं करोति वै । न्यूनाधिकेऽनुपातेन फलमेवं विचिन्त्यताम् ।।८९।। गुरु शुक्र बुध यदि बली हों तो रश्म्युक्त पूर्णफल को देते हैं। यदि न्यूनाधिक बल हो तो अनुपात द्वारा फल को समझना चाहिये।।८९।। इष्टबलानुसारेण फलम् - सौम्येष्विष्टफलाधिकेषु नितरां श्रीमान्सुशीलोगुणी- मित्रेष्वेवमतीवधर्मनिरतो दाता सुखीसत्ववान् ।
७४४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पापेष्वेवमथापि पापनिरतः शत्रुध्वथो शत्रुभि- वीर्येणाथ पराजयो जय इमान्यर्यायतः प्राप्नुयात् ॥९०॥ यदि शुभग्रह इष्टबल में अधिक हों तो धनी, मित्रों के प्रति सुशीलता गुणी, धर्मरत, दाता सुखी और बलवान् होता है। यदि पापग्रह इष्टबल में अधिक हों तो शत्रुओं के बल द्वारा पराजय होती है।।९०।। फलान्तरम् - अधिकेष्वशुभेष्वेवमनिष्टाख्यफलानितु । व्याधिभिः कलहैर्मित्रैः पीड्यते नात्र संशयः ॥९१॥ यदि पापग्रह अधिक बली हों तो ज्वरपीडित, कलह और मित्रों से पीड़ित रहता है।।९१।। एवं पापेषु दुश्चेष्टः पातकी भवति ध्रुवम् । शत्रुंष्वेवं सदा रोगी मित्रैर्बन्धुविवर्जितः ॥९२॥ पापग्रह अधिक वली हों तो दुष्ट चेष्टा वाला पातकी होता है। शत्रुग्रह अधिक बली हों तो सदा रोगी, मित्र तथा बंधु वर्ग से रहित हो।।९२।। सर्वद्वेष्टबलाधिक्ये सर्वत्राफलदोग्रहः । शुभेषु च फलेष्वेव स्पष्टमेव फलप्रदः ॥९३॥ जो ग्रह सर्वद्वेषी हो और बलाधिक्य हो तो वह निष्फल होता है।।९३।। अत्यनिष्टफलः खेटः शुभेषु त्वफलप्रदः । अनिष्टफलदोऽन्येषु खेटः सर्वत्र सर्वदा ॥९४।। और जो शुभवर्ग में शुभ फल देने वाला है यदि अन्य ग्रहों से मिश्रित है तो अनिष्ट फल देने वाला होता है।।९४।। स्वोच्चादिस्थानदृस्थाःस्युस्तथादिगवर्गा अपि । क्षेत्रपुत्रकलत्रादि धनधान्यसमृद्धिदाः यदि मित्रादिवर्गस्थाधनधान्यविवर्धनाः ॥९५।। जो ग्रह अपने उच्च, मूलत्रिकोण स्वक्षेत्र, मित्रक्षेत्र, अधिमित्रक्षेत्र, उदासीन क्षेत्र में हो वा अपने दशमवर्ग में हो वह स्त्री पुत्र धन धान्य की वृद्धि करने वाला होता है।।९५।।
अथ मासचर्याप्रकरणम् । ७४५ दशाफलम् - व्याधि दुर्गतिदा प्रोक्ता दशारम्भे तु शीतगोः । स्वोच्चादि संस्थिता दाय प्रारम्भे शुभदादशा ।।९६।। आरम्भ में चन्द्रमा की दशा व्याधि और दुर्गति को देती है। उच्चादि छ स्थान में गये हुये ग्रह की दशा प्रारम्भ में शुभ फल देने वाली अन्यथा अशुभ फल देने वाली होती हैं।।९६।। अन्यथाऽशुभदा प्रोक्ता प्रारम्भे ज्योतिषां दशा । केन्द्रधूप्रगताःखेटा दशायां शुभदाः सदा ।।९७।। केन्द्र में गये हुये ग्रह की दशा शुभद होती है।।९७।। द्रव्यकर्मगुणा यस्य स्वभावाः कथिताः पुरा । ते सर्वे स्वदशाकाले योज्या भावदृगादिषु ।।९८।। पूर्व में जिस ग्रह का जो स्वभाव और गुण कहा गया है वह सभी उसके दशाकाल में योजना करना।।९८।। भावदृष्टिवलेष्टानि फलानि कथितानि च । भावाध्यायोक्त ख्यादिफलान्यत्रैव योजयेत् ।।९९।। और भावों अथवा भावेशों के दृष्टिवश से जो फल कहे गये हैं और भावस्थ सूर्यादि के फलों को भी तारतम्य से योजना कर फल कहना चाहिये।।९६-९९।। इति बृहत्पाराशर होरायामुत्तरार्धे पंचदशोऽध्यायः।।१५।। अथ मासचर्याप्रकरणम्। भावसधिस्थग्रहाणांफलम् - भावांशैः समतां गतः खलु खगः पूर्णं विधत्ते फलम् - संधिस्थो न फलप्रदोऽन्तरगतैस्त्रैराशिकेनैव च । भावन्यूनमथग्रहस्य गुणयेदंशादिकं चार्णवैर्हित्वा- चास्य च संधितोऽधिकमथो प्रोक्तं फलं भावजम् ।।१।। ग्रह जिस भाव में वैटा है उस भाव का राशि अंश यदि ग्रह के राशि अंश के तुल्य हो तो उस भाव का पूर्णफल प्राप्त होता है। यदि ग्रह संधि में हो तो उस ग्रह का फल नहीं होता है, दोनों के मध्य में हो तो त्रैराशिक द्वारा फल लाना चाहिये,
७४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि ग्रह भाव से न्यून हो तो ग्रह के अंश को ४ से गुणने से और यदि अधिक अंश हो तो भाव संधि से घटाने से शेष भाव फल होता है।।१।। ऊर्ध्वमुखो रवियुक्तोराशिसमेतस्त्वधोमुखोज्ञेयः । तिर्यङ्मुखोऽखिलयुतो राशिर्भावाः परेण्येवम् ।।२।। यदि भाव में सूर्य हो उसे ऊर्ध्वमुख, जो भावग्रह रहित हो उसे अधोमुख और जो चन्द्रादि ग्रहों से युक्त हो उसे तिर्यक् मुख कहते हैं।।१-२।। भावानांफलम् - अन्य जातीय योगे तु तत्तद्भावफलं वदेत् । स्वजातीय योगेषु त्रिंशाद्यंशा भवंत्युत ।।३।। भावों में अन्य जातीय ग्रहों के योग हों तो उनके अनुसारि भाव के फल को कहना चाहिये। यदि स्वजातीय ग्रह युक्त हो तो सम्पूर्ण तीस अंश फल होता है।।३।। भावानांस्थानांकसंख्यामाह- तत्त्वमाकृतिरेकाक्षिछंदस्तत्वं चतुस्त्रयः । एकोनविंशतिच्छन्दो नवाक्षी षट् त्रयस्तथा ।।४।। तनु आदि १२ भावों के क्रम से २५, २२, २१, २६, २५, ३४, १९, २६, २९, ३६, ५४, १६ ये भाव स्थानांक संख्यायें हैं।।४।। भावानांकरण (रेखा) संख्यामाह- वेदेषवो नृपाः स्थाने भावसंख्याःप्रकीर्त्तिताः । एकत्रिंशत्त्रयस्त्रिंशद्दानि त्रिंशत्तथैव च ।।५।। एकत्रिंशद्द्विनेत्रे च मुनिरामाः खपावकाः । मानि त्रिंशतिरेकद्वौ खवेदाः करणस्य तु ।।६।। तनु आदि १२ भावों के क्रम से ३१, ३३, २७, ३०, ३१, २२, ३७, ३०, २७, २०, २१, ४० करणांक है।।५-६।। पूर्वोक्त स्थान-करण संख्यानां शुभाऽशुभत्वम् - विषमायां क्रमादोजे युग्मे स्यातां शुभाशुभे । समायां भवतस्तद्वत्यापसौम्य फल क्रमात् ।।७।। विषम राशि में स्थान संख्या विषम हो तो शुभ फल और सम राशि में स्थान
अथ मासचर्याप्रकरणम् । ७४७ संख्या सम हो तो अशुभ फलदायक। विषम राशि में करण संख्या सम हो तो अशुभ फलदायक होता है।।७।। विशेषफलम् – ओजे व्याधिः समे हानिर्यावत्तुदशकं भवेत् । परतः पञ्चकं चौजे समे व्याधिरथांन्यथा ।।८।। विषम राशि में यदि स्थानकरण की संख्या १० हो तो व्याधि का नाश और सम राशि में हानि होती है। इसके बाद १५ पर्यन्त व्याधि इसके बाद २५ तक सम राशि में व्याधि और विषम राशि में हानि होती है।।८।। शिरोरोगाक्षिरोगाश्च रक्तासृक्कामलाज्वरीः । ग्रहणी शीतको मेहप्लीहो गुल्मलतः क्रमात् ।।९।। इसके बाद पुनः ३५ पर्यंत क्रम से शिरोरोग, नेत्ररोग, रक्तविकार, कामलारोग, ज्वररोग, संग्रहणी, शीतरोग, प्रमेहरोग, प्लीहारोग, गुल्मरोग होता है।।९।। रत्नैर्धान्यैश्च हेमैश्च गोभिः क्षेत्रैश्च राजभिः । दासैश्च महिषैरुष्ट्रैर्गजाश्वैर्वृद्धयः स्मृताः ।।१०।। इसके बाद ४५ पर्यन्त क्रम से रत्नवृद्धि, धान्यवृद्धि, सुवर्णवृद्धि, गौ आदि की वृद्धि, क्षेत्रादि की वृद्धि, राजा से लाभ, दासों से लाभ, महिषी आदि की वृद्धि, ऊंट आदि की वृद्धि, हाथी घोड़े की वृद्धि होती है।।९-१०।। जातिदेशानुसारेणफले तारतम्यम् – जात्या देशस्य कालस्य स्वानुरूपं फलं वदेत् । तत्तद्भावानुसंज्ञं च ग्रहात्भावात्फलं वदेत् ।।११।। इस प्रकरण में स्थान करण का जो फल कहा गया हैं उसे जाति देश काल के तारतम्य से स्वरूप के अनुसार कहना चाहिये।।११।। उच्चादिषु नवस्वेव कालांशादिषु यत्फलम् । भाग्याध्यायोक्तमप्यत्र योजयेत्तु विशेषतः ।।१२।। पहले कहे हुये उच्चादि फल, कालांशादि फल और भाग्याध्यायोक्त फल का विचार भी स्थान करण में संयोजित करके फलादेश करना चाहिये।।११-१२।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धेमासचर्याफलवर्णननाम षोडशोऽध्यायः।
७४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दिनचर्याप्रकरणम्। स्थानप्रद करणप्रदग्रहाणांफलम् - अर्केन्दुगुरवः शुक्रः क्रमादन्येवलक्रमाद् । भवंति स्थानदाः खेटाश्चत्वारश्च यदैकदा ।।१।। सूर्य चन्द्र गुरु शुक्र, भौम, बुध, शनि एक ही समय में स्थानप्रद हों तो धन को लाभ होता है।।१।। धनादीनां यथा लब्धिः पंच चेत्यूजयतायुतः । आरोग्यं वस्त्रलाभश्च षट्सु पट्टस्यवंधनम् ।।२।। इनमें पांच स्थानद हों तो पूज्यता प्राप्त हो, यदि ६ स्थानद हों तो पट्टाभिषेक होता है।।२।। सप्तचेद्राऽयलाभः स्यादेवं करणदा यदि । धनहानिस्ततो व्याधिस्ततस्तु विपदादयः ।।३।। सात ग्रह हों तो राज्यलाभ होता है। यदि चार करणप्रद हों तो धन की हानि, पांच हों तो व्याधि, छ हों तो विपत्ति।।३।। सप्तभिर्मरणं प्रोक्तमक्षाभावे मृतिर्भवेत् । तत्र तिष्ठति चेत्खेटे त्वन्यस्मिन्यदिवामतः ।।४।। सात हों तो विपत्ति और मरण होता है। करण का अभाव हो तो मृत्यु यदि विलोमग्रहस्थिति हो तो मृत्यु नहीं होती है।।४।। उच्चसंख्याधिका अंशाश्चंद्रस्य स्थानदाःपरे । शुभाख्याः शुभदाः प्रोक्ता राशिनात्र क्रमात्फलम् ।।५।। चन्द्रोच्च की संख्या १३ इससे यदि अधिक अंश के स्थानदग्रह हों और शुभग्रह हों तो शुभफल होता है।।१-५।। उपसंहारः- होराशास्त्रमिदं सर्वं भाषितं तव सुव्रत । पुण्यं यशस्यं धन्यं च त्रिकालज्ञानकारणम् ।।६।। हे मैत्रेय! यह सम्पूर्ण होरा शास्त्र मैंने कहा यह पुण्यकारक, यश को देने वाला, धन धान्य को देने वाला, भूत, भविष्य और वर्तमान काल को कहने वाला है।।६।।
प्रश्नाध्यायः । ७४९ विना मनु तपस्ये च शास्त्रज्ञानेन केवलम् । हस्तामलकवत्सर्वं जगतां लोकयेत्फलम् ॥७॥ इस शास्त्र का उत्तम ज्ञान होने से मंत्र तथा देवता की आराधना के बिना ही हाथ में रखे हुये आंवला के समान ही संपूर्ण जगत् का शुभ अशुभ देखा जा सकता है॥७॥ पुत्राय शिष्याय च धीमते च तपस्विने मंत्रविदे च दात्रे । दद्यादिमं शास्त्रमहासमुद्रं यथैव शम्भुः शिशवेपयोधिम् ॥८॥ इस महासमुद्र शास्त्र को पुत्र, शिष्य, बुद्धिमान्, तपस्वी, मंत्रवेत्ता और दाता को देना चाहिये। जैसे शिवजी ने तपस्वी उपमन्यु को पयोधि को दिया था॥८॥ बुद्धिहीनाय दम्भाय दांभिकायत्वमर्षिणे । न दद्यादादि दद्याच्चेद्द्विधा स्वस्य विनश्यति ॥९॥ इस शास्त्र को दंभी, क्रोधी, दुष्ट को नहीं देना चाहिये ऐसे लोगों को देने से विद्या नष्ट हो जाती है। पूर्वोक्त दोष से रहित बालक भी हो तो उसे इस शास्त्र को पढ़ाना चाहिये।।९।। एवं ते कथितं शास्त्रं त्वयिस्नेहाद्द्विजोत्तम । जातकांशं च विद्यांशं किं भूयस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥१०॥ हे मैत्रेय! तुम्हारे ऊपर स्नेह के कारण मैंने जातकांश को कहा। अब तुम्हारी क्या सुनने की इच्छा है सो कहो।।६-१०।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे सप्तदशोऽध्यायः॥१७॥ प्रश्नाध्यायः ॥१८॥ मैत्रेय उवाच- भगवन्प्रश्नशास्त्रं तु सूचिकानां प्रकाशितम् । कलौ युगे तु मंदानां यज्ज्ञातुं तद्वदस्व मे ॥१॥ मैत्रेय जी बोले— हे भगवन्! आपने बुद्धिमानों के लिये प्रश्न शास्त्र को कहा है किन्तु कलियुग में मन्दबुद्धि वालों को जैसे ज्ञान हो उसे कहिये॥१॥ उपास्य विवेचनम् - कृतेयुगे तु धर्मस्य पूर्णत्वात्तपसान्विताः । सर्वे जानन्ति भूतं च भवद्भावि द्विजोत्तम ॥२॥