भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 749

अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३७ एकादशेधनानां च सिद्धिंः मित्रसमागमम् । द्वादशे धनहानिं च जयं वा कुक्षिरुक्क्रमात् ॥४८॥ ११वें भाव में धन का लाभ और मित्र समागम और १२ वें भाव में होतो धन हानि, खर्चीला स्वभाव और कुक्षिरोग हो॥४८॥ अथ चन्द्रस्य द्वादशभाव फलम्। चन्द्रलग्ने च कलहं द्वितीये धनयोजनम् । तृतीये भ्रातृभिर्लाभं धनवस्त्रादि संग्रहम् ॥४९॥ यदि चन्द्रमा लग्न में हो तो कलह करनेवाला, २ रे भाव में हो तो धन प्राप्ति करनेवाला, ३ रे भाव में हो तो भाई से लाभान्वित वस्त्रादि का संग्रह॥४९॥ चतुर्थे धनवस्त्रादि वाहनादिसुसंयुतम् ॥५०॥ ४ भाव में धन वस्त्र वाहन प्राप्ति॥५०॥ तीक्ष्णे धनी सुतयुतः परिपूर्णसंपत्षष्ठे तु रोगसहितं कुमतिं च कामे । विद्याधनक्षितिसुखादिसमन्वितश्च मृत्यौ च मृत्युविषयः खलु कुक्षिरोगी ॥५१॥ ५ भाव में धन पुत्रादि सर्व संपत्तिमान्, ६ भाव में रोगी कुबुद्धि से युक्त, ७ भाव में विद्या-धन-भूमि और भूमि का सुख, ८ भाव में मृत्यु, दुःख और कुक्षिरोग से युक्त॥५१॥ स्त्रीस्वर्णदासायतिरेवधर्मे माने सुचारित्रगुणं धनं च । लाभे तु चैतत्सकलं व्यये तु धनस्य रिःफं कुरुते शशी तु ॥५२॥ ९ भाव में स्त्री सुवर्ण और दास की प्राप्ति, १० भाव में उत्तमगुण और धन का लाभ, ११ भाव में १० के समान फल, १२ वें भाव में धन का व्यय करनेवाला होता है॥५२॥ अथ भौमस्य द्वादशभाव फलम् – कुजे लग्ने तु चापल्यात्क्षतं स्वेधननाशनम् । विक्रमे भ्रातृमरणं धनलाभः सुखं यशः । चतुर्थेबन्धुमरणं शत्रुवृद्धिर्धनव्ययम् ॥५३॥ भौम लग्न में होतो चंचल स्वभाव के कारण चोट लगने से रोग, २ रे भाव में हो तो धन का नाश, ३ भाव में भ्रातृनाश, धन-यश की प्राप्ति और सुख, ४ भाव में बंधुहानि शत्रुवृद्धि, धन का खर्च॥५३॥