बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दशमे च क्रमाद्युद्धं व्याधिर्वाऽथ पराजयः । इतरांशेषु संख्यातः सर्वसम्पत्समन्वितः ।।४१।। और दशम में पराजय शेष अंशों में सर्वसम्पत्तिमान् हो ।।४१।। ततःपरंच सम्राट् स्याच्चतुर्थे पंचमेजयी । अंशास्तुल्यास्तु तेष्वेवं विपरीत फलंविदुः ।।४२।। इसके आगे की रश्मियों में सम्राट् होता है, और चौथे पाचवें में विजयी होता है। अंश तुल्य हो तो विपरीत फल होता है।।४२।। व्याधिरुक्तदेव स्याद्यावद्विंशतिरश्मयः । यद्यप्यंशाःपरं नात्र अधिकारंभजन्ति ते ।।४३।। बीस रश्मि तक उक्तवद् व्याधिभयं होता है, इसके बाद व्याधिका अधिकार नहीं होता है।।४३।। सूर्यादिग्रहाणां द्वादशभाव फलम्। अथ स्थानगतानां ख्यादीनां क्रमात्फलम् । ततो रविःशिरोरोगंबंधूनां च विरोधताम् ।।४४।। यदि सूर्य लग्न में हो तो शिर के रोग और बंधु विरोध।।४४।। द्वितीये धनहानिश्च तृतीये मित्रवर्धनम् । धनलाभं सुखे सौख्यं शत्रुभिश्च समागमम् ।।४५।। दूसरे भाव में हों तो धन हानि, तीसरे में मित्रवृद्धि और धन लाभ, चौथे भाव में शत्रु समागम से सुख।।४५।। पंचमे पुत्रलाभं च बुद्धिमुद्यमसिद्धिकृत् । षष्ठे धनं जयं कुर्यात्सप्तमे स्त्रीविरोधनम् ।।४६।। पांचवें भाव में पुत्रलाभ, बुद्धि में वृद्धि उद्योग में सिद्धि, छठें भाव में धन लाभ और विजय, सातवें भाव में स्त्री से विरोध।।४६।। अष्टमे व्याधिहानिं च नवमे मित्रबंधनम् । भाग्यहानिं च दशमे धनलाभं सुखंजयम् ।।४७।। ८ भाव में व्याधि और हानि, ९ वें भाव में मित्रका बंधन और भाग्य हानि, १० भाव में धन लाभ, सुख और विजय की प्राप्ति।।४७।।