बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३५ राजसेवी तृतीयेऽशे कृत्याकृत्यविदीश्वरः । बहुबंधुयुतः श्रीमान्मानवाहनसंयुतः ॥३४॥ चौथे अन्श में अधिपति पांचवें अन्श में बंधुओं के समागम में रहनेवाला, छठें अन्श में श्रीमान्, सातवें अन्श में संतानयुक्त, आठवें अन्श में देशाधिपति और नवम अन्श में ग्राम का अधिकारी हो।।३४।। देशाग्रामाधिकारी च त्रिंशे त्वेतैःसमन्वितः । सेनानीनीतिमाञ्छूरः पंचमांशे भवेदिदम् ॥३५॥ तीसवीं रश्मि में भी पूर्वोक्त फल ही होता है इकतीसवीं रश्मि के पांचवें अन्श में सेनाधिपति नीतिमान् शूर हो।।३५।। षष्ठे तु विजयो युद्धे सप्तमेऽपिरुजा युतः । न्यूनायतिस्तु वस्वंशे नवांशे त्वधिकायतिः ॥३६॥ छठें अन्श में युद्ध में विजयी सातवें अन्श में रोगी, आठवें अन्श में थोड़े लाभ वाला, नवम में अधिक लाभ वाला होता है।।३६।। त्रयस्त्रिंशेतु राजानःषष्ठांशे वा तृतीयेके । अभिषिक्तो भवेद्यद्वा पट्टबंधस्तुयोगतः ॥३७॥ बत्तीसवीं रश्मि का फल पूर्व के अनुसार ही होता है। तैंतीसवीं रश्मि के छठें और तीसरे अन्श में राजा होता है शेष पूर्ववत् फल होता है।।३७।। रश्मौ तथा चतुस्त्रिंशे चतुर्थांशे पराजयः । तृतीये पंचमे षष्ठे युद्धे यु विजयी भवेत् ॥३८॥ चौतीसवीं रश्मि के चौथे अन्श में पराजयं, तीसरे, पांचवें, छठें अन्श में विजेता।।३८।। अष्टमे नवमेंऽशेतू वृद्धिःस्यात्शमेन हि । षडंशविषये यस्माच्चत्वारिशत्ततःपरे ॥३९॥ आठवें नवें अन्श में वृद्धियुक्त हो, चौतीस चालीस रश्मि तक के।।३९।। द्वितीये च तृतीये च चतुर्थे चाद्यके तथा । राजा स्यात्पंचमेषष्ठेसप्ताष्टनवमेततः ॥४०॥ प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ अन्शों में राजा, सातवें अन्श में युद्ध आठवें में व्याधि नवम में व्याधि।।४०।।