भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 746

७३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पिता से सुखी, विद्वान्, स्वजातिगुण से युक्त, दूसरे अंश में पूर्व का ही फल, तीसरे अंश में स्वतंत्र।।२६।। क्षेत्रदारसुहृत्पुत्रकलत्रैर्बहुभिर्वृतः । पंचमेव्याधितः षष्ठे बहुव्ययपरायणः ।।२७।। छठें अंश में अधिक व्यय करने वाला होता है।।२७।। पंचविंशे तु षष्ठांशे फलहीनस्तु जीवति । षड्विंशे प्रथमांशे तु दरिद्रः स्यात्सुतोऽपिसन् ।।२८।। पच्चीसवीं रश्मि के छठें अंश में निष्फल जीवन वाला, छब्बीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में दरिद्र।।२८।। पितुःकार्ये तु वृद्धिःस्याद्द्वितीये पितृवेश्मतः । अन्यत्रगत्वा तत्रैव स्वयोगेन च कर्मणा ।।२९।। दूसरे अंश में अपने गृह से अन्यत्र दूसरे स्थान में शरीर पोषण करने वाला।।२९।। स्वदेहपोषकोऽन्येंऽशेधनी च कृत्यवित्स्थितः । चतुर्थे पंचमे चैव पट्टबंधादिसंयुतः ।।३०।। तीसरे अंश में धनी कार्य को जानने वाला, चौथे पांचवें अंश में पट्टबंधादि से युक्त।।३०।। अतीवधनवान्सस्यात्षष्ठेत्वंशे स्वदेहभाक् । क्षेत्रदारादिवृध्या तु व्यथा व्याधिसमन्वितः ।।३१।। छठें अंश में धनी, सातवें अंश में देह पोषण करने वाला, आठवें अंश में खेत और स्त्रियों की वृद्धि से जीवन चलाने वाला।।३१।। नवमे धनहानिःस्यात्पुत्रदारविवर्जितः । यावद्दश नवांशाश्च षड्विंशवदथ द्वये ।।३२।। नवें अंश में मानसिक रोग से युक्त, दशम अंश में धनहीन, स्त्रीपुत्रहीन हो, सत्ताइस और अट्ठाइस रश्मि के फल पूर्वोक्तवत्।।३२।। राजप्रियस्तत्रंशंडः शुद्धः स्यादंशकेततः । एकोनत्रिंशे रश्मौ तु सुखी स्याच्च द्वितीयेके ।।३३।। उनतीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में जन्म हो तो सुखी होवें, दूसरे अंश में राजसेवी तीसरे अंश में सत्कर्म करने वाला।।३३।।