बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 745, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७३३ पाचवें अंश में धनी सुखी, छठें अंश में वक्ष्य, दंतुर सातवें अंश में निर्धन हो और राजनिमित्त से मृत्यु पाने वाला।।१९।। अष्टमे निर्धनस्थानां जनानां पोषणे रतः । द्वाविंशे प्रथमेऽंशे तु पितुःपुत्रो धनस्य तु ॥१२०॥ आठवें में निर्धन दरिद्रों का पोषक, बाइसवें के प्रथम अंश में पितृधन का रक्षक होता है।।१२०।। द्वितीये धनहीनश्च किंचित्कृषिकरःसुखी । तृतीये राजकार्यार्थी तत्क्रमार्जितवित्तकः ॥१२१॥ बाइसवीं रश्मि के दूसरे अंश में निर्धन, थोड़ी खेती करने वाला और सुखी होता है। तीसरे अंश में राजकार्य से धन प्राप्त करनेवाला।।१२१।। चतुर्थे तु प्रभुश्चान्यनामभाग्दृढ़वंधनात् । पंचमे तद्वदेव स्यात्षष्ठे कार्यस्यहानिकः ॥१२२॥ चौथे अंश में समर्थ दो नाम से प्रसिद्ध, पांचवें अंश में चौथे के समान फल, छठें अंश में कार्य की हानि करने वाला।।१२२।। सर्वव्ययश्च रिक्तश्च सप्तमे रोगयुग्धनी । त्रयोविंशे तु जनकलालितश्च सुखी भवेत् ॥१२३॥ सातवें अंश में रोगी और धनी हो। तेइसवीं रश्मि के प्रथम अंश में पिता से सुखी दूसरे अंश में सुखी।।१२३।। तृतीये मूर्खकृत्येन पराभव समन्वितः । चतुर्थे चौरकृत्येन पंचमे व्याधिसंभवः ॥१२४॥ तीसरे अंश में मूर्खतावश हारखाने वाला चौथे अंश में चोर, पांचवें अंश में रोगी।।१२४।। षष्ठे दरिद्रःपुरुषो व्याधिना पीडितो भवेत् । श्रीमान् पुत्रश्चतुर्विंशे प्रथमेलालितोभृशम् ॥१२५॥ छठें अंश में दरिद्र, रोगी। चौबीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में धनी।।१२५।। स्वजात्यनुगुणो विद्वान्प्रथमे च द्वितीयके । तेन ख्यातस्तृतीयेस्यात्स्वतंत्रः सर्वसम्मतः ॥१२६॥