बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: ७३२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । उत्तम स्त्री से युक्त हो, छठें अंश दुःखी, धनपुत्र से सुखी, पंद्रहवे रश्मि का फल ऊपर कहे हुये पांच अंश के सदृश ही समझना चाहिये।।१२।। अस्मिन्षष्ठे धनी प्राज्ञो विद्यया सद्यशोभवेत् । एवं च षोडशे चांशे त्वतीव धनवान् भवेत् ।।१३।। छठें अंश में बुद्धिमान् धनी सोलहवें और सत्रहवें रश्मि के प्रथम अंश में अत्यंत धनी ।।१३।। स्वबंधुभ्योऽधिकोऽन्येऽंशे विद्ययाऽथधनेनवा । पुत्रादिसंयुतः श्रीमांस्थ्यंशे स्यात्स्वजनेश्वरः ।।१४।। दूसरे अंश मे बंधु से अधिक प्रतापी, तीसरे अंश में विद्या, धन पुत्रादि से सुखी, चौथे अंश में अपने देश में अधिकार प्राप्त हो।।१४।। इष्टापूर्तेन संयुक्तस्त्वष्टादशोनविंशके । पूर्ववद्विंशरश्मौ तु लब्धधामपरायणः ।।१५।। पांचवें अंश में यज्ञ करने वाला, बावली, कूप, तालाब बगीचा लगाने वाला, अठारह और उन्नीसवीं रश्मि का फल सत्रहवी रश्मि के अनुसार ही होता है। बीसवीं रश्मि में भूमि प्राप्त करने वाला।।१५।। वदान्यः पूर्वधर्माणं मनुवद्बहुपुत्रकः । एकविंशे धनैर्युक्तमाद्येऽनंतरभागके ।।१६।। दानशील मनु के समान बहुपुत्रवान् हो, इक्कीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में तथा दूसरे अंश में धनी हो।।१६।। तृतीये तु भुवि ख्यातो दानेन च धनेन च । द्विनामत्वं तु वा यज्वा यानवाहनसंयुतः ।।१७।। तीसरे अंश में दान धर्म से प्रसिद्धि युक्त वाहन युक्त, यज्ञ कर्त्ता, श्रीमान् बहुधन से युक्त।।१७।। श्रीमान्वहुधनानां च साधकश्च चतुर्थके । अग्निमांन्द्येन रोगार्तश्चतुर्थे धनवान्सुखी ।।१८।। चौथे अंश में अग्नि मांद्य रोग से पीड़ित, श्रीमान्, अनेक धनों का साधन धनी सुखी होता है।।१८।। पंचमे देशयोविद्वान्वदान्यो दंतुरोऽथवा । सप्तमे धनहानिःस्याद्राजयोगैश्चमृत्युयुक् ।।१९।।