बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पञ्चमे पितृहानिं च धनायति सुतौयशः । षष्ठे रिपुसमृद्धिं च जयं बंधुसमागमम् ।।५४।। ५ भाव में पिता की हानि, धनप्राप्ति, पुत्र और यश का लाभ, ६ भाव में शत्रुवृद्धि, विजय, बंधुसमागम और धन लाभ।।५४।। अर्थवृद्धिं स्त्रियां दार मरणं नीचसेवनम् । नीचस्त्रीसंगमो मृत्यौ धननाशं पराभवम् ।।५५।। ७ भाव में स्त्री को कष्ट, नीच की सेवा और नीच स्त्रीसंगम, ८ भाव में धननाश, पराभव और अनर्थ।।५५।। पराभवमनर्थं च धर्मेपांपरुचिक्रिया । धनव्ययं च दशमे धनलाभं कुकर्म च ।।५६।। ९ भाव में पापकर्म में रुचि धन का व्यय, १० भाव में धनी, कुकर्मी हो।।५६।। लाभे धनं सुखं वस्त्रं स्वर्णक्षेत्रादिसंग्रहम् । व्यये नेत्ररुजं भ्रातृनाशं च कुरुते कुजः ।।५७।। ११ भाव में धन वस्त्र सुवर्ण-भूमि का लाभ, १२ भाव में हो तो नेत्ररोगी, भाई का अनिष्ट करने वाला होता है।।५७।। अथ बुधस्य द्वादशभावफलम् – बुधे षष्ठेऽरिवृद्धिं च युद्धे सति पराजयम् । मृतौ बंधुविहीनत्वं बंधनं व्ययभे व्ययम् ।।५८।। लग्न से पांचवें भाव तक बुध सभी भावों की वृद्धि करता है। ६ भाव में शत्रु की वृद्धि और पराजय करता है, ७ भाव में स्त्री सुख ८ भाव में बंधुहीनता और बंधन, ९ भाव में भाग्यवृद्धि, १० में व्यापार में वृद्धि, ११ भाव में लाभ और १२ भाव में खर्च कराने वाला होता है।।५८।। गुरु-शुक्रयोः द्वादशभावफलम् – भावोक्तफलवृद्धिं तु परे तु कुरुते तथा । गुरुशुक्रौ तृतीये तु शत्रुवृद्धिं धनक्षयम् ।।५९।। जिन भावों का मूल में उल्लेख नहीं किया है उन स्थानों में गुरु, शुक्र हों तो उनकी वृद्धि करते हैं तीसरे भाव में हों तो शत्रु की वृद्धि और धन का नाश करते हैं।।५९।।