बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः ॥ ७३९ षष्ठे पराजयं व्याधिमष्टमे बंधनं तथा । रिष्फे चोरहृतस्वं तु नेत्ररोगपराजयम् ॥६०॥ ६ भाव में हों तो पराजय और व्याधि करते हैं, ८ वें भाव में बंधन, १२ वें भाव में चोरों द्वारा द्रव्य का अपहरण नेत्र रोग और पराजय॥६०॥ सप्तमे च चतुर्थे च सेनापत्यधनाप्तिः । सर्वसम्पत्समृद्धिं च नवमे राजसंपदम् ॥६१॥ सातवें और चौथे में सेनापत्य, धनलाभ, सभी सम्पत्तियों की वृद्धि, नवम में राजसम्पत्ति वा भाग्योदय होता है॥६१॥ अथ शनेः स्थानान्तर फलम् – पूर्वोक्तफलसंयोगमन्येष्वपि समं भवेत् । कुजवद्रविवन्मन्दः पापत्र्यंशं दलं गतः ॥६२॥ शनि का फल भौम और रवि के भाव फल के समान ही होता है॥६२॥ पादोनमेकं मित्राधिमित्रस्वर्क्षे च कोणभे । उच्चे तु नीचे त्रिगुणमध्यरौ द्विगुणं ततः ॥६३॥ यदि ग्रह मित्रगृह का हो तो चतुर्थांश फल, अधिमित्र गृह का हो तो तृतीयांश, स्वक्षेत्र और मूलत्रिकोण का हो तो तीन भाग फल देता है, उच्चराशि का हो तो संपूर्ण फल देता है। यदि नीच राशि का हो तो तृतीयांश न्यून, अधिशत्रुगृही हो तो द्विगुणहीन और शत्रुगृही हो तो आधा फल देता है॥६२-६३॥ ग्रहाणां दृष्टिवशात् सूर्यादीनां फलम् – अरौ सार्धं क्रमात्कालफलजस्त्वेवनिर्णयः । शुभैर्दृष्टो रवी राजा राजसेनापतिस्तु वा ॥६४॥ यदि सूर्य शुभग्रह से देखा जाता हो तो राजा वा राजा का सेनापति हो॥६४॥ शत्रुभिः कलहं दुःखं रूजं जठरनेत्रयोः । मित्रदृष्टो जयं बंधुलाभं पापैश्च रोगिताम् ॥६५॥ शत्रुओं से देखा जाता हो तो कलह, पेट और नेत्र में रोग हो मित्रग्रह से देखा जाता हो तो विजय और बंधु से लाभ तथा पाप ग्रह से देखा जाता हो तो रोगी हों॥६५॥