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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

७५० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पाराशर जी बोले— हे द्विजश्रेष्ठ ! सत्ययुग में धर्म की पूर्णता के कारण मनुष्य तपस्वी होते थे इस कारण भूत, भविष्य और वर्तमान को जानते थे।।२।। त्रेतायां तपसा युक्ताः केचिज्जानन्ति वै द्विजाः । पश्यन्ति द्वापरे शास्त्रज्ञानेन तपसापि च ।।३।। हे द्विज! त्रेता में केवल तपस्या से कुछ लोग जानते थे। द्वापर में तपस्या और शास्त्रज्ञान द्वारा जानते थे।।३।। कलौ युगे तु धर्मस्य पादमात्र व्यवस्थितिः । तपः शक्त्या तु तज्ज्ञातुं न शक्ता मानवाभुवि ।।४।। और कलियुग में १ चरण ही धर्म रहता है अतः तपस्या द्वारा ज्ञान को नहीं प्राप्त कर सकते हैं।।४।। ज्योतिषशास्त्रज्ञाने उपायः- तथात्र परमः शंभुर्लोकानुग्रहकांक्षया । लक्षीकृत्य निजां शक्तिं विद्यामाधत्स ईश्वरः ।।५।। संसार के ऊपर अनुग्रह की बुद्धि से परमदयालु श्री शंकरजी अपनी शक्ति से आदि विद्या त्रिकालज्ञान को देने वाली अपनी कला से विभक्त कर उत्पन्न किया।।५।। कलापि च विभक्तानां त्रिकालज्ञानदायिनी । वेदादि वाग्भवागौरीवदद्वयमथोगिरिः ।।६।। परमैश्वर्यसिद्ध्यर्थ वाग्भवास्यादयं मनुः । सर्वज्ञेतिपदं पूर्व नाथ तं पार्वतीपते ।।७।। सर्वलोकगुरोः पश्चाच्छिवेति द्वयमक्षरम् । शरणं तु पदं पश्चात्त्वां प्रपन्नोऽस्मितत्परम् ।।८।। पालयेति पद ज्ञानं प्रदापय ततः परम् । वह मंत्र निम्नलिखित हैं 'ॐ ऐं गौरी वदवदगिरिपरमैश्वर्य सिध्यर्थं ऐं' यह शक्ति का मंत्र है। "सर्वज्ञनाथपार्वतीपते सर्वलोकगुरो शिव शरणं त्वां प्रपन्नोस्मि पालय ज्ञानं प्रदापय" यह शिवजी का मंत्र है।।६-८।। विनियोगादिकम् - ऋषिस्तु दक्षिणामूर्तिर्गौरी परमेश्वरी तथा ।।९।।

७५१ प्रश्नाध्यायः । सर्वज्ञश्च शिवो देवो गायत्रीछंद ईरितत् । अनुष्टुप् च षडंगं स्याद्वाग्भावेन हृदयादि च ॥१०॥ विनियोग— अनयोऽमन्त्रयोः दक्षिणामूर्त्तिर्ऋषिः गौरी परमेश्वरी सर्वज्ञः शिवश्च देवते गायत्र्यनुष्टुभौ छंदसी ज्योतिःशास्त्रज्ञानप्रादाये जपे विनियोगः, इसके बाद "ऐं" इस बीज से षडंगादि न्यास करे जो आगे कह रहे हैं॥९-१०॥ ध्यान- उद्यानस्यैकवृक्षाधः परे हैमवते द्विज । क्रीडंती भूषितां गौरीं शुक्लवस्त्रां शुचिस्मिताम् ॥११॥ हिमालय पर्वत के ऊपर बगीचे में एक वटवृक्ष के नीचे सफेद वस्त्र को धारण की हुई प्रसन्न मुख क्रीडा करती हुई बैठी हुई हैं॥११॥ देवदारुवने तत्र ध्यानस्तिमितलोचनम् । चतुर्भुजं त्रिनेत्रं च, जटिलं चन्द्रशेखरम् ॥१२॥ और इसी प्रकार उसी बगीचे में देवदारु वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न आंखों को मूंदे हुये चार भुजाओं वाले तीन आंखों वाले जटा धारण किये हुये मस्तक में चन्द्रमा को धारण किये हुये शंकर जी बैठे हैं॥१२॥ शुक्लवर्णं महादेवं ध्यायेत्परममीश्वरम् । अनेनाभ्यां द्विजश्रेष्ठ बुद्धिस्तु विमलाभवेत् । जयमात्रेण सिद्धिः स्याद्दैवज्ञत्वं प्रकाशते ॥१३॥ इस प्रकार पार्वती और शुक्लवर्ण शंकर का ध्यान करके यथाशक्ति जप को करे। हे मैत्रेय! इन दोनों मंत्रों के पुरश्चरण करने से निर्मल बुद्धि होकर ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान होने से वह दैवज्ञ होता है॥१३॥ दैवज्ञ लक्षणम् - द्विविधं गणितं ज्ञात्वा शाखास्कंधं विमृश्य च । होरा स्कंधत्य शकले श्रुत्वार्थमवधार्य च ॥१४॥ जो द्विज श्रेष्ठ दोनों गणितों को जानकर तथा जातक के दोनों भागों को गुरु से पढ़कर उसको धारण करता है॥१४॥ वाग्मी द्विजवरो यः स्यान्न वंध्या तस्य भारती ॥१५॥ वही उत्तम दैवज्ञ होता है और उसकी वाणी मिथ्या नहीं होती है॥१५॥ ५।।

७८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । प्रश्नकर्तुः नियमः- अलुब्धो नैष्ठिकः शुद्धो विनय प्रश्रयान्वितः । रत्नं स्वर्णं धनं वस्त्रं पुष्पमूल फलानि तु ॥१९६॥ दैवज्ञपुरतो दत्वा पृच्छेदिष्टं प्रियान्वितः । त्यागी, निष्ठावान्, निष्कपट, विनयादि गुणों से युक्त जो प्रश्नकर्ता वह रत्न, वस्त्र, सुवर्ण धन पुष्प, फलादि को दैवज्ञ के सामने रख के मीठे वचनों से अपने अभीष्ट को पूछे॥१९६॥ दैवज्ञस्य कर्त्तव्यः- अथ प्राङ्मुख आसीनः शुचिर्दैवविदग्रतः ॥१९७॥ दैवज्ञ प्रश्न के समय पवित्र होकर पूर्व मुख बैठकर ॥१९७॥ तिर्यगूर्ध्वाश्चतस्रस्तु रेखा रज्जुसमालिखेत् । एकीकुर्यात्तु चत्वारि मध्यस्थानि पदानि च ॥१९८॥ चार रेखा तिरछी और चार खड़ी रेखा को लिखे। ऐसा करने से १६ कोष्ठ का चक्र होगा। मध्य के चार कोष्ठों में ॥१९८॥ तत्र पद्मं लिखेद्रखामध्ये सकर्णिकम् । ईशान्यकोष्ठादारभ्य मीनाद्या राशयः क्रमात् ॥१९९॥ कर्णिका के साथ कमल को बनावे इसमें ईशान कोण से आरम्भ कर मीनादि राशियों को लिखे॥१९९॥ मेषवीथी वृषाद्यास्तु कौर्प्याद्या मिथुनस्य तु । वीथयो मीनमेषौ तु तुलाकन्ये वृषस्य तु ॥२००॥ चक्र में वृष से सिंह पर्यन्त चार राशियों की मेषवीथि, वृश्चिक से चार राशियों की मिथुन वीथि और मीन, तुला, कन्या राशियों की वृषवीथि संज्ञा जानकर ॥२००॥ आरूढात् वीथिभं यावत्तावच्छत्रं तु लग्नतः । आरूढराशिल्लग्नं चेच्छत्रं चापि भवेत्तथा ॥२०१॥ आरूढ़ लग्न का ज्ञान करे। प्रश्नकर्त्ता जिस दिशा में बैठा हो उस दिशा के नाम को आरूढ़ लग्न कहते हैं अथवा प्रश्नकर्त्ता से राशिचक्र में अंगुली को धरावे राशि में अंगुली धरै वही आरूढ़ लग्न होती है। आरूढ़ लग्न से वीथि की पर्यन्त छत्र होता है। यदि आरूढ़ राशि ही प्रश्नलग्न हो तो वही छत्र होता ।

प्रश्नाध्यायः । ७५३ जन्मलग्नं समासाद्य यद्यत्प्रोक्तं तु जातके । तत्सर्वं प्रश्न लग्नेन प्रश्नकालाद्वदेद्बुधः ।।२२।। इसका विचार कर जन्मलग्न से जिस प्रकार विचार किये जाते हैं उसी प्रकार यहां भी सभी बातों का विचार करे।।१७-२२।। आरूढ़लग्नादायुर्निर्णयः- यत्कालावधिलग्नं तत्तत्कालावधिस्थिते । तेषां बलवतां चैव निर्णयः स्वायुषाः स्मृतः ।।२३।। तात्कालिक लग्न की जितने काल पर्यन्त स्थिति है उतनी ही आयुष्य की स्थिति होती है।।२३।। आद्यद्रेष्काणमंत्यं च मृत्युदं च क्रमाद्भवेत् । मृगालिकर्कटानां च मीनस्यारूढ़लग्नतः ।।२४।। मकर, वृश्चिक और कर्क तथा मीन राशि का आरूढ़ लग्न से प्रथम और अंत द्रेष्काण हो तो मृत्युदायक होता है।।२३-२४।। मृत्युलक्षणम् - लग्ने पृष्टोदये क्रूरवेश्मास्तव्यगा यदि । धनेधर्मे कुजे मंदे चन्द्रे रंध्रे मृतिर्भवेत् ।।२५।। यदि पृष्ठोदय राशि में प्रश्न हो और पापग्रह लग्न से ४।७।१२ वें स्थान में हों अथवा भौम २।९ भाव में हो शनि चंद्र ८ भाव में हों तो मृत्यु होती है।।२५।। योगान्तरम् - पापैदुरुधो जाते लग्नकामसुहृत्स्थिते । चन्द्रेऽर्के च विलग्नस्थे म्रियतेव्याधिना भृशम् ।।२६।। राहुकाल समायोगेमरणं निश्चितं भवेत् । प्रश्न लग्न वा जन्म लग्न में पापग्रह से दुरूधरा योग हो अथवा लग्न ७।४ भाव में पापग्रह हों और सूर्य लग्न में हो राहु काल का योग हो तो निश्चय ही व्याधि से मृत्यु होती है।।२६।। राहुकालसमायोगलक्षणम् - भेषाद्व्युत्क्रमतो राहुर्वृषात्कालः क्रमाच्चरेत् ।।२७।। राशौ राशौ तु पंचाशद्भोगकालोविनाडिकाः । अर्कोदयादितश्चोभौ भुंजाते च पुनः पुनः ।।२८।।

द्र-श-शीं-द्रा-ग्नी (8) Then: रा-क्ष-सा-श्च (4) त-तः (2) प-रम् (2) 4 + 2 + 2 = 8 syllables! "राक्षसाश्च ततः परम् ।" Yes!

Now let's examine line : वायुरक्षः शशींद्रेशपावतांक वारूणाः ।।३४।। Wait, let's look at : वा (vā) यु (yu) र (ra) क्षः (kṣaḥ) श (śa) शीं (śīṁ) द्रे (dre) श (śa) पा (pā) व (va) तां (tāṁ) क (ka) - wait! Is it 'पावतांक'? Let's look at 'तां': 'त' with 'ा' and anusvara 'ं'! Wait, could it be 'पावकांक'? Look at 'तां': it has a left curved stroke of 'त', not a loop of 'क'! Wait, but after 'तां' there is 'क'! "पावतांक" or "पावकां"? Wait, look at the letters: पा - व - तां - क - wait, or पा - व - कां - श? Let's zoom in a lot on middle: "शशींद्रेशपावतांक" Letters

प्रश्नोध्यायः । ७५५ अथ द्वितीयभावादष्टमभावपर्यन्तं- नृपा मूर्छा शरास्तत्वं तिथिशोड़श पंच च । द्वितीयेत्वष्टमे भावस्त्वंतरे त्वनुपाताः ॥३७॥ द्वितीय भाव में १६, तृतीय भाव में २१, चतुर्थभाव में ५, पंचम भाव में २५, षष्ठभाव में १५, सप्तम भाव में १६, अष्टम भाव में ५ ये रश्मियां होती हैं। अन्य भावों का अनुपात द्वारा पीछे कह चुके हैं॥३७॥ नागाब्देषु गुणा रूद्रा वाजिवेदांगपंक्तयः । दशपंचाष्टका मेषाद्रश्मयः संप्रकीर्त्तिता ॥३८॥ मेषादि राशियों में क्रम से ८, ८, ५, ३, ११, ७, ४, ६, १०, १०, ५, ८ होती हैं॥३८॥ एकयोगे तु सर्वेषु व्याधिर्द्धाभ्यां भवेन्मृतिः । लक्ष्मियोगेषु सर्वेषु व्याधिस्तस्यनवाऽपि वा ॥३९॥ पीछे जो मरण योग कहे हैं उनमें यदि लक्ष्मी योग भी हो तो कभी मरण होता है कभी नहीं होता है॥३७-३९॥ अथ रोगिणः मृत्युसंबंधी प्रश्नः- वैधृतौ च व्यतीपाते सार्पभैंतिमसंज्ञिते । कुलीरे विषनाडीषु सूर्यदुष्टेषु पंचसु ॥४०॥ यदि प्रश्न समय वैधृति, व्यतीपात, श्लेषा, रेवती, कर्काश, विषनाडी भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि ये सूर्य से दूषित हों॥४०॥ पापयुक्ते तु नक्षत्रे राशौ तत्संयुतेऽपि च । सन्धौ च मासशून्यार्था तिथिराशिषु जन्मभे ॥४१॥ पापयुक्त नक्षत्र हो राशि पापग्रह से युत हो, राशि संधि हो, मास की शून्य राशि तिथि नक्षत्र हो, जन्म का नक्षत्र हो॥४१॥ व्ययाष्टमे च क्षीणेन्दौ शत्रुग्रहनिरीक्षिते । पादं पृष्ठं च जंधां च जानु नाभिं च गुल्फके ॥४२॥ लग्न से १२।८ भाव में क्षीण चन्द्र हो और शत्रुग्रह से दृष्ट हो, पैर, पीठ, जंघा, जानु, नाभि, गुल्फ (एड़ी)॥४२॥ कर्णौ च चक्षुषी भालमास्यं कंठं स्पृशेद्यदा । व्याधिर्वाम्रियते तद्गन्भृतिं राशिं स्पृशेत्तु वा ॥४३॥

७५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कान, नेत्र, ललाट, मुख, कंठ को स्पर्श करता हो, तो व्याधि वा मृत्यु होती है अथवा काल राहु स्पर्श करे।।४३।। अष्टमर्क्षं स्पृशेद्यद्वा कालांशादिषु वा तथा । विपद्वधप्रत्यरृक्षे च वैनाशं ऋक्षमेव वा ।।४४।। आठवीं राशि को स्पर्श करे, षोडशांश को अथवा विपत्तारा वैनाशिक नक्षत्र को।।४४।। संस्पृशेत्प्रश्नकाले तु व्याधिर्वा तस्य वा मृतिः ।।४५ ।। स्पर्श करे तो व्याधि वा मृत्यु हो।।४५।। नक्षत्रक्रमेणकालांस्यावयवाः- शिरोललाटभ्रूनेत्रनासाकर्णकपोलकाः । ओष्ठं च त्रिवुककंठमंशौहृदयमेव च ।।४६।। पार्श्वौ च वक्षः कुक्षिश्चनाभिश्चकटिरेव च । जघनं च नितंबं च लिङ्गमंडं च वस्ति च ।।४७।। ऊरू च जानु जंघा च गुल्फांघ्रीचाश्विभात्क्रमात्। अश्विनी से आरम्भ कर रेवती पर्यन्त २७ नक्षत्रों का क्रम से शिर आदि २७ अंग होते हैं।।४६-४७।। प्रश्नकर्त्तुः अशुभलक्षणं तथा शुभप्रश्नः- तैलाभ्यक्तोऽथवाशुद्धोजलगर्तसमीपगः । प्रष्टा दैवविदे वाथ मरणं तस्यनिर्दिशेत् ।।४८ ।। यदि प्रश्नकर्त्ता तेल लगाये हुये हो, अशौच में हो, जल के गड्ढे के समीप होकर प्रश्न करें और इसी स्थिति में ज्योतिषी हो और प्रश्न का उत्तर दे तो मृत्यु कहना।।४८।। लग्नत्रिसुतकामारिधर्मार्ययगः शुभः । रोगशांतिकरा नो चेद्रिपुनीचग्रहस्थिताः ।।४९।। प्रश्न लग्न से ३।५।७।६।९।११ स्थानों में शुभग्रह हो तो रोगप्रश्न में रोग शांत होगा ऐसा कहे।।४९।। एषु पापा मृतिकरानोचेत्स्वर्क्षोच्चमित्रगाः । यस्य यस्य शुभं वाथ रिःफस्थानगता शुभाः ।।५०।। यद्वा त्रिकोणकेन्द्रस्थास्तस्य तस्य शुभप्रदाः ।

प्रश्नाध्यायः । ७५७ यदि पूर्वोक्त स्थान में पापग्रह हों तो मृत्यु कहना। किन्तु शुभग्रह नीचादि स्थान में और पापग्रह उच्चादि स्थान में न हों तो पूर्वोक्त फल होता है। १ । २ । ९ । ५ । १ । ७ । १० इन स्थानों में जन्मलग्न से वा प्रश्नलग्न से शुभग्रह हों तो शुभ फल होता है ।।५०।। अयनादि ज्ञानम् - मृगकर्क्यादितः सूर्याराशिपूर्वापरार्धतः । शनिशुक्रारचंद्रज्ञगुरवः शिशिरादयः ।।५१।। जन्मकाल या प्रश्नकाल में मकरादि ६ राशि के अन्दर सूर्य हों तो उत्तरायण और कर्कादि ६ राशि के अंदर हों तो दक्षिणायन होता है। इसी प्रकार मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष, मिथुन राशियों के पूर्वार्ध में क्रम से शनि, शुक्र, भौम, चंद्र, बुध, गुरु हों तो क्रम से शिशिर वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त ऋतु कहना इसी प्रकार से कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन राशियों के उत्तरार्ध में यदि पूर्वोक्त ग्रह हों तो शिशिर आदि ऋतु कहना।।५१।। अर्को ग्रीष्मस्ततोऽन्यैर्वा वायनादृतुरेव च । शुक्रारमंदचंद्रज्ञ जीवाश्च परिवर्तिताः ।।५२।। इसी प्रकार प्रश्न लग्न में सूर्यादि ग्रह हों तो भी ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, वसंत ऋतु कहना। अथवा अयन से ऋतु कहना। शुक्र, मंगल, शनि, चंद्र, बुध, गुरु इनमें जो द्रेष्काधिपति हो उसके ऋतु को कहना वा जो नवांश हों उससे ऋतु कहना।।५२।। वर्ष-मास-तिथिज्ञानम् - लग्नद्रेष्काणपाः प्रोक्ता नवांशेनैव चापरे । तत्पूर्वपरतो मासौ तिथिः स्यादनुपाततः ।।५३।। जो पूर्व प्रकार से ऋतु निर्णीत हुआ हो वह यदि राशि के पूर्वार्ध की हो तो उस ऋतु का पूर्वमास और उत्तरार्ध की हो तो उत्तर मास जानना चाहिये। ऋतु के भुक्त भोग्य द्वारा अनुपात करके तिथि का ज्ञान करना चाहिये।।५३।। वर्ष ज्ञानम् - लग्नत्रिकोणगो जीवो नवांशस्थोऽथवा भवेत् । ज्ञात्वा वयोऽनुरूपेण ह्यनुमानवशात्समाः ।।५४।। प्रश्न लग्न से त्रिकोण (९।५) में गुरु जिस राशि में हो उसी राशि के गुरु में जन्म हुआ है, यदि गुरु त्रिकोण में न हो तो जहां कहीं जिस राशि में जिस नवांश में हो उस नवांश राशि के गुरु में जन्म कहना। किन्तु अवस्था के अनुमान से वर्ष का निर्णय करना चाहिये।।५४।।

७५८ - बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्यस्थितांशतुल्यां वा तिथिं प्रोवाच भार्गवः । राशौ रात्रिदिवाख्ये च जन्म स्यात्तु विलोमतः ॥५५॥ तिथिज्ञान-सूर्य जिस त्रिंशांश में है उसके तुल्य तिथि कहना ऐसा शुक्राचार्य का मत है। दिन-रात्रि का ज्ञान— प्रश्नलग्न राशि बली हो तो दिन में और दिवा बली हो तो रात्रि में जन्म कहना।।५५।। प्राण-लग्नादेः ज्ञानम् - गतप्राणैर्जन्मकाले ते च प्राणा भवन्त्यथ । यद्राशिगः शशी मासः समं वा स्पृशदंगकम् ॥५६॥ प्रश्न समय जितने प्राण बीत चुके हों उतने ही प्राण जन्म समय में जानना चाहिये। मास-राशि-लग्न का ज्ञान - प्रश्न समय जिस राशि का चन्द्र हो उसी राशि के नाम वाला मास होता है जैसे मेष में चैत्र आदि।।५६।। तत्रिकोणावलाधिक्यं राशिर्लग्नात्तु यावति । चंद्रस्तावतिभं चापि जन्मलग्नं विनिर्दिशेत् ॥५७॥ प्रश्न समय में चन्द्रमा जिस राशि को स्पर्श करता हो चाहे सम हो या विषम इससे त्रिकोण की जो राशि दोनों में बली हो वही राशि होती है। मेषादि गणना से जितने संख्यक राशि पर चन्द्र हो उतनी ही संख्या की लग्न होती है। जैसे मीन प्रश्न लग्न हो तो मीन राशि अन्य लग्नों से अन्य राशि जानना।।५७।। जन्मनक्षत्र ज्ञान- मीने मीनं तु लग्नं वा तथान्यैस्त्वन्य लग्नभम् । छायया संयुता यामवार्क्षतिथिराशयः ॥५८॥ प्रश्न समय प्रश्नकर्त्ता के छाया को पैर से नाप कर उसमें प्रहर, वार, तिथि को जोड़ दे २७ से अधिक हो तो २७ से भाग देकर शेष संख्या के तुल्य धनिष्ठादि नक्षत्र होता है।।५८।। यावंस्तस्तु धनिष्ठादिजन्मनक्षतद्विनिर्दिशेत् । कालांशादिषु यत्रोक्तमृक्षं तद्वा भवेदिदम् ॥५९॥ अथवा पूर्व में कालांशादि में जो नक्षत्र कहा है वही नक्षत्र होता है। कालांश का आधां होरा कहा है वही होरा होती है।।५६-५९।। प्रकारांतरेणमासादिज्ञानम् - कालांशाद्यर्धहोरानां प्रोक्तहोरैर्विभावयेत् । पृथग्लिप्तीकृतं लग्नं वर्गणाभिर्हतं पुनः ॥६०॥

प्रश्नाध्यायः। ७५९ प्रश्न लग्न का कलापिंड बनाकर उसके वर्ग से गुणाकर दो स्थान में रखकर।।६०।। आरूढ़छत्रयोवीर्यवलस्य वर्गणाहतम् । ओजे योगः समे हानिरिति तस्य विधीयते ।।६१।। आरूढ़ और छत्र में जो बली हो उसके वर्ग से गुणाकर विषम लग्न हो तो योग अन्यथा पृथक्स्थ में घटाकर।।६१।। स्वैः स्वैर्भागैश्च भक्तं तत्तथा मासादयःस्मृताः । यद्वा कलीकृतं लग्नं तथा कुर्याद्विचक्षणः ।।६२।। शेष में अपने २ विभाग से (मास ज्ञान के लिये १२ दिन के लिये ३० आदि से) भाग देने से मासादि का ज्ञान होता है। अथवा लग्न का कला बनाकर पूर्वरिति से सभी क्रियाओं को करके।।६२।। भावकस्य च शुद्धिं च योगं चैव करोत्यतः । नवभिश्च कलांशाद्यैस्तथैवोच्चादिभिःक्रमात् ।।६३।। भाव शुद्धि आदि क्रियाओं को करके नवकलांश और उच्च त्रिकोणादि भेद से।।६३।। एकाशीतिभिदाः संति नवकाद्यंक शोधनैः । येषां योगगते काले समांतेषु सतां यतः ।।६४।। ८१ प्रकार को करके उनमें नव शोधनादि करते हुये जहां अवसान हो वहीं मासादि जानना।।६४।। लग्न बल विचारः- राशिस्तु बलवान्स्वामिगुरुज्ञप्रेक्षणान्वितः । अन्यैः पापैरादृष्टः स्याच्छुभदृष्ट्या प्रयोजयेत् ।।६५।। जो राशि अपने स्वामी वा गुरु, बुध से दृष्ट हो, अपने पापग्रह स्वामी को छोड़कर अन्य पापग्रहों से अदृष्ट हो वह बली होती हैं।।६५।। दृष्टिविचारः। चन्द्रर्काचार्यशुक्रज्ञाः पादं मित्रभकर्मणि । पश्यन्ति *च शनिः पूणमथ धर्मसुतौ गुरुः ।।६६।। चन्द्रमा, सूर्य, गुरु, शुक्र, बुध और भौम तीसरे और दशम को पाद दृष्टि से देखते हैं। शनि ३।१० को पूर्ण दृष्टि से देखता है, ९।५ को सभी ग्रह दो

७६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चरण से किन्तु गुरु पूर्ण दृष्टि से देखता है।।६६।। सर्वेऽर्धबंधुमृत्यु च पूर्णं पश्यति भूमिजः । परे त्रिपादं पूर्णं च सर्वे पश्यंति सप्तमम् ।।६७।। ४।८ स्थान को भौम को छोड़कर सभी ग्रह तीन चरण से देखते हैं किन्तु भौम पूर्णदृष्टि से देखता है और सप्तम को सभी पूर्णदृष्टि से देखते हैं।।६७।। अथ ग्रहाणां स्थानदिग्बलम् - उच्चमूलसुहृत्स्वर्क्षस्वद्रेष्काणनवांशके । स्थितस्य स्थानवीर्यं स्यात्कुजार्कौंदशमेशानिः ।।६८।। प्रश्न में जो ग्रह अपने उच्च, मूलत्रिकोण, मित्र, अपनी राशि, अपने द्रेष्काण, अपने नवांश में हो तो वह स्थानवली होता हैं। भौम, सूर्य दशम स्थान में।।६८।। सप्तमेऽज्ञगुरुर्लग्ने चन्द्रशुक्रौ तु वेश्मनि । दिग्वीर्य संयुता एते नान्यत्र प्रश्न कर्मणि ।।६९।। सातवें स्थान में शनि, बुध, गुरु लग्न में, चन्द्र, शुक्र चौथे भाव में दिग्बली होते हैं।।६८-६९।। अयनबलम् - मृगादिराशिष्ट्कस्थाश्चंद्रार्कज्ञार्यभार्गवाः । बलवंतः कुजार्कीतु कर्कटादिगतौ तथा ।।७०।। मकर से ६ राशि तक चंद्र, सूर्य, बुध, गुरु और शुक्र अयन बल को प्राप्त करते हैं। कर्क से ६ राशि के अन्दर भौम शनि अयन बल से युक्त होते हैं।।७०।। अथ पक्ष चेष्टा दिवा-रात्रि बलम् - पूर्वपक्षे शुभे कृष्णे पापास्तुवलिनस्तथा । वक्रिणो बलिनः खेटाश्चेष्टावलसमन्वितः ।।७१।। शुक्ल पक्ष में शुभग्रह और कृष्णपक्ष में पापग्रह बली होते हैं। वक्रीग्रह चेष्टावली होते हैं।।७१।। शुभाः पापादिवारात्रौ वलिनः स्युः क्रमात्स्मृताः । निसर्गवलिनः प्राग्वदेवं स्युः प्रश्नकर्मणि ।।७२।। शुभग्रह दिवावली और पापग्रह रात्रिबली होते हैं। निसर्गबल पूर्वोक्तवत् जानना चाहिये। इस प्रकार प्रश्नकाल में बलों को जानना चाहिये।।७२।।

प्रश्नाध्यायः । ७६१ दशवर्गबलम् - लग्नहोराद्रेष्काणार्कनवांशाः सप्तमांशकः । कलांशः कालहोरा च त्रिंशांशःषष्ठिभाजकः ।।७३।। पूर्वपूर्वोवलीप्रोक्ता न बली चोत्तरोत्तरः । लग्न, होरा, द्रेष्काण, द्वादशांश, नवांश, सप्तांश, षोडशांश, कालहोरांश, त्रिंशांश और षष्ठ्यंश यह उत्तरोत्तर हीनबली होते हैं।।७३।। प्रश्नलग्नाज्जन्मलग्नादीनांज्ञानम् - प्रश्नलग्नं कलीकृत्य नवघ्नं भेन भाजितम् ।।७४।। प्रश्न लग्न का कला करके नव से गुणाकर २७ का भाग देने से।।७४।। लब्धं नवांशकं ज्ञेयं शिष्टमेकत्रसंस्थिते । लब्धं सप्तगुणं वेदभक्तं शिष्टमिहांशकः ।।७५।। लब्धिनवांश होता है शेष को पृथक् रखना, लब्धि को सात से गुणाकर ४ से भाग देना लब्धि नवांश होती है।।७५।। नवांशसदृशं लग्नं यद्वा त्रिघ्नार्कभाजितम् । सप्ताप्तशिष्टं लग्नं च सप्तमे मासि निश्चिते ।।७६।। सौम्येतदेव कर्मक्षं जन्मक्षं वा भवेद्वलम् । इसी के समान जन्मलग्न होता है। अथवा त्रिगुणित करके १२ से भाग देना जो शेष हो वही जन्मलग्न होता है। अथवा शेष को सात से भाग देने से जो आवे वह सातवें मास का लग्न जानना। शुभग्रह की राशि हो तो वही कर्मनक्षत्र वा जन्मनक्षत्र जानना।।७६।। शास्त्रस्य वेदांगत्वप्रतिपादनम् - इदं शास्त्रं मया प्रोक्तमाद्यंतं तव सुव्रत ।।७७।। हे मैत्रेय! मैंने जो यह आद्यंत ज्योतिष शास्त्र को कहा है।।७७।। नाशिष्याय प्रदातव्यं नापुत्राय कदाचन । गुणशीलयुतायैव शिष्यायैव द्विजातये । दातव्यं तु प्रयत्नेन वेदांगमिदमुच्यते ।।७८।। वह कुपुत्र, कुशिष्य को कभी नहीं देना। जो गुणी, शीलसंयुक्त शिष्य हो और द्विजाति हो उसे प्रयत्नपूर्वक देना चाहिये क्योंकि यह वेदांग है।।७८।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽष्टादशोऽध्यायः ।।१८।।

७६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अध्यायानुक्रमः ।। ९९ ।। अध्यानुक्रमं वक्ष्ये त्वादौ शास्त्रावतारणम् । प्रादुर्भावो ग्रहाणां तु द्वितीये च प्रकीर्त्तितः ।। १ ।। ततो राशिस्वभावश्च चतुर्थे दृष्टिवर्णनम् । गर्भाधानं ततः पश्चात्सूतिकाविधिरेव च ।। २ ।। अरिष्टं सप्तमाध्याये सुतस्य तदनंतरम् । पित्रोश्च मातुलादीनां तद्भंगोदशमात्स्मृतः ।। ३ ।। धूमाद्येकादशे मिश्रः पंचागानां फलं तथा । कारकादि फलं तद्भावानां च फलं तथा ।। ४ ।। द्वादश द्वादशाऽध्याये द्विग्रहाद्याश्चषट्स्मृताः । अष्टवर्गादि चैकस्मिन्नाभसादिस्तु चापरे ।। ५ ।। चिरायुषादि योगांश्च पंचाध्यायास्ततः परम् । राजयोगास्तथावस्था अंतर्दायविधिस्ततः ।। ६ ।। दायानां च फलं सप्तस्वांतर्दायस्त्रयोदश । लक्षणं शुभवर्गाणां योगादिषु बलं ततः ।। ७ ।। एवमशीतिरध्यायाः पूर्वभागे समीरिताः । स्पष्ट है।।१-७।। उत्तरार्धस्यानुक्रमणिका- कलौ युगे ततः प्रोक्तं प्रथमेऽष्टकवर्गकः ।। ८ ।। द्वितीये भावदृग्वीर्यमिष्टकष्टबलं ततः । चतुर्थे रश्मिसंभूतिरिष्टकष्टं द्विजोत्तम ।। ९ ।। लोकयात्रैकदेशे च पंचमे च ततः परम् । त्रयं च लोकयात्राणादेकदेशस्यचाष्टमे ।। १० ।। नवमे लोकयात्रा च दशमे दाय एव च । अंतर्दायस्तथाध्याये दायानां विषयस्ततः ।। ११ ।।

शास्त्र फलं तथा शास्त्र परम्परा । ७६३ त्रयोदशे तथा भाग्यं कलांशादि फलं द्विज । चतुर्दशेऽब्दचर्या च विजानीहि ततः परम् ।।१२।। अब्दचर्या फलं पश्चान्मासचर्या फलं ततः । दिनचर्या ततः प्रश्न जातकं प्रब्रवीति हि ।।१३।। अध्यायानुक्रमं पश्चाद्विंशे शास्त्रफलं द्विज । एवं होराशताध्यायी सर्वपाप प्रणाशिनी । युगेषु च चतुर्ष्वेव प्रत्यक्षफलदायिनी ।।१४।। स्पष्ट ही है।।८-१४।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे एकोनविंशतितमोऽध्यायः ।।१९।। शास्त्र फलं तथा शास्त्र परम्परा ।।२०।। होराशास्त्रमिदं सर्वं श्रद्धाविनयसंयुतः । श्रुत्वा गुरुमुखादेव बुद्धिमानवलोक्य च ।।१।। इस होराशास्त्र को बुद्धिमान् श्रद्धा विजय से युक्त होकर गुरु के मुख से सुनकर और देखकर ।।१।। यो यानाति सशास्त्रार्थं सर्वपापैः प्रमुच्यते । श्रावयेद्दर्शयेद्विद्वानन्यो गर्गो द्विजोत्तमः ।।२।। सर्वपापविनिर्मुक्तोब्रह्मलोकं स गच्छति । जो शास्त्र के अर्थ को जानता है वह सभी पापों से छूट जाता है और ऐसा विद्वान दूसरे को सुनाता और दिखाता है वह दूसरा गर्ग होता है और सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।।२।। वेदेभ्यश्चसमुद्धृत्यब्रह्मा प्रोवाच विस्तृतम् ।।३।। यह वहीं वेदाङ्ग और वेद का नेत्ररूपी शास्त्र है जिसे ब्रह्माजी ने वेद से निकाल कर गर्गऋषि को बताया था और गर्गजी से मैंने सुना ।।३।। शास्त्रमाद्यं तदेवेदं वेदाङ्गं वेदचक्षुषी । गार्गस्तस्मादिदं प्राह मया तस्माद्यथातथा ।।४।। तदुक्तं तव मैत्रेय शास्त्रमाद्यंतमेव हि ।।५।। हे मैत्रेय ! उसी शास्त्र को आद्यंत मैंने तुमसे कहा है ।।१-५।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे विंशोऽध्यायः ।।२०।।

७६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथान्तर्दशादिचक्रम्।

सूर्यन्तर्दशाचक्रम्।

ग्रसूचंमंराबृबुकेशु
मा१०१११०
दि१८२४१८१२

चन्द्रान्तर्दशाचक्रम्।

ग्रचंमंराबृबुकेशुसू
मा१०
दि.

भौमान्तर्दशाचक्रम्।

ग्रमंराबृबुकेशुसूचं
मा११११
दि२७१८२७२७

राहोरन्तर्दशाचक्रम्।

ग्रराबृबुकेशुसूचंमं
मा१०१०
दि१२२४१८१८२४१८

गुरोरन्तर्दशाचक्रम्।

ग्रबृबुकेशुसूचंमंरा
मा११११
दि१८१२१८२४

शनेरन्तर्दशाचक्रम्।

ग्रबुकेशुसूचंमंराबृ
मा१११०
दि१२१२

बुधान्तर्दशाचक्रम्।

ग्रबुकेशुसूचंमंराबृ
मा१११०१०११
दि२७२७२७१८

केतोरन्तर्दशाचक्रम्।

ग्रकेशुसूचंमंराबृबु
मा११११
दि२७२७१८२७

अन्तरदशादिचक्रम् । ७६५ भृगोरन्तर्दशाचक्रम्। सूर्य की दशा में सूर्य के अन्तर में प्रत्यन्तर

प्रशुसूचंमंराबृबुकेप्रसूचंमंराबृबुकेशु
मा१०मा
दिदि१६१४१७१५१८
१८१२२४१८१८
सूर्य की दशा में चन्द्रमा के अन्तर सूर्य की दशा में भौम के अन्तर में
में चन्द्रमा का प्रत्यंतर प्रत्यंतर
प्रचंमंराबृबुकेशुसूप्रमंराबृबुकेशुसूचं
---------------------------------------------------------------
मामा
दि१५१०२७२४२८२५१०दि१८१६१९१७२११०
३०३०३०३०२१५४४८५७५१२११८०३
सूर्य की दशा में राहु के अन्तर में सूर्य की दशा में गुरु के अंतर में
प्रत्यन्तर प्रत्यन्तर
प्रराबृबुकेशुसूचंमंप्रबृबुकेशुसूचंमंरा
---------------------------------------------------------------
मामा
दि१८१३२११५१८२४१६२७१८दि१५१०१६१८१४२४१६१३
३६१२१८५४५४१२५४२४३६४८४८२४४८१२
सूर्य की दशा में शनि के अन्तर में सूर्य की दशा में बुध के अंतर में
प्रत्यंतर प्रत्यंतर
प्रबुकेशुसूचंमंराबृप्रबुकेशुसूचंमंराबृ
---------------------------------------------------------------
मामा
दि२४१८१९२७१७२८१९१९१२दि१३१७२११५२५१७१५१०१८
२७५७३०५७१८३६२१५११८३०५१५४४८२७

७६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।

सूर्य की दशा में केतु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रकेशुसूचंमंरावृबु
मा
दि२११०१८१६१९१७
२११८४३०२१५४४८५७५१

सूर्य की दशा में शुक्र के अंतर में प्रत्यंतर

| ग्र | शु | सू | चं | मं | रा | वृ | श | बु | के | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | २ | ० | १ | ० | १ | १ | १ | १ | ० | | दि | ० | १८ | ० | २१ | २४ | १८ | २७ | २१ | २१ | | घ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |

चन्द्रमा की दशा में चन्द्रमा के अंतर में प्रत्यंतर

| ग्र | चं | मं | रा | वृ | श | बु | के | शु | सू | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | ० | ० | १ | १ | १ | १ | ० | १ | ० | | दि | २५ | १७ | १५ | १० | १७ | १२ | १७ | २० | १५ | | घ | ० | ३० | ० | ० | ३० | ३० | ३० | ० | ० |

चन्द्रमा की दशा में भौम के अंतर में प्रत्यंतर

| ग्र | मं | रा | वृ | श | बु | के | शु | सू | चं | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | ० | १ | ० | १ | ० | ० | १ | ० | ० | | दि | १२ | १ | २८ | ३ | २९ | १२ | ५ | १० | १७ | | घ | १५ | ३० | ० | १५ | ४५ | १५ | ० | ३० | ३० |

चन्द्रमा की दशा में राहु के अन्तर में प्रत्यंतर

| ग्र | रा | वृ | श | बु | के | शु | सू | चं | मं | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | २ | २ | २ | ० | १ | ३ | ० | १ | १ | | दि | २१ | १२ | २५ | १६ | १ | ० | २७ | १५ | १ | | घ | ० | ० | ३० | ३० | ३० | ० | ० | ० | ३० |

चन्द्रमा की दशा में गुरु के अन्तर में प्रत्यंतर

| ग्र | वृ | श | बु | के | शु | सू | चं | मं | रा | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | २ | २ | २ | ० | २ | ० | १ | ० | २ | | दि | ४ | १६ | ८ | २८ | २० | २४ | १० | १८ | १२ | | घ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |

चन्द्रमा की दशा में शनि के अंतर में प्रत्यंतर

| ग्र | श | बु | के | शु | सू | चं | मं | रा | वृ | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | ३ | २ | १ | ३ | ० | १ | १ | २ | २ | | दि | ० | २० | ३ | ५ | २८ | १७ | ३ | २५ | १६ | | घ | १५ | ४५ | १५ | ० | ३० | ३० | १५ | ३० | ० |

चन्द्रमा की दशा में बुध के अंतर में प्रत्यंतर

| ग्र | बु | के | शु | सू | चं | मं | रा | वृ | श | |---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---| | व | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | मा | २ | ० | २ | ० | १ | ० | २ | २ | २ | | दि | १२ | २९ | २५ | २५ | १२ | २९ | १६ | ८ | २० | | घ | १५ | ४५ | ० | ३० | ३० | ४५ | ३० | ० | ४५ |

अन्तरदशादिचक्रम् । ७६७ चन्द्रमा की दशा में केतु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रकेशुसूचंमंरावृबु
मा
दि१२१०१७१२२८२९
१५३०३०१५३०१५४५
चन्द्रमा की दशा में शुक्र के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रशुसूचंमंराबृबुके
------------------------------
मा
दि१०२०२०२५
चन्द्रमा की दशा में सूर्य के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रसूचंमंरावृबुकेशु
------------------------------
मा
दि१५१०२७२४२८२५१०
३०३०३०३०
भौम की दशा में भौम के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रमंराबृबुकेशुसूचं
------------------------------
मा
दि२२१९२३२०२४१२
३४३६१६४९३४३०२११५
३०३०३०३०३०
भौम की दशा में राहु के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रराबृबुकेशुसूचंमं
------------------------------
मा
दि२६२०२९२३२२१८२२
४२२४५१३३५४३०
.
भौम की दशा में गुरु के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रबृबुकेशुसूचंमंरा
------------------------------
मा
दि१४२३१७१९२६१६२८१९२०
४८१२३६३६४८३६२४
भौम की दशा में शनि के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रबुकेशुसूचंमंराबृ
------------------------------
मा
दि२६२३१९२३२९२३
१०३११६३०५७१५१६५११२
३०३०३०३०
भौम की दशा में बुध के अंतर में प्रत्यंतर
ग्रबुकेशुसूचंमंराबृ
------------------------------
दि
मा२०२०२९१७२९२०२३१७२६
३९४९३०५१४५४९३३३६३१
३०३०३०३०

७६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।


भौम की दशा में केतु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रकेशुसूचंमंराबृबु
मा
दि२४१२१२१९२३२०
३४३०२११५३४३०३६१६४९
३०३०३०३०

भौम की दशा में शुक्र के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रशुसूचंमंराबृबुके
दि
मा१०२१२४२६२९२४
३०३०३०३०

भौम की दशा में सूर्य के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रसूचंमंराबृबुकेशु
मा
दि१०१८१६१९१७२१
१८३०२१५४४८५७५१२१

भौम की दशा में चंद्रमा के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रचंमंराबृबुकेशुसू
मा
दि१७१२२८२९१२१०
३०१५३०१५४५१५३०

राहु की दशा में राहु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रराबृबुकेशुसूचंमं
मा
दि२५१७२६१८२१
४८३६५४४२३६३६४२

राहु की दशा में गुरु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रबृबुकेशुसूचंमंरा
मा
दि१६२४४३१२
१२४८२४२४१२२४३६

राहु की दशा में शनि के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रबुकेशुसूचंमंराबृ
मा
दि१२२५२९२१२१२५२९१६
२७२१५११८३०५१५४४८

राहु की दशा में बुध के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रबुकेशुसूचंमंराबृ
मा
दि१०२३१५१६२३१७२५
३३५४३०३३४२२४२१

अन्तरदशादिचक्रम् । ७६९

राहु की दशा में केतु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रकेशुसूचंमंरावृबु
मा
दि२२१८२२२६२०२९२३
५४३०४२२४५१३३

राहु की दशा में शुक्र के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रशुसूचंमंरावृबुके
मा
दि२४१२२४२१

राहु की दशा में सूर्य के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रसूचंमंरावृबुकेशु
मा
दि१६२७१८१८१३२११५१८२४
१२५४३६१२१८५४५४

राहु की दशा में चन्द्रमा के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रसूचंमंरावृबुकेशु
मा
दि२७१५२११२२५१६
३०३०३०३०

राहु की दशा में भौम के अन्तर में प्रत्यंतर

ग्रमंरावृबुकेशुसूचं
मा
दि२२२६२०२९२३२२१८
४२२४५१३३५४३०

गुरु की दशा में गुरु के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रवृबुकेशुसूचंमंरा
मा
दि१२१८१४१४२५
२४३६४८४८२४४८१२

गुरु की दशा में शनि के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रबुकेशुसूचंमंरावृ
मा
दि२४२३१५१६२३१६
२४१२१२३६१२४८३६

गुरु की दशा में बुध के अंतर में प्रत्यंतर

ग्रबुकेशुसूचंमंरावृ
मा
दि२५१७१६१०१७१८
३६३६४८३६२४४८१२