चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पण : ९
साहस और अठगुना काम का वेग रहता है ॥ १७ ॥
इति चाणक्यनीतिदर्पणे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता ।
अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥१॥
दोहा—
अनृत साहस मूढ़ता, कपटरु कृतघन आइ ।
निर्दयतारु मलीनता, तियमें सहज रजाइ ॥ १ ॥
झूठ बोलना, एकाएक कोई काम कर बैठना, नखरे करना, मूर्खता करना, ज्यादा लालच रखना, अपवित्र रहना और निर्दयता का बर्ताव करना ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं ॥ १ ॥
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना ।
विभवो दानशक्तिश्च नाऽल्पस्य तपसः फलम् ॥२॥
दोहा—
सुन्दर भोजन शक्ति रति, शक्ति सदा वर नारि ।
विभव दान की शक्ति यह, बड़ तपफल सुखकारि ॥२॥
भोज्य पदार्थों का उपलब्ध होते रहना, भोजन की शक्ति विद्यमान रहना (अर्थात् स्वास्थ्य में किसी तरह की खराबी न रहना) रतिशक्ति बनी रहना, सुन्दरी स्त्री का मिलना, इच्छानुकूल धन रहना और साथ ही दानशक्तिका भी रहना, ये बातें होना साधारण तपस्या का फल नहीं है । जो अखण्ड तपस्य किये रहता है । उसको ये चीजें उपलब्ध होती हैं ॥ २ ॥