भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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१० चाणक्यनीतिदर्पणः

यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी । विभवे यश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ॥३॥ दोहा--सुत आज्ञाकारी जिनहिं, अनुगामिनि तिय जान । विभव अल्प सन्तोष तेहि, सुर पुर इहाँ पिछान ॥३॥ जिसका पुत्र अपने वश में हो, स्त्री आज्ञाकारिणी हो और जो प्राप्त धन से सन्तुष्ट है, उसके लिये यहाँ ही स्वर्ग है ॥ ३ ॥

ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः । तन्मित्रंयत्रविश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः ॥४॥ दोहा—ते सुत जे पितु भक्तिरत, हितकारक पितु होय । जेहि विश्वास सो मित्रवर, सुखदायक तिय होय ॥ ४ ॥ वे ही पुत्र, पुत्र हैं जो पिताके भक्त हैं। वही पिता, पिता है, जो अपनी सन्तानका उचित रीति से पालन पोषण करता है। वही मित्र, मित्र है कि जिसपर अपना विश्वास है और वही स्त्री स्त्री है कि जहाँ हृदय आनन्दित होता है ॥ ४ ॥

परोक्षे कार्य्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्ज्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भम्पयोमुखम् ॥५॥ दोहा—ओट कार्य की हानि करि, सम्मुख करै बखान । अस मित्रन कहँ दूर तज, विष घट पयमुख जान ॥ ५ ॥ जो पीठ पीछे अपना काम बिगाड़ता हो और मुँहपर मीठी-मीठी बातें करता हो ऐसे मित्र को त्याग देना चाहिए । वह