चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः । १४
वैसे ही है जैसे किसी घड़े में गले तक विष भरा हो, किन्तु मुँह पर थोड़ा सा दूध डाल दिया गया हो ॥५॥
न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रं चापि न विश्वसेत् ।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत् ॥६॥
दोहा—नहिं विश्वास कुमित्र कर, कीजिय मित्तहु कौन ।
कहहि मित्त कहुँ कोपकरि, गोपहु सब दुख मौन ॥६॥
(अपनी किसी गुप्त बात के विषय में) कुमित्र पर तो किसी तरह विश्वास न करे और मित्र पर भी न करे। क्योंकि हो सकता है कि वह मित्र कभी बिगड़ जाय और सारे गुप्त भेद खोल दे ॥६॥
मनसा चिन्तितं कार्यं वचसा न प्रकाशयेत् ।
मंत्रेण रक्षयेद्गूढं कार्ये चापि नियोजयेत् ॥७॥
दोहा—मनते चिंतित काज जो, बैनन ते कहियेन ।
मन्त्र गूढ़ राखिय कहिय, दोष काज सुखदैन ॥७॥
जो बात मनमें सोचे, वह वचन से प्रकाशित न करे। उस गुप्त बात की मन्त्रणा द्वारा रक्षा करे और गुप्त ढंग से ही उसे काम में भी लावे ॥७॥
कष्टञ्च खलु मूर्खत्वं कष्टं च खलुयौवनम् ।
कष्टात् कष्टतरं चैव परगेहे निवासनम् ॥८॥
दोहा—मूरखता अरु तरुणता, हैं दोऊ दुखदाय ।
पर घर बसिबो कष्ट अति, नीति कहत अस गाय ॥८॥