चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ | चाणक्यनीतिदर्पणः
पहला कष्ट तो मूर्ख होना है, दूसरा कष्ट है जवानी और सब कष्टों से बढ़कर कष्ट है, पराये घर में रहना ॥८॥
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
साधवो नहि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ॥९॥
दोहा—प्रतिगिरि नहिं माणिक गनिय, मौक्ति न प्रतिगज माहिं ।
सभी ठौर नहिं साधु जन, बन बन चन्दन नाहिं ॥९॥
हर एक पहाड़ पर माणिक नहीं होता, सब हाथियों के मस्तक में मुक्ता नहीं होता, सज्जन सर्वत्र नहीं होते और चन्दन सब जंगलों में नहीं होता ॥९॥
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः ।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः ॥१०॥
दोहा—चातुरता सुतकू सुपितु, सिखवत बारहिं बार ।
नीतिमन्त बुधवन्त को, पूजत सब संसार ॥१०॥
समझदार मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने पुत्रों को विविध प्रकार के शील की शिक्षा दे । क्योंकि नीति को जानने वाले और शीलवान् पुत्र अपने कुल में पूजित होते हैं ॥१०॥
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥११॥
दोहा—तात मात अरि तुल्यते, सुत न पढ़ावत नीच ।
सभा मध्य शोभत न सो, जिमि बक हंसन बीच ॥११॥