चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 16, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ चाणक्यनीतिदर्पणः
कान्ता-वियोगः स्वजनापमानो ।
रणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा ॥
दरिद्रभावो विषमा सभा च ।
विनाग्निना ते प्रदहन्ति कायम् ॥१४॥
दोहा—युद्ध शेष प्यारी विरह, दरिद बन्धु अपमान ।
दुष्टराज खलकी सभा, दाहत बिनहिं कृशान ॥१४॥
स्त्री का वियोग, अपने जनों द्वारा अपमान, युद्ध में बचा हुआ शत्रु, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और स्वार्थिंयों की सभा, ये बातें अग्नि के बिना ही शरीर को जला डालती हैं ॥१४॥
नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी ।
मंत्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम् ॥१५॥
दोहा—तरुवर सरिता तीरपर, निपट निरंकुश नारि ।
नरपति हीन सलाह नित, विनसत लगे न बारि ॥१५॥
नदी के तट पर लगे वृक्ष, पराये घर रहनेवाली स्त्री, बिना मंत्री का राजा, ये शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥१५॥
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा ।
बलंवित्तञ्च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्य्यिका ॥१६॥
दोहा—विद्या बल है विप्रको, राजा को बल सैन ।
धन वैश्यन बल शूद्रको, सेवा ही बलदैन ॥१६॥
ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है,