भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

१४ चाणक्यनीतिदर्पणः

कान्ता-वियोगः स्वजनापमानो ।
रणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा ॥
दरिद्रभावो विषमा सभा च ।
विनाग्निना ते प्रदहन्ति कायम् ॥१४॥

दोहा—युद्ध शेष प्यारी विरह, दरिद बन्धु अपमान ।
दुष्टराज खलकी सभा, दाहत बिनहिं कृशान ॥१४॥

स्त्री का वियोग, अपने जनों द्वारा अपमान, युद्ध में बचा हुआ शत्रु, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और स्वार्थिंयों की सभा, ये बातें अग्नि के बिना ही शरीर को जला डालती हैं ॥१४॥

नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी ।
मंत्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम् ॥१५॥

दोहा—तरुवर सरिता तीरपर, निपट निरंकुश नारि ।
नरपति हीन सलाह नित, विनसत लगे न बारि ॥१५॥

नदी के तट पर लगे वृक्ष, पराये घर रहनेवाली स्त्री, बिना मंत्री का राजा, ये शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥१५॥

बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा ।
बलंवित्तञ्च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्य्यिका ॥१६॥

दोहा—विद्या बल है विप्रको, राजा को बल सैन ।
धन वैश्यन बल शूद्रको, सेवा ही बलदैन ॥१६॥

ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है,

चाणक्यनीतिदर्पणः १५

वैश्यों का बल धन है और शूद्रों का बल द्विजाति की सेवा है।१६।

निर्द्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत् ।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वाचाभ्यागतोगृहम् ॥१७॥

दोहा—वेश्या निर्धन पुरुष को, प्रजा पराजित राय।
तजहिं पखेरू निष्फल तरु, खाय अतिथि चल जाय।१७।

धनविहीन पुरुष को वेश्या, शक्तिहीन राजा को प्रजा, जिसका फल झड़ गया है, ऐसे वृक्ष को पक्षी त्याग देते हैं और भोजन कर लेने के बाद अतिथि उस घर को छोड़ देता है।१७।

गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम् ।
प्राप्तविद्यागुरुंशिष्योदग्धारण्यंमृगास्तथा ॥१८॥

दोहा---लेइ दक्षिणा यजमान को, तजि दे ब्राह्मण वर्ग।
पढ़ि शिष्यन गुरु को तजहिं, हरिन दग्ध बन पर्व ॥१८॥

ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान को छोड़ देते हैं। विद्या प्राप्त कर लेने के बाद विद्यार्थी गुरु को छोड़ देता है और जले हुए जंगल को बनैले जीव त्याग देते हैं ॥ १८ ॥

दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्रीक्रियते पुम्भिर्नरःशीघ्रं विनश्यति ॥१९॥

दोहा--पाप दृष्टि दुर्जन दुराचारी दुर्बस जोय।
जेहि नर सों मैत्री करत, अवशि नष्ट सो होय ॥१९॥

दुराचारी, व्यभिचारी, दूषित स्थान के निवासी, इन तीन

१६ चाणक्यनीतिदर्पण।

प्रकार के मनुष्यों से जो मनुष्य मित्रता करता है, उसका बहुत जल्दी विनाश हो जाता है ॥ १९ ॥

समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते । वाणिज्यंव्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे ॥२०॥

दोहा--सम सों सोहत मित्रता, नृप सेवा सुसोहात । बनियाई व्यवहार में, सुन्दरि भवन सुहात ॥२०॥

बराबरवाले के साथ मित्रता भली मालूम होती है । राजा की सेवा अच्छी लगती है व्यवहार में बनियापन भला लगता है और घर के अन्दर स्त्री भली मालूम होती है ॥ २० ॥

इति चाणक्य नीतिदर्पणे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


अथ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना के न पीडितः । व्यसनं केन संप्राप्तं कस्य सौख्यंनिरन्तरम् ॥१॥

दोहा—केहि कुल में दूषण नहीं, व्याधि न काहि सताय । कष्ट न भोग्यो कौन जन, सुखी सदा कोउ नाय ॥१॥

किसके कुल नहीं है ? कितने ऐसे प्राणी हैं जो किसी प्रकार के रोगी नहीं हैं ? कौन ऐसा जीव है कि हमेशा जिसे सुख ही सुख मिल रहा है ? ॥ १ ॥

२ चाणक्यनीतिदर्पणः १७

आचारःकुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम् । सम्भ्रमः स्नेहमाख्यातिवपुराख्याति भोजनम् ॥२॥

दोहा—महत कुलहिं आचार भल, भाषन देश बताय । आदर प्रीति जनावहि, भोजन देहू मुटाय ॥२॥

मनुष्य का आचरण उसके कुल को बता देता है, उसका भाषण देश का पता दे देता है, उसका आदर भाव प्रेम का परिचय दे देता है और शरीर भोजनका हाल कह देता है ॥२॥

सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत् । व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत् ॥३॥

दोहा—कन्या व्याहिय उच्च कुल, पुत्रहिं शास्त्र पढ़ाय । शत्रुहिं दुख दीजै सदा, मित्रहिं धर्म सिखाय ॥३॥

मनुष्य का कर्त्तव्य है कि अपनी कन्या किसी अच्छे खान-दान वाले को दे । पुत्र को विद्याभ्यास में लगा दे । शत्रु को विपत्ति में फँसा दे और मित्र को धर्मकार्य में लगा दे ॥३॥

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः । सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ॥४॥

दोहा—खलहु सर्प इन दुहुन में, भलो सर्प खल नाहिं । सर्प दशत है काल में, खलजन पद पद माहिं ॥ ४॥

दुर्जन और साँप इन दोनों में, दुर्जन की अपेक्षा साँप कहीं अच्छा है । क्योंकि साँप समय पाकर एक ही बार काटता है और दुर्जन पद पद पर काटता रहता है ॥ ४ ॥

१८ | चाणक्यनीतिदर्पणः

एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् ।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम् ॥५॥

दोहा—भूप कुलीनन्ह को कर, संग्रह याही हेत ।
आदि मध्य और अन्त में, नृपहि न ते तजि देत ॥ ५ ॥

राजा लोग कुलीन पुरुषों को अपने पास इसलिए रखते हैं कि जो आदि मध्य और अन्त किसी समय भी राजा को नहीं छोड़ते ॥ ५ ॥

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥६॥

दोहा—मर्यादा सागर तजे, प्रलय होन के काल ।
उत साधू छोड़े नहीं, सदा आपनी चाल ॥ ६ ॥

समुद्र तो प्रलयकाल में अपनी मर्यादा भी भंग कर देते हैं ( उमड़ कर सारे संसार को डुबो देते हैं ) । पर सज्जन लोग प्रलयकाल में भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हैं ॥६॥

मूर्खस्तु परिहर्त्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।
भिद्यते वाक्यशूलेन अदृश्यं कण्टकं यथा ॥७॥

दोहा—मूरख को तजि दीजिये, प्रकट द्विपद पशु जान ।
वचन शल्यते वेधहीं, अङ्गहिं काँट समान ॥ ७ ॥

मूर्ख को दो पैरवाला पशु समझ कर उसे त्याग ही देना चाहिए । क्योंकि यह समय-समय पर अपने वाक्यरूपी शूल

चाणक्यनीतिदर्पणः १९

से उसी तरह वेधता है जैसे न दिखायी पड़ता हुआ काँटा चुभ जाता है ॥७॥

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥८॥

दोहा—संयुत जीवन रूपते, कहिये बड़े कुलीन ।
विद्या बिन शोभत नहीं, पुहुप गंध ते हीन ॥८॥

रूप और यौवन से युक्त, विशाल कुल में उत्पन्न होता हुआ भी विद्याविहीन मनुष्य उसी प्रकार अच्छा नहीं लगता, जैसे सुगन्धित रहित पलास का फूल ॥८॥

कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम् ।
विद्यारूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ॥९॥

दोहा—रूप कोकिला रव तियन, पतिव्रत रूप अनूप ।
विद्यारूप कुरूप को, क्षमा तपस्वी रूप ॥९॥

कोयल का सौन्दर्य उसकी बोली, स्त्री का सौन्दर्य है उसका पातिव्रत । कुरूप का सौन्दर्य है उसकी विद्या और तपस्वियों का सौन्दर्य है उनकी क्षमाशक्ति ॥९॥

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥१०॥

दोहा—कुलहित त्यागिय एककूँ, गृहहु छाड़ि कुल ग्राम ।
जनपद हित ग्रामहि तजिय, तनहित अवनि तमाम ॥१०॥

२० चाणक्यनीतिदर्पणः

जहाँ एक के त्यागने से कुल की रक्षा हो सकती हो, वहाँ एक को त्याग दे । यदि कुल के त्यागने से गाँव की रक्षा होती हो तो उस कुल को त्याग दे । यदि उस गाँव के त्यागने से जिले की रक्षा हो तो गाँव को त्याग दे और यदि पृथ्वी के त्यागने से आत्मरक्षा सम्भव हो तो उस पृथिवी को ही त्याग दे ॥१०॥

उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम् ।
मौनेनकलहोनास्ति नास्ति जागरितो भयम् ॥११॥

दोहा--नहिं दारिद उद्योग पर, जपते पातक नाहिं ।
कलह रहे ना मौन में, नहिं भय जागत माहिं ॥११॥

उद्योग करने पर दरिद्रता नहीं रह सकती । ईश्वर का बार-बार स्मरण करते रहने पर पाप नहीं हो सकता । चुप रहने पर लड़ाई झगड़ा नहीं हो सकता और जागते हुए मनुष्य के पास भय नहीं टिक सकता ॥११॥

अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेणः रावणः ।
अतिदानाद्बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत् ॥१२॥

दोहा-अति छवि ते सिय हरण भौ, नशि रावण अति गर्व ।
अतिहि दान ते बलि बँधे, अति तजिये थल सर्व ॥१२॥

अतिशय रूपवती होने के कारण सीता हरी गई । अतिशय गर्व से रावण का नाश हुआ । अतिशय दानी होने के कारण

चाणक्यनीतिदर्पणः २१

बलि को बँधना पड़ा । इसलिये लोगों को चाहिये कि किसी बात में 'अति' न करें ॥१२॥

कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥१३॥

दोहा--उद्योगिन कुछ दूर नहिं, वलिहि न भार विशेष ।
प्रियवादिन अप्रिय नहीं, बुधांहि न कठिन विदेश ॥१३॥

समर्थवाले पुरुष को कोई वस्तु भारी नहीं हो सकती । व्यवसायी मनुष्य के लिए कोई प्रदेश दूर नहीं कहा जा सकता और प्रियवादी मनुष्य किसी का पराया नहीं कहा जा सकता ॥१३॥

एकेनापि सुवृक्षेण दह्यमानेन गन्धिना ।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥१४॥

दोहा--एक सुगन्धित वृत्त से, सब वन होत सुवास ।
जसे कुल शोभित अहै, रहि सुपुत्र गुण रास ॥१४॥

( वन ) के एक ही फूले हुए और सुगन्धित वृक्ष ने सारे वन को उसी तरह सुगन्धित कर दिया जैसे कोई सपूत अपने कुल की मर्यादा को उज्ज्वल कर देता है ॥१४॥

एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना ।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा ॥१५॥

दोहा--सूख जरत इक तरुहुते, जस लागत वन दाढ़ ।
कुलका दाहक होत है, तस कपूत की बाढ़ ॥१५॥

उसी तरह वनके एक ही सूखे और अग्नि से जलते हुए वृक्ष के कारण सारा वन जल कर खाक हो जाता है जैसे किसी कुपूत के कारण खानदान का खानदान बदनाम हो जाता है ॥१५॥

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी ॥१६॥

सोरठा--एकहु सुत जो होय, विद्यायुत अरु साधु चित ।
आनन्दित कुल सोय, यथा चन्द्रमा से निशा ॥१६॥

एक ही सज्जन और विद्वान् पुत्र से सारा कुल आह्लादित हो उठता है जैसे चन्द्रमाके प्रकाशसे रात्रि जगमगा उठती है ॥१६॥

किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः ।
वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम् ॥१७॥

दोहा--करनहार सन्ताप सुत, जनमै कहा अनेक ।
देहि कुलहिं विश्राम जाँ, श्रेष्ठ होय वरु एक ॥१७॥

शोक और सन्ताप देनेवाले बहुत से पुत्रों के होने से क्या लाभ ? अपने कुल के अनुसार चलनेवाला एक ही पुत्र बहुत है कि जहाँ सारा कुल विश्राम कर सके ॥१७॥

लालयेत्पञ्चवर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् ।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥१८॥

चाणक्यनीतिदर्पणः २३

दोहा--पाँच वर्ष लौं लालिए, दसलोँ ताड़न देइ । सुतहीँ सोलह वर्ष में, मित्र सरिस गनि लेइ ॥१८॥ पाँच वर्ष तक बच्चे का दुलार करे। फिर दस वर्ष तक उसे ताड़ना दे, किन्तु सोलह वर्ष के हो जाने पर पुत्र को मित्र के समान समझे ॥१८॥

उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे । असाधुजनसम्पर्के यः पलायति स जीवति ॥१९॥

दोहा--काल उपद्रव संग सठ, अन्य राज्य भय होय । तेहि थल ते जो भागिहै, जीवन बच्छिहै सोय ॥१९॥ दंगा वगैरह खड़ा हो जाने पर, किसी दूसरे राजा के आक्रमण करने पर, भयानक अकाल पड़ने पर और किसी दुष्ट का साथ हो जाने पर, जो मनुष्य भाग निकलता है, वही जीवित रहता है ॥१९॥

धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते । जन्मजन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम् ॥२०॥

दोहा--धरमादिक चहुँ वरन में, जो हिय एक न धार । जगत जननि तेहि नरन के, मरिये होत अवार ॥२०॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चार पदार्थों में से एक पदार्थ भी जिसको सिद्ध नहीं हो सका, ऐसे मनुष्य का मर्त्य-लोक में बार-बार जन्म केवल मरने के लिए होता है। और किसी काम के लिए नहीं ॥२०॥

२४ चाणक्यनीतिदर्पणः

मूर्खा यन्त्र न पूज्यन्तो धान्यं यत्र सुसञ्चितम् । दाम्पत्ये कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता ॥२१॥ दोहा--जहाँ अन्न संचित रहे, मूर्ख न पूजा पाव । दंपति में जहँ कलह नहिं, संपति आपुइ आव ॥२१॥ जिस देश में मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहाँ भरपूर अन्न का संचय रहता है और जहाँ स्त्री पुरुष में कलह नहीं होता, वहाँ बस यही समझ लो कि लक्ष्मी स्वयं आकर विराज रही हैं ॥२१॥

इति चाणक्ये तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ —:०:—

अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च । पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥१॥ सोरठा--आयुर्बल औ कर्म, धन विद्या अरु मरण ये । नीति कहत अस मर्म, गर्भहि में लिखि जात ये ॥१॥ आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पाँच बातें तभी लिख दी जाती हैं, जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है ॥१॥

साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रमित्राणि बान्धवाः । ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम् ॥२॥

चाणक्यनीतिदर्पणः २५

दोहा--बान्धवा जनमा मित्र ये, रहत साधु प्रतिकूल । ताहि धर्म कुल सुकृत लहु, वो उनके प्रतिकूल ॥२॥

संसार के अधिकांश पुत्र, मित्र और बान्धव सज्जनों से पराङ्मुख ही रहते हैं, लेकिन जो पराङ्मुख न रह कर सज्जनों के साथ रहते हैं, उन्हीं के धर्म से वह कुल पुनीत हो जाता है ॥२॥

दर्शनाद्ध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी । शिशुम्पालयते नित्यं तथा सज्जनसङ्गतिः ॥३॥

दोहा---मच्छी पच्छिनि कच्छपी, दरस परस करि ध्यान । शिशु पालै नित तैसे हि, सज्जन संग प्रमान ॥३॥

जैसे मछली दर्शन से, कछुई ध्यान से और पक्षिणी स्पर्श से अपने बच्चे का पालन करती है, उसी तरह सज्जनों की संगति मनुष्य का पालन करती है ॥३॥

यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः । तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति ॥४॥

दोहा---जौलौं देह समर्थ है, जवलौं मरिबो दूरि । तौलौं आतम हित करै, प्राण अन्त सब धूरि ॥४॥

जब तक कि शरीर स्वस्थ है और जब तक मृत्यु दूर है । इसी बीच में आत्मा का कल्याण कर लो । अन्त समय के उपस्थित हो जाने पर कोई क्या करेगा ? ॥४॥

कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी । प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ॥५॥ दोहा--बिन औसरहू देत फल, कामधेनु सम नित्त । माता सों परदेश में, विद्या संचित वित्त ॥५॥ विद्या में कामधेनु के समान गुण विद्यमान है। ह असमय में भी फल देती है। परदेश में तो यह माता की तरह पालन करती है। इसलिए कहा जाता है विद्या गुप्त धन है ॥५॥

एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निर्गुणैश्च शतैर्वरः । एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः ॥६॥ दोहा---सौं निर्गु नियिन से अधिक, एक पुत्र सुविचार । एक चन्द्र तम को हरे, तारा नहीं हजार ॥६॥ एक गुणवान् पुत्र सैकड़ों गुणहीन पुत्रों से अच्छा है । अकेला चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर देता है, पर हजारों तारे मिलकर उसे नहीं दूर कर पाते हैं ॥६॥

मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः । मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥७॥ दोहा—मूर्ख चिरंयुन से भलो, जन्मत ही मरि जाय । मरे अल्प दुख होइहैं, जिये सदा दुखदाय ॥७॥ मूर्ख पुत्र का चिरजीवी होकर जीना अच्छा नहीं है । बल्कि उससे वह पुत्र अच्छा है, जो पैदा होते ही मर जाय । क्योंकि मरा पुत्र थोड़े दुःख का कारण होता है, पर जीवित मूर्ख पुत्र जन्मभर जलाता ही रहता है ॥७॥

चाणक्यनीतिदर्पणः २७.

कुग्रामवासः कुलहीनसेवा । कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम् ॥८॥

दोहा—घर कुगाँव सुत मूढ़ तिय, कुल नीचनि सेवकाइ । मूर्ख पुत्र विधवा सुता, तन बिन अग्नि जराइ ॥८॥

खराब गाँव का निवास, नीच कुलवाले प्रभु की सेवा, खराब भोजन, कर्कशा स्त्री, मूर्ख पुत्र और विधवा पुत्री ये छ बिना आग के ही प्राणी के शरीरको भून डालते हैं ॥८॥

किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गर्भिणी । कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ॥९॥

दोहा--कहा होय तेहि धेनु जो, दूध न गाभिन होय । कौन अर्थ वहि सुत भये, पण्डित भक्त न होय ॥९॥

ऐसी गाय से क्या लाभ जो न दूध देती हो और न गाभिन हो । उसी प्रकार उस पुत्र से क्या लाभ, जो न विद्वान् हो और न भक्तिमान् ही होवे ॥९॥

संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः । अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च ॥१०॥

सोरठा—यह तीनों विश्राम, मोह तपन जग ताप में। हरे घोर भव घाम, पुत्र नारि सत्संग पुनि ॥१०॥

२८ चाणक्यनीतिदर्पणः

सांसारिक ताप से जलते हुए लोगों के तीन ही विश्राम स्थल हैं। पुत्र, स्त्री और सज्जनों का संग ॥१०॥

सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः । सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥११॥

दोहा—भूपति औ पण्डित बचन, औ कन्या को दान ।
एकै एकै बार ये, तीनों होत समान ॥११॥

राजा लोग केवल एक बार कहते हैं, उसी प्रकार पण्डित लोग भी केवल एक ही बार कहते हैं, (आर्यधर्मावलम्बियों के यहाँ) केवल एक ही बार कन्या दी जाती है, ये तीन बातें केवल एक ही बार होती हैं ॥११॥

एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः ।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणम् ॥१२॥

दोहा—तप एकहि द्वैसे पठन, गान तीन मग चारि ।
कृषी पाँच रन बहुत मिलु, अस कह शास्त्र विचारि ॥१२॥

अकेले में तपस्या, दो आदमियों से पठन, तीन गायन, चार आदमियों से रास्ता, पाँच आदमियों के संघ से खेती का काम और ज्यादा मनुष्यों के समुदाय द्वारा युद्ध सम्पन्न होता है ॥ १२ ॥

सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता ।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी ।१३।

चाणक्यनीतिदर्पणः २९

दोहा—सत्य मधुर भाखे वचन, और चतुरशुचि होय ।
पति प्यारी और पतिव्रता, त्रिया जानिये सोय ॥१३॥

वही भार्या ( स्त्री ) भार्या है, जो पवित्र, काम-काज करने में निपुण, पतिव्रता, पतिपरायण और सच्ची बात करने वाली हो ॥ १३ ॥

अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबांधवाः ।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता ॥ १४ ॥

दोहा—है अपुत्र का सून घर, बान्धव बिन दिशि सून ।
मूरख का हिय सून है, दारिद का सब सून ॥१४॥

जिसके पुत्र नहीं है, उसका घर सूना है । जिसका कोई भाई-बन्धु नहीं होता, उसके लिए दिशाएँ शून्य रहती हैं । मूर्ख मनुष्य का हृदय शून्य रहता है और दरिद्र मनुष्य के लिए सारा संसार सूना रहता है ॥ १४ ॥

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम् ।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम् ॥ १५ ॥

दोहा—भोजन विष है बिन पचे, शास्त्र बिना अभ्यास ।
सभा गरल सम रंकहीं, वृद्धहिं तरुनी पास ॥१५॥

अनभ्यस्त शास्त्र विष के समान रहता है, अजीर्ण अवस्था में फिर से भोजन करना विष है । दरिद्र के लिए सभा विष है और बूढ़े पुरुष के लिए युवती स्त्री विष है ॥ १५ ॥

३० चाणक्यनीतिदर्पणः

त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत् ।
त्यजेत्क्रोधमुखींभार्यान्निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत् १६

दोहा--दया रहित धर्महिं तजै, औ गुरु विद्याहीन ।
क्रोधमुखी प्रिय प्रीति बिनु, बान्धव तजै प्रवीन ॥१६॥

जिस धर्म में दया का उपदेश न हो, वह धर्म त्याग दे । जिस गुरु में विद्या न हो, उसे त्याग दे । हमेशा नाराज रहने वाली को स्त्री त्याग दे और स्नेहविहीन भाईबन्धुओं को त्याग देना चाहिये ॥ १६ ॥

अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धनं जरा ।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपं जरा ॥१७॥

दोहा--पन्थ बुराई नरन की, हयन बन्ध इक धाम ।
जरा अमैथुन तियन कहँ, औ वस्त्रन को घाम ॥१७॥

मनुष्यों के लिए रास्ता चलना बुढ़ापा है । घोड़े के लिए बन्धन बुढ़ापा है । स्त्रियों के लिए मैथुन का अभाव बुढ़ापा है । वस्त्रों के लिए घाम बुढ़ापा है ॥१७॥

कःकालः कानिमित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कस्याहं का च मेशक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥१८॥

दोहा---हौं केहिको का शक्ति मम, कौन काल अरु देश ।
लाभ खर्च को मित्र को, चिन्ता करे हमेश ॥१८॥

यह कैसा समय है, मेरे कौन २ मित्र हैं यह कैसा देश है,

चाणक्यनीतिदर्पणः ३१

इस समय हमारी क्या आमदनी और क्या खर्च है, मैं किसके अधीन हूँ और मुझमें कितनी शक्ति है इन बातों को बार-बार सोचते रहना चाहिये ॥१८॥

अग्निर्देवो द्विजातानां मुनीनां हृदि दैवतम् ।
प्रतिमा त्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम् ॥ १९॥

दोहा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को, अग्नि देवता और ।
मुनिजन हिय मूरति अबुध, समदर्शिन सब ठौर ॥१९॥

द्विजातियों के लिए अग्नि देवता हैं, मुनियों का हृदय ही देवता है, साधारण बुद्धिवालों के लिए प्रतिमायें ही देवता हैं और समदर्शी के लिये सारा संसार देवमय है ॥१९॥

इति चाणक्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

—।❀।—

गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरु स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १ ॥

दोहा---अभ्यागत ..... , नार पति जान ।
द्विजन आग ..... , वरन विप्र गुरु मान ॥१॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनों का गुरु अग्नि है । उपर्युक्त चारो वर्णों का गुरु ब्राह्मण है, स्त्री का गुरु उसका पति है और संसार मात्र का गुरु अतिथि है ॥१॥

३२ चाणक्यनीतिदर्पणः

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणं छेदनतापताडनैः । तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते । त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ २ ॥

दोहा--आगिताप घसि काटि पिटि, सुवरन लख विधि चारि । त्याग शील गुण कर्म तिमि, चारिहि पुरुष विचारि ॥२॥

जैसे रगड़ने से, काटने से, तपाने से और पीटने से, इन चार उपायों से सुवर्ण की परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार त्याग, शील, गुण और कर्म इन चार बातों से मनुष्य की परीक्षा होती है ॥२॥

तावद्भयेन भेतव्यं यावद् भयमनागतम् । आगतं तु भयं वीक्ष्य प्रहर्तव्यमशंकया ॥ ३ ॥

दोहा--जौलौं भय आवै नहीं, तौलौं डरे विचार । आये शंका छाड़ि के, चाहिय कीन्ह प्रहार ॥३॥

भय से तभी तक डरो, जब तक कि वह तुम्हारे पास तक न आ जाय । और जब आ ही जाय तो डरो नहीं बल्कि उसे निर्भीक भाव से मार भगाने की कोशिश करो ॥३॥

एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः । न भवन्ति समाः शीला यथा बदरिकण्टकाः ॥४॥

३ चाणक्यनीतिदर्पणः ३३

दोहा--एकहि गर्भ नक्षत्र में, जायमान यदि होय ।
नाहिं शील सम होत है, बेर काँट सम होय ॥ ४ ॥

एक पेट से और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न होने से किसी का शील एक सा नहीं हो जाता । उदाहरण स्वरूप बेर के काँटों को देखो ॥ ४ ॥

निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः ।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः ॥५॥

दोहा—नहि निस्पृह अधिकार गहु, भूषण नहिं निहकाम ।
नहिं अचतुर प्रिय बोल नहिं, बंचक साफ कलाम ॥५॥

निस्पृह मनुष्य कभी अधिकारी नहीं हो सकता । वासना से शून्य मनुष्य शृंगार का प्रेमी नहीं हो सकता । जड़ मनुष्य कभी मीठी वाणी नहीं बोल सकता और साफ-साफ बात करने वाला धोखेबाज नहीं होता ॥५॥

मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः ।
वरांगना कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगा ॥६॥

दोहा--मूरख द्वेषी पण्डितहिं, धनहीनहिं धनवान् ।
परकीया स्वकियाहु का, विधवा सुभगा जान ॥ ६ ॥

मूर्खों के पण्डित शत्रु होते हैं । दरिद्रों के शत्रु धनी होते हैं । कुलवती स्त्रियों के शत्रु वेश्या होती हैं और सुन्दर मनुष्यों के शत्रु कुरूप होते हैं ॥६॥