भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 132 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

चाणक्यनीतिदर्पणः २९

दोहा—सत्य मधुर भाखे वचन, और चतुरशुचि होय ।
पति प्यारी और पतिव्रता, त्रिया जानिये सोय ॥१३॥

वही भार्या ( स्त्री ) भार्या है, जो पवित्र, काम-काज करने में निपुण, पतिव्रता, पतिपरायण और सच्ची बात करने वाली हो ॥ १३ ॥

अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबांधवाः ।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता ॥ १४ ॥

दोहा—है अपुत्र का सून घर, बान्धव बिन दिशि सून ।
मूरख का हिय सून है, दारिद का सब सून ॥१४॥

जिसके पुत्र नहीं है, उसका घर सूना है । जिसका कोई भाई-बन्धु नहीं होता, उसके लिए दिशाएँ शून्य रहती हैं । मूर्ख मनुष्य का हृदय शून्य रहता है और दरिद्र मनुष्य के लिए सारा संसार सूना रहता है ॥ १४ ॥

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम् ।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम् ॥ १५ ॥

दोहा—भोजन विष है बिन पचे, शास्त्र बिना अभ्यास ।
सभा गरल सम रंकहीं, वृद्धहिं तरुनी पास ॥१५॥

अनभ्यस्त शास्त्र विष के समान रहता है, अजीर्ण अवस्था में फिर से भोजन करना विष है । दरिद्र के लिए सभा विष है और बूढ़े पुरुष के लिए युवती स्त्री विष है ॥ १५ ॥