चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० चाणक्यनीतिदर्पणः
त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत् ।
त्यजेत्क्रोधमुखींभार्यान्निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत् १६
दोहा--दया रहित धर्महिं तजै, औ गुरु विद्याहीन ।
क्रोधमुखी प्रिय प्रीति बिनु, बान्धव तजै प्रवीन ॥१६॥
जिस धर्म में दया का उपदेश न हो, वह धर्म त्याग दे । जिस गुरु में विद्या न हो, उसे त्याग दे । हमेशा नाराज रहने वाली को स्त्री त्याग दे और स्नेहविहीन भाईबन्धुओं को त्याग देना चाहिये ॥ १६ ॥
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धनं जरा ।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपं जरा ॥१७॥
दोहा--पन्थ बुराई नरन की, हयन बन्ध इक धाम ।
जरा अमैथुन तियन कहँ, औ वस्त्रन को घाम ॥१७॥
मनुष्यों के लिए रास्ता चलना बुढ़ापा है । घोड़े के लिए बन्धन बुढ़ापा है । स्त्रियों के लिए मैथुन का अभाव बुढ़ापा है । वस्त्रों के लिए घाम बुढ़ापा है ॥१७॥
कःकालः कानिमित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कस्याहं का च मेशक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥१८॥
दोहा---हौं केहिको का शक्ति मम, कौन काल अरु देश ।
लाभ खर्च को मित्र को, चिन्ता करे हमेश ॥१८॥
यह कैसा समय है, मेरे कौन २ मित्र हैं यह कैसा देश है,