चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ३१
इस समय हमारी क्या आमदनी और क्या खर्च है, मैं किसके अधीन हूँ और मुझमें कितनी शक्ति है इन बातों को बार-बार सोचते रहना चाहिये ॥१८॥
अग्निर्देवो द्विजातानां मुनीनां हृदि दैवतम् ।
प्रतिमा त्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम् ॥ १९॥
दोहा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को, अग्नि देवता और ।
मुनिजन हिय मूरति अबुध, समदर्शिन सब ठौर ॥१९॥
द्विजातियों के लिए अग्नि देवता हैं, मुनियों का हृदय ही देवता है, साधारण बुद्धिवालों के लिए प्रतिमायें ही देवता हैं और समदर्शी के लिये सारा संसार देवमय है ॥१९॥
इति चाणक्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
—।❀।—
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरु स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १ ॥
दोहा---अभ्यागत ..... , नार पति जान ।
द्विजन आग ..... , वरन विप्र गुरु मान ॥१॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनों का गुरु अग्नि है । उपर्युक्त चारो वर्णों का गुरु ब्राह्मण है, स्त्री का गुरु उसका पति है और संसार मात्र का गुरु अतिथि है ॥१॥