चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः २७.
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा । कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम् ॥८॥
दोहा—घर कुगाँव सुत मूढ़ तिय, कुल नीचनि सेवकाइ । मूर्ख पुत्र विधवा सुता, तन बिन अग्नि जराइ ॥८॥
खराब गाँव का निवास, नीच कुलवाले प्रभु की सेवा, खराब भोजन, कर्कशा स्त्री, मूर्ख पुत्र और विधवा पुत्री ये छ बिना आग के ही प्राणी के शरीरको भून डालते हैं ॥८॥
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गर्भिणी । कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ॥९॥
दोहा--कहा होय तेहि धेनु जो, दूध न गाभिन होय । कौन अर्थ वहि सुत भये, पण्डित भक्त न होय ॥९॥
ऐसी गाय से क्या लाभ जो न दूध देती हो और न गाभिन हो । उसी प्रकार उस पुत्र से क्या लाभ, जो न विद्वान् हो और न भक्तिमान् ही होवे ॥९॥
संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः । अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च ॥१०॥
सोरठा—यह तीनों विश्राम, मोह तपन जग ताप में। हरे घोर भव घाम, पुत्र नारि सत्संग पुनि ॥१०॥