भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी । प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ॥५॥ दोहा--बिन औसरहू देत फल, कामधेनु सम नित्त । माता सों परदेश में, विद्या संचित वित्त ॥५॥ विद्या में कामधेनु के समान गुण विद्यमान है। ह असमय में भी फल देती है। परदेश में तो यह माता की तरह पालन करती है। इसलिए कहा जाता है विद्या गुप्त धन है ॥५॥

एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निर्गुणैश्च शतैर्वरः । एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः ॥६॥ दोहा---सौं निर्गु नियिन से अधिक, एक पुत्र सुविचार । एक चन्द्र तम को हरे, तारा नहीं हजार ॥६॥ एक गुणवान् पुत्र सैकड़ों गुणहीन पुत्रों से अच्छा है । अकेला चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर देता है, पर हजारों तारे मिलकर उसे नहीं दूर कर पाते हैं ॥६॥

मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः । मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥७॥ दोहा—मूर्ख चिरंयुन से भलो, जन्मत ही मरि जाय । मरे अल्प दुख होइहैं, जिये सदा दुखदाय ॥७॥ मूर्ख पुत्र का चिरजीवी होकर जीना अच्छा नहीं है । बल्कि उससे वह पुत्र अच्छा है, जो पैदा होते ही मर जाय । क्योंकि मरा पुत्र थोड़े दुःख का कारण होता है, पर जीवित मूर्ख पुत्र जन्मभर जलाता ही रहता है ॥७॥