चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः २५
दोहा--बान्धवा जनमा मित्र ये, रहत साधु प्रतिकूल । ताहि धर्म कुल सुकृत लहु, वो उनके प्रतिकूल ॥२॥
संसार के अधिकांश पुत्र, मित्र और बान्धव सज्जनों से पराङ्मुख ही रहते हैं, लेकिन जो पराङ्मुख न रह कर सज्जनों के साथ रहते हैं, उन्हीं के धर्म से वह कुल पुनीत हो जाता है ॥२॥
दर्शनाद्ध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी । शिशुम्पालयते नित्यं तथा सज्जनसङ्गतिः ॥३॥
दोहा---मच्छी पच्छिनि कच्छपी, दरस परस करि ध्यान । शिशु पालै नित तैसे हि, सज्जन संग प्रमान ॥३॥
जैसे मछली दर्शन से, कछुई ध्यान से और पक्षिणी स्पर्श से अपने बच्चे का पालन करती है, उसी तरह सज्जनों की संगति मनुष्य का पालन करती है ॥३॥
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः । तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति ॥४॥
दोहा---जौलौं देह समर्थ है, जवलौं मरिबो दूरि । तौलौं आतम हित करै, प्राण अन्त सब धूरि ॥४॥
जब तक कि शरीर स्वस्थ है और जब तक मृत्यु दूर है । इसी बीच में आत्मा का कल्याण कर लो । अन्त समय के उपस्थित हो जाने पर कोई क्या करेगा ? ॥४॥