चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः २१
बलि को बँधना पड़ा । इसलिये लोगों को चाहिये कि किसी बात में 'अति' न करें ॥१२॥
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥१३॥
दोहा--उद्योगिन कुछ दूर नहिं, वलिहि न भार विशेष ।
प्रियवादिन अप्रिय नहीं, बुधांहि न कठिन विदेश ॥१३॥
समर्थवाले पुरुष को कोई वस्तु भारी नहीं हो सकती । व्यवसायी मनुष्य के लिए कोई प्रदेश दूर नहीं कहा जा सकता और प्रियवादी मनुष्य किसी का पराया नहीं कहा जा सकता ॥१३॥
एकेनापि सुवृक्षेण दह्यमानेन गन्धिना ।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥१४॥
दोहा--एक सुगन्धित वृत्त से, सब वन होत सुवास ।
जसे कुल शोभित अहै, रहि सुपुत्र गुण रास ॥१४॥
( वन ) के एक ही फूले हुए और सुगन्धित वृक्ष ने सारे वन को उसी तरह सुगन्धित कर दिया जैसे कोई सपूत अपने कुल की मर्यादा को उज्ज्वल कर देता है ॥१४॥
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना ।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा ॥१५॥
दोहा--सूख जरत इक तरुहुते, जस लागत वन दाढ़ ।
कुलका दाहक होत है, तस कपूत की बाढ़ ॥१५॥