चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
चाणक्यनीतिदर्पणः २१
बलि को बँधना पड़ा । इसलिये लोगों को चाहिये कि किसी बात में 'अति' न करें ॥१२॥
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥१३॥
दोहा--उद्योगिन कुछ दूर नहिं, वलिहि न भार विशेष ।
प्रियवादिन अप्रिय नहीं, बुधांहि न कठिन विदेश ॥१३॥
समर्थवाले पुरुष को कोई वस्तु भारी नहीं हो सकती । व्यवसायी मनुष्य के लिए कोई प्रदेश दूर नहीं कहा जा सकता और प्रियवादी मनुष्य किसी का पराया नहीं कहा जा सकता ॥१३॥
एकेनापि सुवृक्षेण दह्यमानेन गन्धिना ।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥१४॥
दोहा--एक सुगन्धित वृत्त से, सब वन होत सुवास ।
जसे कुल शोभित अहै, रहि सुपुत्र गुण रास ॥१४॥
( वन ) के एक ही फूले हुए और सुगन्धित वृक्ष ने सारे वन को उसी तरह सुगन्धित कर दिया जैसे कोई सपूत अपने कुल की मर्यादा को उज्ज्वल कर देता है ॥१४॥
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना ।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा ॥१५॥
दोहा--सूख जरत इक तरुहुते, जस लागत वन दाढ़ ।
कुलका दाहक होत है, तस कपूत की बाढ़ ॥१५॥
उसी तरह वनके एक ही सूखे और अग्नि से जलते हुए वृक्ष के कारण सारा वन जल कर खाक हो जाता है जैसे किसी कुपूत के कारण खानदान का खानदान बदनाम हो जाता है ॥१५॥
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी ॥१६॥
सोरठा--एकहु सुत जो होय, विद्यायुत अरु साधु चित ।
आनन्दित कुल सोय, यथा चन्द्रमा से निशा ॥१६॥
एक ही सज्जन और विद्वान् पुत्र से सारा कुल आह्लादित हो उठता है जैसे चन्द्रमाके प्रकाशसे रात्रि जगमगा उठती है ॥१६॥
किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः ।
वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम् ॥१७॥
दोहा--करनहार सन्ताप सुत, जनमै कहा अनेक ।
देहि कुलहिं विश्राम जाँ, श्रेष्ठ होय वरु एक ॥१७॥
शोक और सन्ताप देनेवाले बहुत से पुत्रों के होने से क्या लाभ ? अपने कुल के अनुसार चलनेवाला एक ही पुत्र बहुत है कि जहाँ सारा कुल विश्राम कर सके ॥१७॥
लालयेत्पञ्चवर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् ।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः २३
दोहा--पाँच वर्ष लौं लालिए, दसलोँ ताड़न देइ । सुतहीँ सोलह वर्ष में, मित्र सरिस गनि लेइ ॥१८॥ पाँच वर्ष तक बच्चे का दुलार करे। फिर दस वर्ष तक उसे ताड़ना दे, किन्तु सोलह वर्ष के हो जाने पर पुत्र को मित्र के समान समझे ॥१८॥
उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे । असाधुजनसम्पर्के यः पलायति स जीवति ॥१९॥
दोहा--काल उपद्रव संग सठ, अन्य राज्य भय होय । तेहि थल ते जो भागिहै, जीवन बच्छिहै सोय ॥१९॥ दंगा वगैरह खड़ा हो जाने पर, किसी दूसरे राजा के आक्रमण करने पर, भयानक अकाल पड़ने पर और किसी दुष्ट का साथ हो जाने पर, जो मनुष्य भाग निकलता है, वही जीवित रहता है ॥१९॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते । जन्मजन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम् ॥२०॥
दोहा--धरमादिक चहुँ वरन में, जो हिय एक न धार । जगत जननि तेहि नरन के, मरिये होत अवार ॥२०॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चार पदार्थों में से एक पदार्थ भी जिसको सिद्ध नहीं हो सका, ऐसे मनुष्य का मर्त्य-लोक में बार-बार जन्म केवल मरने के लिए होता है। और किसी काम के लिए नहीं ॥२०॥
२४ चाणक्यनीतिदर्पणः
मूर्खा यन्त्र न पूज्यन्तो धान्यं यत्र सुसञ्चितम् । दाम्पत्ये कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता ॥२१॥ दोहा--जहाँ अन्न संचित रहे, मूर्ख न पूजा पाव । दंपति में जहँ कलह नहिं, संपति आपुइ आव ॥२१॥ जिस देश में मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहाँ भरपूर अन्न का संचय रहता है और जहाँ स्त्री पुरुष में कलह नहीं होता, वहाँ बस यही समझ लो कि लक्ष्मी स्वयं आकर विराज रही हैं ॥२१॥
इति चाणक्ये तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ —:०:—
अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च । पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥१॥ सोरठा--आयुर्बल औ कर्म, धन विद्या अरु मरण ये । नीति कहत अस मर्म, गर्भहि में लिखि जात ये ॥१॥ आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पाँच बातें तभी लिख दी जाती हैं, जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है ॥१॥
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रमित्राणि बान्धवाः । ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम् ॥२॥
चाणक्यनीतिदर्पणः २५
दोहा--बान्धवा जनमा मित्र ये, रहत साधु प्रतिकूल । ताहि धर्म कुल सुकृत लहु, वो उनके प्रतिकूल ॥२॥
संसार के अधिकांश पुत्र, मित्र और बान्धव सज्जनों से पराङ्मुख ही रहते हैं, लेकिन जो पराङ्मुख न रह कर सज्जनों के साथ रहते हैं, उन्हीं के धर्म से वह कुल पुनीत हो जाता है ॥२॥
दर्शनाद्ध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी । शिशुम्पालयते नित्यं तथा सज्जनसङ्गतिः ॥३॥
दोहा---मच्छी पच्छिनि कच्छपी, दरस परस करि ध्यान । शिशु पालै नित तैसे हि, सज्जन संग प्रमान ॥३॥
जैसे मछली दर्शन से, कछुई ध्यान से और पक्षिणी स्पर्श से अपने बच्चे का पालन करती है, उसी तरह सज्जनों की संगति मनुष्य का पालन करती है ॥३॥
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः । तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति ॥४॥
दोहा---जौलौं देह समर्थ है, जवलौं मरिबो दूरि । तौलौं आतम हित करै, प्राण अन्त सब धूरि ॥४॥
जब तक कि शरीर स्वस्थ है और जब तक मृत्यु दूर है । इसी बीच में आत्मा का कल्याण कर लो । अन्त समय के उपस्थित हो जाने पर कोई क्या करेगा ? ॥४॥
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी । प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ॥५॥ दोहा--बिन औसरहू देत फल, कामधेनु सम नित्त । माता सों परदेश में, विद्या संचित वित्त ॥५॥ विद्या में कामधेनु के समान गुण विद्यमान है। ह असमय में भी फल देती है। परदेश में तो यह माता की तरह पालन करती है। इसलिए कहा जाता है विद्या गुप्त धन है ॥५॥
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निर्गुणैश्च शतैर्वरः । एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः ॥६॥ दोहा---सौं निर्गु नियिन से अधिक, एक पुत्र सुविचार । एक चन्द्र तम को हरे, तारा नहीं हजार ॥६॥ एक गुणवान् पुत्र सैकड़ों गुणहीन पुत्रों से अच्छा है । अकेला चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर देता है, पर हजारों तारे मिलकर उसे नहीं दूर कर पाते हैं ॥६॥
मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः । मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥७॥ दोहा—मूर्ख चिरंयुन से भलो, जन्मत ही मरि जाय । मरे अल्प दुख होइहैं, जिये सदा दुखदाय ॥७॥ मूर्ख पुत्र का चिरजीवी होकर जीना अच्छा नहीं है । बल्कि उससे वह पुत्र अच्छा है, जो पैदा होते ही मर जाय । क्योंकि मरा पुत्र थोड़े दुःख का कारण होता है, पर जीवित मूर्ख पुत्र जन्मभर जलाता ही रहता है ॥७॥
चाणक्यनीतिदर्पणः २७.
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा । कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम् ॥८॥
दोहा—घर कुगाँव सुत मूढ़ तिय, कुल नीचनि सेवकाइ । मूर्ख पुत्र विधवा सुता, तन बिन अग्नि जराइ ॥८॥
खराब गाँव का निवास, नीच कुलवाले प्रभु की सेवा, खराब भोजन, कर्कशा स्त्री, मूर्ख पुत्र और विधवा पुत्री ये छ बिना आग के ही प्राणी के शरीरको भून डालते हैं ॥८॥
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गर्भिणी । कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ॥९॥
दोहा--कहा होय तेहि धेनु जो, दूध न गाभिन होय । कौन अर्थ वहि सुत भये, पण्डित भक्त न होय ॥९॥
ऐसी गाय से क्या लाभ जो न दूध देती हो और न गाभिन हो । उसी प्रकार उस पुत्र से क्या लाभ, जो न विद्वान् हो और न भक्तिमान् ही होवे ॥९॥
संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः । अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च ॥१०॥
सोरठा—यह तीनों विश्राम, मोह तपन जग ताप में। हरे घोर भव घाम, पुत्र नारि सत्संग पुनि ॥१०॥
२८ चाणक्यनीतिदर्पणः
सांसारिक ताप से जलते हुए लोगों के तीन ही विश्राम स्थल हैं। पुत्र, स्त्री और सज्जनों का संग ॥१०॥
सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः । सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥११॥
दोहा—भूपति औ पण्डित बचन, औ कन्या को दान ।
एकै एकै बार ये, तीनों होत समान ॥११॥
राजा लोग केवल एक बार कहते हैं, उसी प्रकार पण्डित लोग भी केवल एक ही बार कहते हैं, (आर्यधर्मावलम्बियों के यहाँ) केवल एक ही बार कन्या दी जाती है, ये तीन बातें केवल एक ही बार होती हैं ॥११॥
एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः ।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणम् ॥१२॥
दोहा—तप एकहि द्वैसे पठन, गान तीन मग चारि ।
कृषी पाँच रन बहुत मिलु, अस कह शास्त्र विचारि ॥१२॥
अकेले में तपस्या, दो आदमियों से पठन, तीन गायन, चार आदमियों से रास्ता, पाँच आदमियों के संघ से खेती का काम और ज्यादा मनुष्यों के समुदाय द्वारा युद्ध सम्पन्न होता है ॥ १२ ॥
सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता ।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी ।१३।
चाणक्यनीतिदर्पणः २९
दोहा—सत्य मधुर भाखे वचन, और चतुरशुचि होय ।
पति प्यारी और पतिव्रता, त्रिया जानिये सोय ॥१३॥
वही भार्या ( स्त्री ) भार्या है, जो पवित्र, काम-काज करने में निपुण, पतिव्रता, पतिपरायण और सच्ची बात करने वाली हो ॥ १३ ॥
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबांधवाः ।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता ॥ १४ ॥
दोहा—है अपुत्र का सून घर, बान्धव बिन दिशि सून ।
मूरख का हिय सून है, दारिद का सब सून ॥१४॥
जिसके पुत्र नहीं है, उसका घर सूना है । जिसका कोई भाई-बन्धु नहीं होता, उसके लिए दिशाएँ शून्य रहती हैं । मूर्ख मनुष्य का हृदय शून्य रहता है और दरिद्र मनुष्य के लिए सारा संसार सूना रहता है ॥ १४ ॥
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम् ।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम् ॥ १५ ॥
दोहा—भोजन विष है बिन पचे, शास्त्र बिना अभ्यास ।
सभा गरल सम रंकहीं, वृद्धहिं तरुनी पास ॥१५॥
अनभ्यस्त शास्त्र विष के समान रहता है, अजीर्ण अवस्था में फिर से भोजन करना विष है । दरिद्र के लिए सभा विष है और बूढ़े पुरुष के लिए युवती स्त्री विष है ॥ १५ ॥
३० चाणक्यनीतिदर्पणः
त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत् ।
त्यजेत्क्रोधमुखींभार्यान्निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत् १६
दोहा--दया रहित धर्महिं तजै, औ गुरु विद्याहीन ।
क्रोधमुखी प्रिय प्रीति बिनु, बान्धव तजै प्रवीन ॥१६॥
जिस धर्म में दया का उपदेश न हो, वह धर्म त्याग दे । जिस गुरु में विद्या न हो, उसे त्याग दे । हमेशा नाराज रहने वाली को स्त्री त्याग दे और स्नेहविहीन भाईबन्धुओं को त्याग देना चाहिये ॥ १६ ॥
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धनं जरा ।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपं जरा ॥१७॥
दोहा--पन्थ बुराई नरन की, हयन बन्ध इक धाम ।
जरा अमैथुन तियन कहँ, औ वस्त्रन को घाम ॥१७॥
मनुष्यों के लिए रास्ता चलना बुढ़ापा है । घोड़े के लिए बन्धन बुढ़ापा है । स्त्रियों के लिए मैथुन का अभाव बुढ़ापा है । वस्त्रों के लिए घाम बुढ़ापा है ॥१७॥
कःकालः कानिमित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कस्याहं का च मेशक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥१८॥
दोहा---हौं केहिको का शक्ति मम, कौन काल अरु देश ।
लाभ खर्च को मित्र को, चिन्ता करे हमेश ॥१८॥
यह कैसा समय है, मेरे कौन २ मित्र हैं यह कैसा देश है,
चाणक्यनीतिदर्पणः ३१
इस समय हमारी क्या आमदनी और क्या खर्च है, मैं किसके अधीन हूँ और मुझमें कितनी शक्ति है इन बातों को बार-बार सोचते रहना चाहिये ॥१८॥
अग्निर्देवो द्विजातानां मुनीनां हृदि दैवतम् ।
प्रतिमा त्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम् ॥ १९॥
दोहा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को, अग्नि देवता और ।
मुनिजन हिय मूरति अबुध, समदर्शिन सब ठौर ॥१९॥
द्विजातियों के लिए अग्नि देवता हैं, मुनियों का हृदय ही देवता है, साधारण बुद्धिवालों के लिए प्रतिमायें ही देवता हैं और समदर्शी के लिये सारा संसार देवमय है ॥१९॥
इति चाणक्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
—।❀।—
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरु स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १ ॥
दोहा---अभ्यागत ..... , नार पति जान ।
द्विजन आग ..... , वरन विप्र गुरु मान ॥१॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनों का गुरु अग्नि है । उपर्युक्त चारो वर्णों का गुरु ब्राह्मण है, स्त्री का गुरु उसका पति है और संसार मात्र का गुरु अतिथि है ॥१॥
३२ चाणक्यनीतिदर्पणः
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणं छेदनतापताडनैः । तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते । त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ २ ॥
दोहा--आगिताप घसि काटि पिटि, सुवरन लख विधि चारि । त्याग शील गुण कर्म तिमि, चारिहि पुरुष विचारि ॥२॥
जैसे रगड़ने से, काटने से, तपाने से और पीटने से, इन चार उपायों से सुवर्ण की परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार त्याग, शील, गुण और कर्म इन चार बातों से मनुष्य की परीक्षा होती है ॥२॥
तावद्भयेन भेतव्यं यावद् भयमनागतम् । आगतं तु भयं वीक्ष्य प्रहर्तव्यमशंकया ॥ ३ ॥
दोहा--जौलौं भय आवै नहीं, तौलौं डरे विचार । आये शंका छाड़ि के, चाहिय कीन्ह प्रहार ॥३॥
भय से तभी तक डरो, जब तक कि वह तुम्हारे पास तक न आ जाय । और जब आ ही जाय तो डरो नहीं बल्कि उसे निर्भीक भाव से मार भगाने की कोशिश करो ॥३॥
एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः । न भवन्ति समाः शीला यथा बदरिकण्टकाः ॥४॥
३ चाणक्यनीतिदर्पणः ३३
दोहा--एकहि गर्भ नक्षत्र में, जायमान यदि होय ।
नाहिं शील सम होत है, बेर काँट सम होय ॥ ४ ॥
एक पेट से और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न होने से किसी का शील एक सा नहीं हो जाता । उदाहरण स्वरूप बेर के काँटों को देखो ॥ ४ ॥
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः ।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः ॥५॥
दोहा—नहि निस्पृह अधिकार गहु, भूषण नहिं निहकाम ।
नहिं अचतुर प्रिय बोल नहिं, बंचक साफ कलाम ॥५॥
निस्पृह मनुष्य कभी अधिकारी नहीं हो सकता । वासना से शून्य मनुष्य शृंगार का प्रेमी नहीं हो सकता । जड़ मनुष्य कभी मीठी वाणी नहीं बोल सकता और साफ-साफ बात करने वाला धोखेबाज नहीं होता ॥५॥
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः ।
वरांगना कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगा ॥६॥
दोहा--मूरख द्वेषी पण्डितहिं, धनहीनहिं धनवान् ।
परकीया स्वकियाहु का, विधवा सुभगा जान ॥ ६ ॥
मूर्खों के पण्डित शत्रु होते हैं । दरिद्रों के शत्रु धनी होते हैं । कुलवती स्त्रियों के शत्रु वेश्या होती हैं और सुन्दर मनुष्यों के शत्रु कुरूप होते हैं ॥६॥
३४ चाणक्यनीतिदर्पणः
आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम् । अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम् ॥७॥
दोहा—आलस ते विद्या नशे, धन औरन के हाथ ।
अल्प बीज से खेत अरु, दल दलपति बिनु साथ ॥७॥
आलस से विद्या, पराये हाथ में गया धन, बीज में कमी करने से खेती और सेनापति विहीन सेना नष्ट हो जाती है ॥७॥
अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते ।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते ॥८॥
दोहा—कुल शीलहिं ते धारिये, विद्या करि अभ्यास ।
गुणते जानहिं श्रेष्ठ कहँ, नयनहिं कोप निवास ॥८॥
अभ्यास से विद्या की और शील से कुल की रक्षा होती है । गुण से मनुष्य पहिचाना जाता है और आँखें देखने से क्रोध का पता लग जाता है ॥८॥
वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम् ॥९॥
दोहा—विद्या रक्षित योग ते, मृदुता से भूपाल ।
रक्षित गेह सुताय ते, धन ते धर्म विशाल ॥९॥
धन से धर्म की, योग से विद्या की, कोमलता से राजा की और अच्छी स्त्री से घर की रक्षा होती है ॥९॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ३५
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा ।
अन्यथा वदता शांतं लोकाःक्लिश्यन्तिचाऽन्यथा १०
दोहा—वेद शास्त्र आचार औ, शास्त्रहूँ और प्रकार ।
जो कहते लहते वृथा, लोग कलेश अपार ॥१०॥
वेद को, पाण्डित्य को, शास्त्र को, सदाचार को, और शान्त मनुष्य को जो लोग बदनाम करना चाहत हैं, वे व्यर्थ कष्ट करते हैं ॥१०॥
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम् ।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी ॥११॥
सोरठा—दारिद नाशन दान, शील दुर्गतिहिं नाशयित ।
बुद्धि नाश अज्ञान, भय नशात है भावना ॥११॥
दान दरिद्रता को नष्ट करता है, शील दुरवस्था को नष्ट कर देता है, बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है और विचार भय को नष्ट कर दिया करता है ॥११॥
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः ।
नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम् ॥१२।
सोरठा—व्याधि न काम समान, रिपु नहिं दूजो मोह सम ।
अग्नि कोप से आन, नहीं ज्ञान से सुख परे ॥१२॥
काम के समान कोई रोग नहीं है, मोह (अज्ञान) के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के समान और कोई अग्नि नहीं है और ज्ञान से बढ़कर और कोई सुख नहीं है ॥१२॥
३६ चाणक्यनीतिदर्पणः
जन्ममृत्युं हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम् । नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम् ॥१३॥
सरोठा—जन्म मृत्यु लहु एक, भोगै हैं इक शुभ अशुभ । नरक जात है एक, लहत एक ही मुक्तिपद ॥१३॥
संसार के मनुष्यों में से एक मनुष्य जन्म मरण के चक्कर में पड़ता है, एक अपने शुभाशुभ कर्मों का फल भोगता है, एक नरक में जा गिरता है और एक परम पद को प्राप्त कर लेता है ॥१३॥
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् । जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ॥१४॥
दोहा—ब्रह्मज्ञानिहिं स्वर्ग तृन, जित इन्द्रिय तृण नार । शूरहिं तृण है जीवनो, निस्पृह कहँ संसार ॥१४॥
ब्रह्मज्ञानी के लिये स्वर्ग तिनके के समान है । बहादुर के लिए जीवन तृण के समान है जितेन्द्रिय को नारी और निस्पृह के लिए सारा संसार तृण के समान है ॥१४॥
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥१५॥
दोहा—विद्या मित्र विदेश में, घर तिय मीत सुप्रीत । रोगिहिं औषध अरु मरे, धर्म होत ह मीत ॥१५॥
परदेश में विद्या मित्र है, घर में स्त्री मित्र है । रोगी को
चाणक्यनीतिदर्पणः ३७
औषधि मित्र है और मरे हुए मनुष्य का धर्म मित्र है ॥१५॥
वृथा वृष्टिस्समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम् ।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दीवाऽपि च ॥१६॥
दोहा–व्यर्थहिं वृष्टि समुद्र में, तृप्तहिं भोजन दान ।
धनिकहिं देनों व्यर्थ है, व्यर्थ दीप दीनमान ॥१६॥
समुद्र में वर्षा व्यर्थ है । तृप्त को भोजन व्यर्थ है । धनाढ्य को दान देना व्यर्थ है और दिन के समय दीपक जलाना व्यर्थ है ॥१६॥
नास्ति मेघसमं तोयं नास्ति चात्मसमं बलम् ।
नास्ति चक्षुः समंतेजो नास्ति धान्यसमं प्रियम् ॥१७॥
दोहा–दूजो जल नहिं मेघ सम, बल नहिं आत्म समान ।
नहिं प्रकाश है नैन सम, प्रिय अनाज सम आन ॥१७॥
मेघ जल के समान उत्तम और कोई जल नहीं होता । आत्मबल के समान और कोई बल नहीं है । नेत्र के समान और किसी में तेज नहीं है और अन्न के समान प्रिय कोई वस्तु नहीं है ॥१७॥
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः ।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः ॥१८॥
दोहा–अधनी धन को चाहते, पशु चाहे वाचाल ।
नर चाहत है स्वर्ग को, सुरगण मुक्ति विशाल ॥१८॥
३८ चाणक्यनीतिदर्पणः
दरिद्र मनुष्य धन चाहते हैं। चौपाये वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग चाहते हैं और देवता लोग मोक्ष चाहते हैं॥१८॥
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥१९॥
दोहा—सत्यहि ते रवि तपत हैं, सत्यहिं पर भुवभार।
चले पवनहू सत्य ते, सत्यहिं सब आधार ॥१९॥
सत्य के आधार पर पृथ्वी रुकी है। सत्य के सहारे सूर्य भगवान् संसार को गर्मी पहुँचाते हैं। सत्य के ही बल पर वायु बहता है। कहने का मतलब यह कि सब कुछ सत्यमें ही है ॥१९॥
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे।
चलाऽचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ॥२०॥
दोहा—चल लक्ष्मी औ प्राणहू, और जीविका धाम।
यह चलाचल जगत में, अचल धर्म अभिराम ॥२०॥
लक्ष्मी चंचल है, प्राण भी चंचल ही है, जीवन तथा घर द्वार भी चंचल है और कहाँ तक कहें यह सारा संसार चञ्चल है, बस धर्म केवल अचल और अटल है ॥२०॥
नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥२१॥
दोहा—नर में नाई धूर्त है, मालिन नारि लखाहि।
चौपायन में स्यार है, वायस पक्षिन माहिं ॥२१॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ३९.
मनुष्यों में नाऊ, पक्षिर्यो में कौआ, चौपायों में स्यार और स्त्रियों में मालिन, ये सब धूर्त होते हैं।॥२१॥
जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति ।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः ॥२२॥
**दोहा-**पितु आचारज जन्म प्रद, भय रक्षक जो कोय ।
विद्या दाता पाँच यह, मनुज पिता सम होय ॥२२॥
संसार में पिता पाँच प्रकार के होते हैं । ऐसे कि जन्म देने वाला, विद्यादाता, यज्ञोपवीत आदि संस्कार करनेवाला, अन्न देनेवाला और भय से बचानेवाला ॥२२॥
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्र-पत्नी तथैव च ।
पत्नी-माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥२३॥
**दोहा-**राजतिय औ गुरु तिय, मित्रांतियाहू जान ।
निजमाता और सासु ये, पाँचों मातृ समान ॥२३॥
उसी तरह माता भी पाँच ही तरह की होती हैं । जैसे राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी खास माता ॥२३॥
इति चाणक्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥
४० चाणक्यनीतिदर्पणः
अथ षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥१॥
**दोहा—**सुनिकै जानै धर्म को, सुनि दुर्बुधि तजि देत ।
सुनिके पावत ज्ञानहू, सुनहुँ मोक्षपद लेत ॥१॥
मनुष्य किसी से सुनकर ही धर्म का तत्व समझता है । सुनकर ही दुर्बुद्धि को त्यागता है । सुनकर ही ज्ञान प्राप्त करता है और सुनकर ही मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है ॥१॥
पक्षिणां काकचाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः ।
मुनीनां पापी चाण्डालः सर्वचाण्डालनिन्दकः ।२।
**दोहा—**वायस पखिन पशुन महँ, श्वान अहै चंडाल ।
मुनियन में जेहि पाप उर, सबमें निन्दक काल ॥२॥
पक्षियों में चाण्डाल कौआ है, पशुओं में चाण्डाल कुत्ता, मुनियों में चाण्डाल है पाप और सबसे बड़ा चाण्डाल है निन्दक ॥ २ ॥
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुध्यति ।
रजसा शुध्यते नारी नदी वेगेन शुध्यति ॥३॥
**दोहा—**काँस होत शुचि भस्म ते, ताम्र खटाई धोइ ।
रजोधर्म ते नारि शुचि, नदी वेग ते होइ ॥३॥
राख से काँसे का बर्तन साफ होता है, खटाई से ताँबा