चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें४० चाणक्यनीतिदर्पणः
अथ षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥१॥
**दोहा—**सुनिकै जानै धर्म को, सुनि दुर्बुधि तजि देत ।
सुनिके पावत ज्ञानहू, सुनहुँ मोक्षपद लेत ॥१॥
मनुष्य किसी से सुनकर ही धर्म का तत्व समझता है । सुनकर ही दुर्बुद्धि को त्यागता है । सुनकर ही ज्ञान प्राप्त करता है और सुनकर ही मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है ॥१॥
पक्षिणां काकचाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः ।
मुनीनां पापी चाण्डालः सर्वचाण्डालनिन्दकः ।२।
**दोहा—**वायस पखिन पशुन महँ, श्वान अहै चंडाल ।
मुनियन में जेहि पाप उर, सबमें निन्दक काल ॥२॥
पक्षियों में चाण्डाल कौआ है, पशुओं में चाण्डाल कुत्ता, मुनियों में चाण्डाल है पाप और सबसे बड़ा चाण्डाल है निन्दक ॥ २ ॥
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुध्यति ।
रजसा शुध्यते नारी नदी वेगेन शुध्यति ॥३॥
**दोहा—**काँस होत शुचि भस्म ते, ताम्र खटाई धोइ ।
रजोधर्म ते नारि शुचि, नदी वेग ते होइ ॥३॥
राख से काँसे का बर्तन साफ होता है, खटाई से ताँबा