चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
४० चाणक्यनीतिदर्पणः
अथ षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥१॥
**दोहा—**सुनिकै जानै धर्म को, सुनि दुर्बुधि तजि देत ।
सुनिके पावत ज्ञानहू, सुनहुँ मोक्षपद लेत ॥१॥
मनुष्य किसी से सुनकर ही धर्म का तत्व समझता है । सुनकर ही दुर्बुद्धि को त्यागता है । सुनकर ही ज्ञान प्राप्त करता है और सुनकर ही मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है ॥१॥
पक्षिणां काकचाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः ।
मुनीनां पापी चाण्डालः सर्वचाण्डालनिन्दकः ।२।
**दोहा—**वायस पखिन पशुन महँ, श्वान अहै चंडाल ।
मुनियन में जेहि पाप उर, सबमें निन्दक काल ॥२॥
पक्षियों में चाण्डाल कौआ है, पशुओं में चाण्डाल कुत्ता, मुनियों में चाण्डाल है पाप और सबसे बड़ा चाण्डाल है निन्दक ॥ २ ॥
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुध्यति ।
रजसा शुध्यते नारी नदी वेगेन शुध्यति ॥३॥
**दोहा—**काँस होत शुचि भस्म ते, ताम्र खटाई धोइ ।
रजोधर्म ते नारि शुचि, नदी वेग ते होइ ॥३॥
राख से काँसे का बर्तन साफ होता है, खटाई से ताँबा
चाणक्यनीतिदर्पणः ४१
साफ होता है, रजोधर्म से स्त्री शुद्ध होती है और वेग से नदी शुद्ध होती ॥ ३ ॥
भ्रमन्संपूज्यते राजा भ्रमन्संपूज्यते द्विजः ।
भ्रमन्संपूज्यते योगी स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति ॥४॥
दोहा–पूजे जाते भ्रमण से, द्विज योगी अरु भूप ।
भ्रमण किये नारी नशे, ऐसी नीति अनूप ॥४॥
भ्रमण करनेवाला राजा पूजा जाता है, भ्रमण करता हुआ ब्राह्मण भी पूजा जाता है और भ्रमण करता हुआ योगी पूजा जाता है, किन्तु स्त्री भ्रमण करने से नष्ट हो जाती ॥४॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥५॥
दोहा–मित्र और हैं बन्धु तेहि, सोइ पूरुष गण जात ।
धन है जाके पास में, पण्डित सोइ कहात ॥५॥
जिसके पास धन है उसके बहुत से मित्र हैं, जिसके पास धन है उसके बहुत से बान्धव हैं। जिसके पास धन है वही संसार का श्रेष्ठ पुरुष है और जिसके पास धन है वही पण्डित है ॥५॥
यादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः ।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ॥६॥
दोहा–जैसोई मति होत है, तैसोइ व्यवसाय ।
होनहर जसी रहै, तैसोई मिलत सहाय ॥ ६ ॥
४२ चाणक्यनीतिदर्पणः
जिस तरह की बुद्धि होती है, वैसा ही कार्य होता है और जैसा होनहार होता है, सहायक भी उसी तरह के मिल जाते हैं ॥६॥
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥७॥
दोहा—काल पचावत जीव सब, करत प्रजन संहार ।
सबके सोवत जांगियतु, काल टरै नहिं टार ॥७॥
काल सब प्राणियों को हजम किए जाता है । काल प्रजा का संहार करता है, लोगों के सो जाने पर भी वह जागता रहता है । तात्पर्य यह कि काल को कोई टाल नहीं सकता ॥७॥
नैव पश्यति जन्मांधः कामान्धो नैव पश्यति ।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति ॥८॥
दोहा—जन्म अन्ध देखै नहीं, काम अन्ध नहिं जान ।
तैसेई मद अन्ध है, अर्थी दोष न मान ॥८॥
न जन्म का अन्धा देखता है, न कामान्ध कुछ देख पाता है और न उन्मत्त पुरुष ही कुछ देख पाता है । उसी तरह स्वार्थी मनुष्य किसी बात में दोष नहीं देख पाता ॥८॥
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ॥९॥
दोहा—जीव कर्म आपै करै भोगत फलहू आप ।
आप भ्रमत संसार में, मुक्ति लहत है आप ॥९॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ४३
जीव स्वयं कर्म करता है और स्वयं उसका शुभाशुभ फल भोगता है ! वह स्वयं संसार में चक्कर खाता है और समय पाकर स्वयं छुटकारा भी पा जाता है ॥९॥
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः ।
भर्त्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा ॥१०॥
दोहा—प्रजापाप नृप भोगियत, प्रोइत नृप को पाप ।
तिय पातक पति शिष्य को, गुरु भोगत है आप ॥१०॥
राज्य के पाप को राजा, राजाका पाप पुरोहित, स्त्रीका पाप पति और शिष्य के द्वारा किये हुये पाप को गुरु भोगता है ॥१०॥
ऋणकर्ता पिता शत्रु माता च व्यभिचारिणी ।
भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः ॥११॥
दोहा—ऋणकर्ता पितु शत्रु, पर-पुरुषगाँमिनि मात ।
रूपवती तिय शत्रु है, पुत्र अपंडित जात ॥११॥
ऋण करने वाले पिता, व्यभिचारिणी माता, रूपवती स्त्री और मूर्ख पुत्र, ये मानवजातिके शत्रु हैं ॥११॥
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा ।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम् ॥१२॥
दोहा—धनसे लोभी वश करै, गर्विहिं जोरि स्वपान ।
मूरख के अनुसारि चलि, बुध जन सत्यकहान ॥१२॥
लालचीको धनसे, घमण्डी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके मनवाली करकेऔर यथार्थ बात से पण्डित को वश में करें ॥१२॥
४४ चाणक्यनीतिदर्पणः
वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम् । वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः ॥१३॥
दोहा—नहिं कुराज बिनु राज भल, त्यों कुमीतहू मीत । शिष्य बिना बरु है भलो, त्यों कुदार कहु नीत ॥१३॥
राज्य ही न हो तो अच्छा, पर कुराज्य अच्छा नहीं । मित्र ही न हो तो अच्छा, पर कुमित्र होना ठीक नहीं । शिष्य ही न हो तो अच्छा, पर कुशिष्य का होना अच्छा नहीं । स्त्री ही न हो तो ठीक है, पर खराब स्त्री का होना अच्छा नहीं ॥१३॥
कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः । कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः ॥१४ ।
दोहा—सुख कहँ प्रजा कुराजतें, मित्र कुमित्र न प्रेय । कहँ कुदारतें गेह सुख, कहँ कुशिष्य यश देय ॥१४॥
बदमाश राजा के राज्य में प्रजा को सुख क्योंकर मिल सकता है । दुष्ट मित्र से भला हृदय कब आनन्दित होगा । दुष्ट स्त्री के रहने पर घर कैसे अच्छा लगेगा और दुष्ट शिष्य को पढ़ा कर यश क्यों कर प्राप्त हो सकेगा ॥१४॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ४५
सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् । वायसात्पञ्च शिक्षेच्चषट् शुनस्त्रीणिगर्दभात् ॥१५॥ दोहा—एक सिंह एक बकन से, अरु मुर्गा तें चारि । काक पंच षट् स्वान तें, गर्दभ तें गुन तारि ॥१५॥ सिंह से एक गुण, बगुले से एक गुण, मुर्गे से चार गुण, कौए से पाँच गुण, कुत्ते से छ गुण और गधे से तीन गुण ग्रहण करना चाहिए ॥१५॥
प्रभूतं कार्यमपि वा तन्नरः कर्तुमिच्छति । सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते ॥१६॥ दोहा—अति उन्नत कारज कछू, किय चाहत नर कोय । करै अनन्त प्रयत्न तें, गहत सिंह गुण सोय ॥१६॥ मनुष्य कितना ही बड़ा काम क्यों न करना चाहता हो, उसे चाहिए कि सारी शक्ति लगा कर वह काम करे । यह गुण सिंह से ले ॥१६॥
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः । देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ॥१७॥ दोहा—देशकाल बल जानिके, गहि इन्द्रिय को ग्राम । बस जैसे पण्डित पुरुष, कारज करहिं समान ॥१७॥ समझदार मनुष्य को चाहिए कि वह बगुले की तरह चारों ओर से इन्द्रियों को समेटकर और देश काल के अनुसार अपना बल देख कर सब कार्य साधे ॥१७॥
४६ चाणक्यनीतिदर्पणः
प्रत्युत्थानञ्च युद्धञ्च संविभागञ्च बन्धुषु । स्वयमाक्रम्य भुक्तञ्च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् ॥१८॥
दोहा—प्रथम उठै रण में जुरै, बन्धु विभागहिं देत ।
स्वोपार्जित भोजन करै, कुक्कुट गुन चहुँ लेत ॥१८॥
ठीक समय से जागना, लड़ना, बन्धुओंके हिस्से का बटवारा और छीन-झपट कर भोजन कर लेना, ये चार बातें मुर्गे से सीखे ॥१८॥
गूढमैथुनचारित्वं काले काले च संग्रहम् ।
अप्रमत्तमविश्वासं पञ्च शिक्षेच्च वायसात् ॥१९॥
दोहा—अधिक ढीठ अरु गूढ़ रति, समय सुआलय सञ्च ।
नहिं विश्वास प्रमाद जेहि, गहु वायस गुन पञ्च ॥१९॥
एकान्त में स्त्री का संग करना, समय-समय पर कुछ संग्रह करते-रहना, हमेशा चौकन्ना रहना और किसी पर विश्वास न करना, ढीठ रहना, ये पाँच गुण कौए से सीखना चाहिए ॥१९॥
बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः ।
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः ॥२०॥
दोहा—बहुभुख थोरेहु तोष अति, सोवहि शीघ्र जगात ।
स्वामिभक्त बड़ वीरता, षट्गुन श्वानन हात ॥२०॥
अधिक भूख रहते भी थोड़े में सन्तुष्ट रहना, सोते समय होश ठीक रखना, हल्की नींद सोना, स्वामिभक्ति और बहादुरी—ये गुण कुत्ते से सीखना चाहिये ॥२०॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ४७
सुश्रान्तोऽपि वहेत भारं शीतोष्णं न च पश्यति ।
सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात् ॥२१॥
दोहा--भार बहुत ताकत नहीं, शीत उष्ण सम जाहि ।
हिये अधिक सन्तोष गुन, गरदभ तीनि गहाहि । २१।
भरपूर थकावट रहनेपर भी बोझा ढोना, सर्दी-गर्मी की परवाह न करना, सदा सन्तोष रखकर जीवनयापन करना, ये तीन गुण गधा से सीखना चाहिए ॥२१॥
एतान् विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः ।
कार्यावस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति ॥२२॥
दोहा--विंशति सीख विचारि यह, जो नर उर धारंत ।
सो सब नर जीवित अवनि, जय यश जगत लहंत ॥२२॥
जो मनुष्य ऊपर गिनाये बीसों गुणों को अपना लेगा और उसके अनुसार चलेगा, वह सभी कार्य में अजेय रहेगा ॥२२॥
इति चाणक्ये षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
—:०:—
अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च ।
नीचवाक्यं चाऽपमानं मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१॥
दोहा--अरथ नाश मन ताप अरु, दार चरित घर माहिं ।
वंचनता अपमान निज, सुधी प्रकाशत नाहिं ॥१॥
४८ . चाणक्यनीतिदर्पणः
अपने धन का नाश, मन का सन्ताप, स्त्रीका चरित्र, नीच मनुष्य की कही बात और अपना अपमान, इनको बुद्धिमान् मनुष्य किसी के समक्ष जाहिर न करे ॥१॥
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च ।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥२॥
दोहा—संचित धन अरु धान्य कूँ, विद्या सीखत बार ।
करत और व्यवहार कूँ, लाज न करिय अगार ॥२॥
धन-धान्यके लेन-देन, विद्याध्ययन, भोजन, सांसारिक व्यवसाय, इन कामों में जो मनुष्य लज्जा नहीं करता, वही सुखी रहता है ॥२॥
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च ।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ॥ ३ ॥
दोहा—तृपित सुधा सन्तोष चित, शान्त लहत सुख होय ।
इतउत दौड़त लोभ धन, कहँ सो सुख तेहि होय ॥३॥
सन्तोषरूपी अमृत से तृप्त मनुष्यों को जो सुख और शांति प्राप्त होती है, वह धन के लोभ से इधर-उधर मारे-मारे फिरने वालोंको कैसे प्राप्त होगी ? ॥३॥
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने ।
त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः ॥ ४ ॥
४ चाणक्यनीतिदर्पणः ४९
दोहा--तीन ठौर सन्तोष धर, तिय भोजन धन माहिं ।
दानन में अध्ययन में, तप में कीजे नाहिं ॥४॥
तीन बातों में सन्तोष धारण करना चाहिए । जैसे—अपनी स्त्री में, भोजनमें और धनमें । इसी प्रकार तीन बातोंमें कभी भी सन्तुष्ट न होना चाहिए । अध्ययनमें, जप में और दान में ॥४॥
विप्रयोर्विप्राग्नयोश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः ।
अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य वृषभस्य च ॥५॥
दोहा--विप्र विप्र अरु नारि नर, सेवक स्वामिहिं अन्त ।
हल औ बैल के मध्यते, नहिं जावे सुखवन्त ॥५॥
दो ब्राह्मणों के बीच में से, ब्राह्मण और अग्नि के बीच से, स्वामी और सेवक के बीच से, स्त्री-पुरुष के बीच से और हल तथा बैल के बीच से नहीं निकलना चाहिए ॥५॥
पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च ।
नैव गां च कुमारीं च वृद्धं च न शिशुं तथा ॥६॥
दोहा--अनल विप्र गुरु धेनु पुनि, कन्या कुँआरी देत ।
बालक के अरु वृद्ध के, पग न लगावहु येत ॥६॥
अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कुमारी कन्या, वृद्ध और बालक इनको कभी पैरों से न छुए ॥६॥
हस्ती हस्तसहस्रेण शतहस्तेन वाजिनः ।
शृङ्गिणो दशहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनः ॥७॥
दोहा--हस्ती हाथ हजार तज, शत हाथ से वाजि ।
शृङ्ग सहित तेहि हाथ दश, दुष्ट देश तज आजि ॥७॥
५० चाणक्यनीतिदर्पणः
हजार हाथ की दूरी से हाथी से, सौ हाथ की दूरी से घोड़े से, दस हाथ की दूरी से सींगवाले जानवरों से बचना चाहिये और मौका पड़ जाय तो देश को ही त्याग कर दुर्जन से बचे ॥७॥
हस्ती अंकुशमात्रेण बाजी हस्तेन ताड्यते ।
शृङ्गी लकुटहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः ॥८॥
दोहा--हस्ती अंकुश तैं हनिय, हाथ से पकरि तुरंग ।
शृङ्गि पशुन को लकुटतैं, असितैं दुर्जन भंग ॥८॥
हाथी अंकुश से, घोड़ा चाबुक से, सींगवाले जानवर लाठी से और दुर्जन तलवार से ठीक होते हैं ॥८॥
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा घनगर्जिते ।
साधवः परसम्पत्तौ खलाः परविपत्तिषु ॥६॥
दोहा--तुष्ट होत भोजन किये, ब्राह्मण लखि घन घोर ।
पर सम्पति लखि साधु जन, खल लखि पर दुःख घोर॥९।
ब्राह्मण भोजन से, मोर मेघ के गर्जन से, सज्जन पराये धन से और खल मनुष्य दूसरे पर आई विपत्ति से प्रसन्न होता है॥९॥
अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम् ।
आत्मतुल्यबलं शत्रुः विनयेन बलेन वा ॥१०॥
दोहा---बलवंतहिं अनुकूलहीं, प्रतिकूलहिं बलहीन ।
आतम बल सम शत्रुको, विनय बसहिं वश कीन ॥१०॥
अपने से प्रवल शत्रु को उसके अनुकूल चल कर, दुष्ट शत्रु को उसके प्रतिकूल चल कर और समान बलवाले शत्रु को विनय और बल से नीचा दिखाना चाहिए ॥१०॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ५१
बाहुवीर्यबलं राज्ञो ब्रह्मणां ब्रह्मवित्बली । रूप-यौवन-माधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम् ॥११॥
दोध--नृपहिं बाहुबल ब्राह्मणहिं, वेद ब्रह्म की जान । तिय बल मधुरता कह्यो, रूप शील गुणवान ॥११॥
राजाओं में बाहुबल सम्पन्न राजा और ब्राह्मणों में ब्रह्म-ज्ञानी ब्राह्मण बली होता है और रूप तथा यौवन की मधुरता स्त्रियों का सबसे उत्तम बल है ॥११॥
नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् । छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥१२॥
दोहा--अतिहि सरल नहिं होइये, देखहु जा बनमाहिं । तरु सीधे छेदत तिनहिं, बाँके तरु रहि जाहिं ॥१२॥
अधिक सीधा-साधा होना भी अच्छा नहीं होता । जाकर बन में देखो--वहाँ सीधे वृक्ष काट लिये जाते हैं और टेढ़े खड़े रह जाते हैं ॥१२॥
यत्रोदकस्तत्र वसन्ति हंसा- स्तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति । न हंसतुल्येन नरेण भाव्यं पुनस्त्यजन्तः पुनराश्रयन्तः ॥ १३ ॥
दोहा--सजल सरोवर हंस बसि, सूखत उड़िहैं सोउ । देखि सजल आवत बहुरि, हंस समान न होउ ॥१३॥
जहाँ जल रहता है वहाँ ही हंस बसते हैं । वैसे ही सूखे
५२ चाणक्यनीतिदर्पण।
सरोवरको छोड़ते हैं और बार-बार आश्रय कर लेते हैं । सो मनुष्य को हंस के समान न होना चाहिये ।
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम् ॥१४॥
दोहा---धन संग्रहको पेखिये, प्रगट दान प्रतिपाल । जो मोरी जल जानकूँ, तब नहिं फूटत ताल ॥१४॥
अर्जित धन का व्यय करना ही रक्षा है । जैसे नये जल आने पर तड़ाग के भीतर के जल को निकालना ही रक्षा है ॥१४॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाःस पुमाँल्लोके यस्यार्थाः सच जीवति ॥१५॥
दोहा---जिनके धन तेहि मीत बहु, जेहि धन बन्धु अनन्त । धन सोइ जग में पुरुषवर, सोई जन जीवन्त ॥१५॥
जिनके धन रहता है उसके मित्र होते हैं, जिसके पास अर्थ रहता है उसी के बंधु होते हैं । जिसके धन रहता है वही पुरुष गिना जाता है, जिसके अर्थ है वही जीता है ॥१५॥
स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे । दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥ १६ ॥
दोहा---स्वर्गवासि जन के सदा, चार चिह्न लखि येहि । देव विप्र पूजा मधुर, वाक्य दान करि देहि ॥१६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ५३
संसार में आने पर स्वर्ग स्थानियों के शरीर में चार चिह्न रहते हैं, दान का स्वभाव, मीठा वचन, देवता की पूजा, ब्राह्मण को तृप्त करना अर्थात् जिन लोगों में दान आदि लक्षण रहे उनको जानना चाहिये कि वे अपने पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग वासी मृत्यु लोक में अवतार लिये हैं ॥१६॥
अत्यन्तकोपः कटुता च वाणी
दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम् ।
नीचप्रसङ्ग कुलहीनसेवा
चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम् ॥१७॥
दोहा--अतिहि कोप कटु वचनहूँ, दारिद नीच मिलान ।
स्वजन वैर अकुलिन टहल, यह षट नर्क निशान ॥१७॥
अत्यन्त क्रोध, कटुवचन, दरिद्रता, अपने जनोंमें वैर, नीचका संग, कुलहीनकी सेवा, ये चिह्न नरकवासियोंकी देहोंमें रहते हैं।१७।
गम्यते यदि मृगेन्द्रमन्दिरं
लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम् ।
जम्बुकालयगते च प्राप्यते ।
वत्सपुच्छखरचर्मखण्डनम् ॥ १८ ॥
दोहा--सिंह भवन यदि जाय कोउ, गजमुक्ता तहँ पाय ।
वत्सपूँछ खर चर्म डुक, स्यार माँद हो जाय ॥१८॥
यदि कोई सिंह की गुफा में जा पड़े तो उसको हाथी के कपोलका मोती मिलता है और सियारके स्थानमें जाने पर बछवे की पूँछ और गदहे के चमड़े का टुकड़ा मिलता है ॥१८॥
५४ चाणक्यनीतिदर्पणः
श्वानपुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना । न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे ॥१९॥
दोहा--श्वान पूँछ सम जीवनो, विद्या बिनु है व्यर्थ । दंश निवारण तन ढँकन, नहिं एको सामर्थ ॥१९॥
कुत्ते की पूँछ के समान विद्या बिना जीना व्यर्थ है । कुत्ते की पूँछ न तो गोप्य इन्द्रिय को ढाँक सकती और न मच्छर आदि जीवों को ही उड़ा सकती है ॥१९॥
वाचां शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूते दया शौचमेतच्छौचं परार्थिनाम् ॥२०॥
दोहा--वचनशुद्धि मनशुद्धि औ, इन्द्रिय संयम शुद्धि । भूतदया और स्वच्छता, पर अर्थिन यह बुद्धि ॥२०॥
वचन की शुद्धिसे मन की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, जीवों पर दया और पवित्रता--ये परमार्थियों की शुद्धि है ॥२०॥
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठे वह्निं पयो घृतम् । इक्षौ गुड़ं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः ॥२१॥
दोहा--बास सुमन तिल तेल, अग्नि काठ पय घीव । ऊखहिं गुड़ तिमि देह में, आतम लखु मति सीव ॥२१॥
जैसे फूलमें गन्ध, तिलमें तेल, काष्ठमें आग, दूधमें घी और ईख में गुड़ है वैसे ही देह में आत्मा को विचार से देखो ॥२१॥
इति चाणक्ये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ५५
अथ अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हित महतां धनम् ॥१॥
दोहा--अधम धनहिं को चाहते, मध्यम धन अरु मान ।
मानहि धन है बड़न को, उत्तम चाहै मान ॥१॥
अधम धन चाहते हैं, मध्यम धन और मान दोनों, पर उत्तम मानही चाहते हैं। क्योंकि महात्माओं का धन मान ही है ॥१॥
इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम् ।
भक्षयित्वाऽपिकर्तव्याःस्नानदानादिकाःक्रियाः॥२॥
सोरठा--ऊख वारि पय मूल, पुनि औषधहू खायके ।
तथा खाय ताम्बूल, स्नान दान आदिक उचित ॥२॥
ऊख, जल, दूध, पान, फल और औषधि इन वस्तुओं के भोजन करने पर भी स्नान दान आदि क्रिया कर सकते हैं ॥२॥
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते ।
यदन्नं भक्षयते नित्यं जायते तादृशी प्रजा ॥३॥
दोहा---दीपक तमको खात है, तो कज्जल उपजाय ।
अन्न जैसेही खाय जो, तैसेहि सन्तति पाय ॥३॥
दीपक अंधकारको खाता है और काजलको जनमाता है । सत्य है, जो जैसा अन्न सदा खाता है उसकी वैसे ही सन्तति होती है॥३॥
वित्तंदेहि गुणान्वितेषु मतिमन्नाऽन्यत्रदेहि क्वचित् ।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुचां माधुर्य्युक्तं सदा
५६ | चाणक्यनीतिदर्पणः
जीवाः स्थावरजङ्गमाश्च सकला संजीव्य भूमण्डलम् ।
भूयः पश्य तदेवकोटिगुणितंगच्छत्वमम्भोनिधिम् ॥४॥
दोहा--गुणिहिं न औरहिं देइ धन, लखिय जलद धन खाय ।
मधुर कोटि गुण करि जगत, जीवन जलनिधि जाय ॥४॥
हे मतिमान् ! गुणियों को धन दो औरों को कभी मत दो । समुद्र से मेघ के मुख में प्राप्त होकर जल सदा मधुर हो जाता है और पृथिवी पर चर-अचर सब जीवों को जिला कर फिर वही जल कोटि गुण होकर उसी समुद्र में चला जाता है ॥४॥
चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः ॥५॥
दोहा—एक सहस्र चाण्डाल सम, यवन नीच इक होय ।
तत्त्वदर्शी कह यवन ते, नीच और नहिं कोय ॥५॥
तत्त्वदर्शी विद्वानों की राय है कि सहस्रों चाण्डालों के इतना नीच एक यवन होता है । यवन से बढ़कर नीच कोई नहीं होता ॥५॥
तैलाभ्यङ्गे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि ।
तावद् भवति चाण्डालो यावत्स्नानं न चाचरेत् ॥६॥
दोहा--चिताधूम तनुतेल लगि, मैथुन क्षौर बनाय ।
तब लौं है चण्डाल सम, जबलौं नाहिं नहाय ॥६॥
तेल लगाने पर, स्त्री प्रसंग करने के बाद और चिता का धुआँ लग जाने पर मनुष्य जब तक स्नान नहीं करता तब तक चाण्डाल रहता है ॥६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ५७
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् ।
भोजने चाऽमृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ॥७॥
दोहा--वारि अजीरण औषधी, जीरण में बलवान ।
भोजन के संग अमृत है, भोजनान्त विषपान ॥७॥
जब तक कि भोजन पच न जाय, इस बीच में पिया हुआ पानी विष है और वही पानी भोजन पच जाने के बाद पीने से अमृत के समान हो जाता है । भोजन करते समय जल अमृत और उसके पश्चात् विषका काम करता है ॥७॥
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः ।
हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः ॥८॥
दोहा--ज्ञान क्रिया बिन नष्ट है, नर जो नष्ट अज्ञान ।
बिन नायक जसु सैनहू, त्यों पति बिनु तिय जान ॥८॥
वह ज्ञान व्यर्थ है कि जिसके अनुसार आचरण न हो और उस मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ है कि जिसे ज्ञान प्राप्त न हो । जिस सेना का कोई सेनापति न हो वह सेना व्यर्थ है और जिसके पति न हो वे स्त्रियाँ व्यर्थ हैं ॥८॥
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनम् ।
भोजनं च पराधीनं त्रयः पुंसां विडम्बनाः ॥६॥
दोहा--वृद्ध समय जो मरु तिया, बन्धु हाथ धन जाय ।
पराधीन भोजन मिलै, अहै तीन दुखदाय ॥९॥
बुढ़ौती में स्त्री का मरना, निजी धन का बन्धुओं के हाथ में चला जाना और पराधीन जीविका रहना, ये पुरुषों के लिए अभाग्य की बात है ॥९॥
५४ चाणक्यनीतिदर्पणः
अग्निहोत्रं विना वेदाः न च दानं विना क्रियाः ।
न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद्भावो हि कारणम् ॥१०॥
दोहा--अग्निहोत्र बिनु वेद नहिं, यज्ञ क्रिया बिनु दान ।
भाव बिना नहिं सिद्धि है, सबमें भाव प्रधान ॥१०॥
बिना अग्निहोत्र के वेदपाठ व्यर्थ है और दान के बिना यज्ञादि कर्म व्यर्थ हैं । भाव के बिना सिद्धि नहीं प्राप्त होती इसलिए भाव ही प्रधान है ॥१०॥
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम् ॥११॥
दोहा--देव न काठ पाषाणमृत, मूर्ती में न रहाय ।
भाव तहाँही देवथल, कारन भाव कहाय ॥११॥
देवता न काठ में, न पत्थर में और न मिट्टी ही में रहते हैं वे तो रहते हैं भाव में । इससे यह निष्कर्ष निकला कि भाव ही सबका कारण है ॥११॥
काष्ठ-पाषाण-धातूनां कृत्वा भावेन सेवनम् ।
श्रद्धया च तया सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः ॥१२॥
दोहा--धातु काठ पाषाण का, करु सेवन युत भाव ।
श्रद्धा से भगवत्कृपा, तैसे तेहि सिद्धि आव ॥१२॥
काठ, पाषाण तथा धातु की भी श्रद्धापूर्वक सेवा करने से और भगवत्कृपा से सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१२॥
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न तृष्णया परो व्याधिर्न च धर्मो दया परः ॥१३॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ५९
दोहा--नहीं सन्तोष समान सुख, तप न क्षमा सम आन ।
तृष्णा सम नहिं व्याधि तन, धरम दया सम मान ॥१३॥
शान्ति के समान कोई तप नहीं है, सन्तोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, तृष्णा से बड़ी कोई व्याधि नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है ॥१३॥
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी ।
विद्या कामदुघा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम् ॥१४॥
दोहा--त्रिसना वैतरणी नदी, बरमराज सह रोष ।
कामधेनु विद्या कहिय, नन्दन वन सन्तोष ॥१४॥
क्रोध यमराज है, तृष्णा वैतरणी नदी है, विद्या कामधेनु गौ है और सन्तोष नन्दन वन है ॥१४॥
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम् ।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम् ॥१५॥
दोहा--गुने भूषन है रूप को, कुल को शील कहाय ।
विद्या भूषन सिद्धि जन, तेहि खरचत सो पाय ॥१५॥
गुण रूप का शृङ्गार है, शील कुलका भूषण है, सिद्धि विद्या का अलंकार है और भोग धन का आभूषण है ॥१५॥
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम् ।
असिद्धस्य हता विद्या अभोगेन हतं धनम् ॥१६॥
दोहा--निर्गुण का हत रूप है, हत कुशील कुलमान ।
हत विद्याहू असिद्धको, हत अभोग धन धान ॥१६॥
गुण विहीन मनुष्य का रूप व्यर्थ है, जिसका शील ठीक