चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ५५
अथ अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हित महतां धनम् ॥१॥
दोहा--अधम धनहिं को चाहते, मध्यम धन अरु मान ।
मानहि धन है बड़न को, उत्तम चाहै मान ॥१॥
अधम धन चाहते हैं, मध्यम धन और मान दोनों, पर उत्तम मानही चाहते हैं। क्योंकि महात्माओं का धन मान ही है ॥१॥
इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम् ।
भक्षयित्वाऽपिकर्तव्याःस्नानदानादिकाःक्रियाः॥२॥
सोरठा--ऊख वारि पय मूल, पुनि औषधहू खायके ।
तथा खाय ताम्बूल, स्नान दान आदिक उचित ॥२॥
ऊख, जल, दूध, पान, फल और औषधि इन वस्तुओं के भोजन करने पर भी स्नान दान आदि क्रिया कर सकते हैं ॥२॥
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते ।
यदन्नं भक्षयते नित्यं जायते तादृशी प्रजा ॥३॥
दोहा---दीपक तमको खात है, तो कज्जल उपजाय ।
अन्न जैसेही खाय जो, तैसेहि सन्तति पाय ॥३॥
दीपक अंधकारको खाता है और काजलको जनमाता है । सत्य है, जो जैसा अन्न सदा खाता है उसकी वैसे ही सन्तति होती है॥३॥
वित्तंदेहि गुणान्वितेषु मतिमन्नाऽन्यत्रदेहि क्वचित् ।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुचां माधुर्य्युक्तं सदा