चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ चाणक्यनीतिदर्पणः
श्वानपुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना । न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे ॥१९॥
दोहा--श्वान पूँछ सम जीवनो, विद्या बिनु है व्यर्थ । दंश निवारण तन ढँकन, नहिं एको सामर्थ ॥१९॥
कुत्ते की पूँछ के समान विद्या बिना जीना व्यर्थ है । कुत्ते की पूँछ न तो गोप्य इन्द्रिय को ढाँक सकती और न मच्छर आदि जीवों को ही उड़ा सकती है ॥१९॥
वाचां शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूते दया शौचमेतच्छौचं परार्थिनाम् ॥२०॥
दोहा--वचनशुद्धि मनशुद्धि औ, इन्द्रिय संयम शुद्धि । भूतदया और स्वच्छता, पर अर्थिन यह बुद्धि ॥२०॥
वचन की शुद्धिसे मन की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, जीवों पर दया और पवित्रता--ये परमार्थियों की शुद्धि है ॥२०॥
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठे वह्निं पयो घृतम् । इक्षौ गुड़ं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः ॥२१॥
दोहा--बास सुमन तिल तेल, अग्नि काठ पय घीव । ऊखहिं गुड़ तिमि देह में, आतम लखु मति सीव ॥२१॥
जैसे फूलमें गन्ध, तिलमें तेल, काष्ठमें आग, दूधमें घी और ईख में गुड़ है वैसे ही देह में आत्मा को विचार से देखो ॥२१॥
इति चाणक्ये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥