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चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

५४ चाणक्यनीतिदर्पणः

श्वानपुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना । न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे ॥१९॥

दोहा--श्वान पूँछ सम जीवनो, विद्या बिनु है व्यर्थ । दंश निवारण तन ढँकन, नहिं एको सामर्थ ॥१९॥

कुत्ते की पूँछ के समान विद्या बिना जीना व्यर्थ है । कुत्ते की पूँछ न तो गोप्य इन्द्रिय को ढाँक सकती और न मच्छर आदि जीवों को ही उड़ा सकती है ॥१९॥

वाचां शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूते दया शौचमेतच्छौचं परार्थिनाम् ॥२०॥

दोहा--वचनशुद्धि मनशुद्धि औ, इन्द्रिय संयम शुद्धि । भूतदया और स्वच्छता, पर अर्थिन यह बुद्धि ॥२०॥

वचन की शुद्धिसे मन की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, जीवों पर दया और पवित्रता--ये परमार्थियों की शुद्धि है ॥२०॥

पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठे वह्निं पयो घृतम् । इक्षौ गुड़ं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः ॥२१॥

दोहा--बास सुमन तिल तेल, अग्नि काठ पय घीव । ऊखहिं गुड़ तिमि देह में, आतम लखु मति सीव ॥२१॥

जैसे फूलमें गन्ध, तिलमें तेल, काष्ठमें आग, दूधमें घी और ईख में गुड़ है वैसे ही देह में आत्मा को विचार से देखो ॥२१॥

इति चाणक्ये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ५५

अथ अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हित महतां धनम् ॥१॥

दोहा--अधम धनहिं को चाहते, मध्यम धन अरु मान ।
मानहि धन है बड़न को, उत्तम चाहै मान ॥१॥

अधम धन चाहते हैं, मध्यम धन और मान दोनों, पर उत्तम मानही चाहते हैं। क्योंकि महात्माओं का धन मान ही है ॥१॥

इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम् ।
भक्षयित्वाऽपिकर्तव्याःस्नानदानादिकाःक्रियाः॥२॥

सोरठा--ऊख वारि पय मूल, पुनि औषधहू खायके ।
तथा खाय ताम्बूल, स्नान दान आदिक उचित ॥२॥

ऊख, जल, दूध, पान, फल और औषधि इन वस्तुओं के भोजन करने पर भी स्नान दान आदि क्रिया कर सकते हैं ॥२॥

दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते ।
यदन्नं भक्षयते नित्यं जायते तादृशी प्रजा ॥३॥

दोहा---दीपक तमको खात है, तो कज्जल उपजाय ।
अन्न जैसेही खाय जो, तैसेहि सन्तति पाय ॥३॥

दीपक अंधकारको खाता है और काजलको जनमाता है । सत्य है, जो जैसा अन्न सदा खाता है उसकी वैसे ही सन्तति होती है॥३॥

वित्तंदेहि गुणान्वितेषु मतिमन्नाऽन्यत्रदेहि क्वचित् ।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुचां माधुर्य्युक्तं सदा

५६ | चाणक्यनीतिदर्पणः


जीवाः स्थावरजङ्गमाश्च सकला संजीव्य भूमण्डलम् ।
भूयः पश्य तदेवकोटिगुणितंगच्छत्वमम्भोनिधिम् ॥४॥

दोहा--गुणिहिं न औरहिं देइ धन, लखिय जलद धन खाय ।
मधुर कोटि गुण करि जगत, जीवन जलनिधि जाय ॥४॥

हे मतिमान् ! गुणियों को धन दो औरों को कभी मत दो । समुद्र से मेघ के मुख में प्राप्त होकर जल सदा मधुर हो जाता है और पृथिवी पर चर-अचर सब जीवों को जिला कर फिर वही जल कोटि गुण होकर उसी समुद्र में चला जाता है ॥४॥


चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः ॥५॥

दोहा—एक सहस्र चाण्डाल सम, यवन नीच इक होय ।
तत्त्वदर्शी कह यवन ते, नीच और नहिं कोय ॥५॥

तत्त्वदर्शी विद्वानों की राय है कि सहस्रों चाण्डालों के इतना नीच एक यवन होता है । यवन से बढ़कर नीच कोई नहीं होता ॥५॥


तैलाभ्यङ्गे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि ।
तावद् भवति चाण्डालो यावत्स्नानं न चाचरेत् ॥६॥

दोहा--चिताधूम तनुतेल लगि, मैथुन क्षौर बनाय ।
तब लौं है चण्डाल सम, जबलौं नाहिं नहाय ॥६॥

तेल लगाने पर, स्त्री प्रसंग करने के बाद और चिता का धुआँ लग जाने पर मनुष्य जब तक स्नान नहीं करता तब तक चाण्डाल रहता है ॥६॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ५७

अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् ।
भोजने चाऽमृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ॥७॥
दोहा--वारि अजीरण औषधी, जीरण में बलवान ।
भोजन के संग अमृत है, भोजनान्त विषपान ॥७॥
जब तक कि भोजन पच न जाय, इस बीच में पिया हुआ पानी विष है और वही पानी भोजन पच जाने के बाद पीने से अमृत के समान हो जाता है । भोजन करते समय जल अमृत और उसके पश्चात् विषका काम करता है ॥७॥

हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः ।
हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः ॥८॥
दोहा--ज्ञान क्रिया बिन नष्ट है, नर जो नष्ट अज्ञान ।
बिन नायक जसु सैनहू, त्यों पति बिनु तिय जान ॥८॥
वह ज्ञान व्यर्थ है कि जिसके अनुसार आचरण न हो और उस मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ है कि जिसे ज्ञान प्राप्त न हो । जिस सेना का कोई सेनापति न हो वह सेना व्यर्थ है और जिसके पति न हो वे स्त्रियाँ व्यर्थ हैं ॥८॥

वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनम् ।
भोजनं च पराधीनं त्रयः पुंसां विडम्बनाः ॥६॥
दोहा--वृद्ध समय जो मरु तिया, बन्धु हाथ धन जाय ।
पराधीन भोजन मिलै, अहै तीन दुखदाय ॥९॥
बुढ़ौती में स्त्री का मरना, निजी धन का बन्धुओं के हाथ में चला जाना और पराधीन जीविका रहना, ये पुरुषों के लिए अभाग्य की बात है ॥९॥

५४ चाणक्यनीतिदर्पणः

अग्निहोत्रं विना वेदाः न च दानं विना क्रियाः ।
न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद्भावो हि कारणम् ॥१०॥
दोहा--अग्निहोत्र बिनु वेद नहिं, यज्ञ क्रिया बिनु दान ।
भाव बिना नहिं सिद्धि है, सबमें भाव प्रधान ॥१०॥
बिना अग्निहोत्र के वेदपाठ व्यर्थ है और दान के बिना यज्ञादि कर्म व्यर्थ हैं । भाव के बिना सिद्धि नहीं प्राप्त होती इसलिए भाव ही प्रधान है ॥१०॥

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम् ॥११॥
दोहा--देव न काठ पाषाणमृत, मूर्ती में न रहाय ।
भाव तहाँही देवथल, कारन भाव कहाय ॥११॥
देवता न काठ में, न पत्थर में और न मिट्टी ही में रहते हैं वे तो रहते हैं भाव में । इससे यह निष्कर्ष निकला कि भाव ही सबका कारण है ॥११॥

काष्ठ-पाषाण-धातूनां कृत्वा भावेन सेवनम् ।
श्रद्धया च तया सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः ॥१२॥
दोहा--धातु काठ पाषाण का, करु सेवन युत भाव ।
श्रद्धा से भगवत्कृपा, तैसे तेहि सिद्धि आव ॥१२॥
काठ, पाषाण तथा धातु की भी श्रद्धापूर्वक सेवा करने से और भगवत्कृपा से सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१२॥

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न तृष्णया परो व्याधिर्न च धर्मो दया परः ॥१३॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ५९

दोहा--नहीं सन्तोष समान सुख, तप न क्षमा सम आन ।
तृष्णा सम नहिं व्याधि तन, धरम दया सम मान ॥१३॥

शान्ति के समान कोई तप नहीं है, सन्तोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, तृष्णा से बड़ी कोई व्याधि नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है ॥१३॥

क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी ।
विद्या कामदुघा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम् ॥१४॥

दोहा--त्रिसना वैतरणी नदी, बरमराज सह रोष ।
कामधेनु विद्या कहिय, नन्दन वन सन्तोष ॥१४॥

क्रोध यमराज है, तृष्णा वैतरणी नदी है, विद्या कामधेनु गौ है और सन्तोष नन्दन वन है ॥१४॥

गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम् ।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम् ॥१५॥

दोहा--गुने भूषन है रूप को, कुल को शील कहाय ।
विद्या भूषन सिद्धि जन, तेहि खरचत सो पाय ॥१५॥

गुण रूप का शृङ्गार है, शील कुलका भूषण है, सिद्धि विद्या का अलंकार है और भोग धन का आभूषण है ॥१५॥

निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम् ।
असिद्धस्य हता विद्या अभोगेन हतं धनम् ॥१६॥

दोहा--निर्गुण का हत रूप है, हत कुशील कुलमान ।
हत विद्याहू असिद्धको, हत अभोग धन धान ॥१६॥

गुण विहीन मनुष्य का रूप व्यर्थ है, जिसका शील ठीक

६० चाणक्यनीतिदर्पणः

नहीं उसका कुल नष्ट है, जिसको सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकी उसकी विद्या व्यर्थ है और जिसका भोग न किया जाय वह धन व्यर्थ है ॥१६॥

शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता । शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तोषी ब्राह्मणः शुचिः ॥१७॥

दोहा--शुद्ध भूमिगत वारि है, नारि पतिव्रता जोन ।
क्षेम करै सो भूप शुचि, विप्र तोस सुचि तौन ॥१७॥

जमीन पर पहुँचा पानी, पतिव्रता स्त्री, प्रजा का कल्याण करनेवाला राजा और सन्तोषी ब्राह्मण--ये पवित्रमाने गये हैं ॥१७॥

असंतृष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभृतः । सलज्जागणिकानष्टाःनिर्लज्जाश्च कुलांगनाः ॥१८॥

दोहा--असन्तोष ते विप्र हत, नृत्प संन्तोष तै रन्वारि ।
गनिका विनशे लाज ते, लाज बिना कुल नारि ॥१८॥

असन्तोषी ब्राह्मण, सन्तोषी राजे, लज्जावती वेश्या और निर्लज्ज कुल-स्त्रियाँ से निकृष्ट माने गये हैं ॥१९॥

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम् । दुष्कुलं चापि विदुषो देवैरपि हि पूज्यते ॥१६॥

दोहा--कहा होत बड़ वंश ते, जो नर विद्या हीन ।
प्रगट सुरनतैं पूजियत, विद्या ते कुलहीन ॥१९॥

यदि मूर्ख का कुल बड़ा भी हो तो उससे क्या लाभ ? चाहे नीच ही कुल का क्यों न हो, पर यदि वह विद्वान् हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है ॥१९॥

चाणक्यनीतिदर्पण: ६१

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान्सर्वत्र गौरवम् ।
विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते ॥२०॥
दोहा–विदुष प्रशंसित होत जग, सब थल गौरव पाय ।
विद्या से सब मिलत है, थल सब सोइ पुजाय ॥२०॥
विद्वान् का संसार में प्रचार होता है वह सर्वत्र आदर पाता है । कहने का मतलब कि विद्या से सब कुछ प्राप्त हो सकता है और सर्वत्र विद्या ही पूजी जाती है । २०॥

रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥२१॥
दोहा–संयत जीवन रूप तैं, कहियत बड़े कुलीन ।
विद्या बिन सोभै न जिमि, पुहुप गंध तै हीन ॥२१॥
रूप यौवन युक्त और विशाल कुल में उत्पन्न होकर भी मनुष्य यदि विद्याहीन होते हैं तो वे उसी तरह भले नहीं मालम होते जैसे सुगन्धि रहित टेसू के फूल ॥२१॥

मांसभक्षैः सुरापानैः मूर्खैश्चाऽक्षरवर्जितैः
पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराक्रान्ताऽस्ति मेदिनी ॥२२॥
दोहाँ–मांस भक्ष मदिरा पियत, मूरख अक्षर हीन ।
नरकार पशुभार गृह, पृथ्वी नहिं सहु तीन ॥२२॥
मांसाहारी, शराबी और निरक्षर मूर्ख इन मानवरूपधारी पशुओं से पृथ्वी मारे बोझ के दबी जा रही है ॥२२॥

अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मंत्रहीनश्च ऋत्विजः ।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥२३॥

६२ चाणक्यनीतिदर्पणः

दोहा—जज्ञहीन राज्यही दहत, दानहीन यजमान । मन्त्रहीन ऋत्विजन कहँ, क्रतुसम रिपु नहिं आन ॥२३॥

अन्नरहित यज्ञ देश का, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विजों का और दान विहीन यज्ञ यजमान का नाश कर देता है । यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं है ॥२३॥

इति चाणक्येऽष्टमोऽध्यायः ॥८॥


अथ नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात ! विषयान् विषवत्त्यज । क्षमाऽऽर्जवं दया शौचं सत्यं पीयूषवत्पिब ॥१॥

सो०—मुक्ति चहौ जो तात ! विषय । तजहु विष सरिस । दयाशील सब बात, शौच सरलता क्षमा गहु ॥१॥

हे भाई ! यदि तुम मुक्ति चाहते हो विषयों को विष के समान समझ कर त्याग दो और क्षमा, ऋजुता (कोमलता), दया और पवित्रता इनको अमृत की तरह पी जाओ ॥१॥

परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः । त एव विलयं यान्ति बल्मीकोदरसर्पवत् ॥२॥

दोहा—नीच अधम नर भाषते, मर्म परस्पर आप । ते विलाय जै हैं यथा, संधि विमवट को साँप ॥२॥

जो लोग आपस के भेद की बात बतला देते हैं वे नराधम उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे बाँबी के भीतर घुसा साँप ॥२॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ६३

गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे—
नाऽकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य ।
विद्वान् धनी भूपतिदीर्घजीवी
धातुः पुरा कोऽपि न बुद्धिदोऽभूत ॥३॥

दोहा—गन्ध सोन फल इक्षु धन, बुध चिरायु नरनाह ।
सुमन मलय धाता न किय, काहु ज्ञान गुरुनाह ॥३॥

सोने में सुगंध, ऊँख में फल, चन्दन में फूल, धनी विद्वान् और दीर्घजीवी राजा को विधाता ने बनाया ही नहीं। क्या किसी ने उन्हें सलाह भी नहीं दी ? ॥३॥

सर्वौषधीनाममृतं प्रधानम्
सर्वेषु सौख्येष्वशनं प्रधानम् ।
सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानं
सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम् ॥४॥

दोहा—गुरच औषधि सुखन में, भोजन कहो प्रमान ।
चक्षु इन्द्रिय अंग में, शिर प्रधान भी जान ॥४॥

सब औषधियों में अमृत (गुरच = गिलोय) प्रधान है, सब सुखों में भोजन प्रधान है, सब इन्द्रियों में नेत्र प्रधान है और सब अंगों में मस्तक प्रधान है ॥४॥

दूतो न सञ्चरति खे न चलेच्च वार्त्ता ।
पूर्वं न जल्पितमिदं न च सङ्गमोऽस्ति ।
व्योम्नि स्थितं रविशशिग्रहणं प्रशस्तं

६४ चाणक्यनीतिदर्पणः

जानाति यो द्विजवरः स कथं न विद्वान् ॥५॥
**दोहा—**दूर वचन गति रंग नहिं, नभ न आदि कहुँ कोय ।
शशि रवि ग्रहण बखानु जो, नहिं न विदुष किमि होय ॥५॥
आकाश में न कोई दूत जा सकता है, न बातचीत ही हो सकती है, न पहले से किसी ने बता रखा है, न किसी से भेंट ही होती है, ऐसी परिस्थिति में आकाशचारी सूर्य, चन्द्रमा का ग्रहण समय जो पण्डित जानते हैं, वे क्यों कर विद्वान् न माने जायें ? ॥५॥

विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधार्त्तो भयकातरः ।
भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत् ॥६॥
**दोहा—**द्वारपाल सेवक पथिक, समय क्षुधातुर पाय ।
भंडारी, विद्यार्थी, सोअत सात जगाय ॥६॥
विद्यार्थी, नौकर, राही, भूखे, भयभीत, भंडारी और द्वारपाल इन सात सोते हुए को भी जगा देना चाहिए ॥६॥

अहिं नृपं च शार्दूलं बरिंट बालकं तथा ।
परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत् ॥७॥
**दोहा--**भूपति मृगपति मढ़मति, त्यों बर्रें औ बाल ।
सोवत सात जगाइये, नहिं पर कूकर व्याल ॥७॥
साँप, राजा, शेर, बर्रें, बालक, पराया कुत्ता और मूर्ख मनुष्य ये सात सोते हों तो इन्हें न जगावें ॥७॥

अर्थाधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनः ।
ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः ॥८॥

५ चाणक्यनीतिदर्पणः ६५

दोहा—अर्थहेत वेदहिं पढ़े, खाय शूद्र को धान ।
ते द्विज क्या कर सकत हैं, बिन विष व्याल समान ॥८॥
जिन्होंने धनके लिए विद्या पढ़ी है और शूद्र का अन्न खाते हैं, ऐसे विषहीन साँप के समान ब्राह्मण क्या कर सकेंगे ॥८॥

यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनागमः ।
निग्रहाऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ॥६॥

दोहा—रुष्ट भये भय तुष्ट में, नहीं धनागम होय ।
दण्ड सहाय न करि सकै, का रिसाय करु सोय ॥९॥
जिसके नाराज होने पर कोई डर नहीं है, प्रसन्न होने पर कुछ आमदनी नहीं हो सकती । न वह दे सकता और न कृपा ही कर सकता हो तो उसके रुष्ट होने से क्या होगा ? ॥९॥

निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा ।
विषमस्तु न वाप्यस्तु घटाटोपो भयङ्करः ॥१०॥

दोहा—बिन विषहू के साँप सो, चाहिय फने बढ़ाय ।
होउ नहीं या होउ विष, घटाटोप भयदाय ॥१०॥
विष विहीन सर्प को भी चाहिये कि वह खूब लम्बी चौड़ी फन फटकारे । विष हो या न हो, पर आडम्बर होना ह चाहिये ॥१०॥

प्रातर्धूतप्रसंगेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसंगतः ।
रात्रौ चौरप्रसंगेन कालो गच्छति धीमताम् ॥११॥

दोहा—प्रातः द्यूत प्रसंग से, मध्य स्त्री परसंग ।
सायं चोर प्रसंग कह, काल कहे सब अङ्ग ॥११॥

६६ चाणक्यनीतिदर्पणः

समझदार लोगों का समय सबेरे जुए के प्रसंग (कथा) में, दोपहर को स्त्री प्रसंग (कथा) में और रात को चोर की चर्चा में जाता है। यह तो हुआ शब्दार्थ, पर भावार्थ इसका यह है जो समझदार होते हैं, वे सबेरे यह कथा कहते सुनते हैं कि जिसमें जुए की कथा आती है यानी महाभारत। दोपहर को स्त्री प्रसंग यानी स्त्री से सम्बन्ध रखनेवाली कथा अर्थात् रामायण कि जिसमें आदि से अंत तक सीता की तपस्या झलकती रहती है। रात को चोर के प्रसंग अर्थात् श्रीकृष्णचन्द्र की कथा यानी श्रीमद्भागवत कहते सुनते हैं ॥११॥

स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्ताद् घृष्टचन्दनम् ।
स्वहस्तलिखितस्तोत्रं शक्रस्यापिश्रियं हरेत् ॥१२॥

दोहा—सुमन माल निजकर रचित, स्वलिखित पुस्तक पाठ ।
धन इन्द्रहु नाशै दिये, स्वघसित चन्दन काठ ॥१२॥

अपने हाथ गूँथकर पहनी माला, अपने हाथ से घिस कर लगाया चन्दन और अपने हाथ लिखकर किया हुआ स्तोत्रपाठ इन्द्र की भी श्री को नष्ट कर देता है ॥१२॥

इक्षुदंडास्तिलाः शूद्राः कान्ता कांचनमेदिनी ।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्द्धनम् ॥१३॥

दोहा—ऊख शूद्र दधि नायिका, हेम मेदिनी पान ।
तल चन्दन इन नवनको, मर्दनही गुण जान ॥१३॥

ऊख, तिल, शूद्र, सुवर्ण, स्त्री, पृथ्व़ी चन्दन दही और पान, ये वस्तुएँ जितनी ही मर्दन की जाती है, उतनी ही गुण-दायक होती हैं ॥१३॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ६७

दरिद्रता धीरतया विराजते । कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते ॥ कन्दनता चोष्णतया विराजते । कुरूपता शीलतया विराजते ॥१४॥

दोहा—दारिद सोहत धीरते, कुपट सुभगता पाय । लहि कुअन्न उष्णत्व को, शील कुरूप सुहाय ॥१४॥

धैर्य से दरिद्रता की, सफाई से खराब वस्त्र की, गर्मी से कदन्न की, और शील से कुरूपता भी सुन्दर लगती है ॥१४॥

इति चाणक्ये नवमोऽध्यायः ॥९॥

---:०:---

अथ वृद्ध चाणक्यस्योत्तरार्द्धम् ।

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः । विद्यारत्नेन हीनो यः स हीनः सर्ववस्तुषु ॥१॥

दोहा—हीन नहीं धन हीन है, धन थिर नाहिं प्रवीन । हीन न और बखानिये, विद्याहीन सुदीन ॥१॥

धनहीन मनुष्य हीन नहीं कहा जा सकता वहां वास्तव में धनी है । किन्तु जो मनुष्य विद्यारूपी रत्न से हीन है, वह सभी वस्तुओं से हीन है ॥१॥

६४ | चाणक्यनीतिदर्पणः

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् ।
शास्त्रपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत् ॥२॥

दोहा--दृष्टिशोधि पग धरिय मग, पीजिय जल पटशोधि ।
शास्त्रशोधि बोलिय बचन, करिय काज मन शोधि ॥२॥

आँख से अच्छी तरह देख-भाल कर पैर धरे, कपड़े से छान कर जल पिये, शास्त्रसम्मत बात कहे और मन को हमेशा पवित्र रखे ॥२॥

सुखार्थी चेत्त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत्त्यजेत्सुखम् ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥३॥

दोहा--सुख चाहै विद्या तजै, सुख तजि विद्या चाह ।
अर्थिहिं को विद्या कहा, विद्यार्थिहिं सुख काह ॥३॥

जो मनुष्य विषय सुख चाहता हो, वह विद्या के पास न जाय । जो विद्या का इच्छुक हो, वह विषय सुख छोड़े । सुखार्थी को विद्या और विद्यार्थी को सुख कहाँ मिल सकता है ॥३॥

कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः ।
मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः ॥४॥

दोहा--काह न जाने सुकवि जन, करै काह नहिं नारि ।
मद्यप काह न बकि सकै, काग खाहिं केहि वारि ॥४॥

कवि क्या वस्तु नहीं देख पाते ? स्त्रियाँ क्या नहीं कर सकतीं ? शराबी क्या नहीं बक जाते ? और कौवे क्या नहीं खा जाते ॥४॥

रंकं करोति राजानं राजानं रंकमेव च ।
धनिनं निर्धनं चैव निधनं धनिनं विधिः ॥५॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ६९

छं०--बनवै अति रंकन भूमिपती अरु भूमिपतीनहुँ रंक अति ।
धनिकै धनहीन फिरै करती अधनीन धनी विधिकेरि गती ॥
विधाता कङ्गाल को राजा, राजा को कङ्गाल, धनी को निर्धन और निर्धन को धनी बनाता ही रहता है ॥५॥

लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधको रिपुः ।
जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः॥६॥

दोहा--याचक रिपु लोभीन के, मूढ़नि जो शिषदान ।
जार तियन निज पति कह्यो, चोरन शशि रिपु जान ॥६॥

लोभी का शत्रु है याचक, मूर्ख का शत्रु है उपदेश देने वाला, कुलटा स्त्री का शत्रु है उसका पति और चोरों का शत्रु चन्द्रमा है ॥६॥

येषां न विद्या न तपो न दानं
न चापि शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥७॥

दोहा--धर्मशील गुण नाहिं जेहि, नहिं विद्या तप दान ।
मनुज रूप भुवि भार ते, विचरत मृग कर जान ॥७॥

जिस मनुष्य में न विद्या है, न तप है, न शील है और न गुण है ऐसे मनुष्य पृथ्वी के बोझ रूप होकर मनुष्य रूप में पशु सदृश जीवन-यापन करते हैं ॥७॥

अन्तः सारविहीनानामुपदेशो न जायते ।
मलयाचलसंसर्गान्न वेणुश्चन्दनायते ॥८॥

७० चाणक्यनीतिदर्पणः

सोरठा--शून्य हृदय उपदेश, नाहिं लगै कैसो करिय ।
बसै मलय गिरि देश, तऊ बाँस में वास नहिं ॥८॥

जिनकी अन्तरात्मा में कुछ तत्व नहीं होता ऐसे मनुष्यों को किसी का उपदेश कुछ भी असर नहीं करता । मलयाचल के संसर्ग से और वृक्ष चन्दन हो जाते हैं, पर बाँस चन्दन नहीं होता ॥८॥

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥६॥

दोहा--स्वाभाविक नहिं बुद्धि जेहि, ताहि शास्त्र करु काह ।
जो नर नयनविहीन हैं, दर्पण से करु काह ॥९॥

जिसके पास स्वयं बुद्धि नहीं है, उसे क्या शास्त्र सिखा देगा । जिसकी दोनों आँखें फूट गई हों, क्या उसे शीशा दिखा देगा ? ॥९॥

दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले ।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत् ॥१०॥

दोहा--दुर्जन को सज्जन करन, भूतल नहीं उपाय ।
हो अपान इन्द्रिय न शुचि, सौ सौं धोयी जाय ॥१०॥

इस पृथ्वीतल में दुर्जन को सज्जन बनाने का कोई यत्न है ही नहीं । अपान प्रदेश को चाहे सैकड़ों बार क्यों न धोया जाय फिर भी वह श्रेष्ठ इन्द्रिय नहीं हो सकता ॥१०॥

आप्तद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः ।
राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः ॥११॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ७१

दोहा--सन्त विरोध से मृत्यु, धन क्षय करि पर द्वेष ।
राजद्वेष से नसत है, कुल क्षय कर द्विज द्वेष ॥११॥
बड़े बूढ़ों से द्वेष करने पर मृत्यु होती है । शत्रु से द्वेष करने पर धन का नाश होता है । राजा से द्वेष करने पर सर्वनाश हो जाता है और ब्राह्मण से द्वेष करने पर कुल का ही क्षय हो जाता है ॥११॥

वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं
द्रुमालयं पक्वफलाम्बुसेवनम् ।
तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥१२॥

छन्द--गज बाघ सेवित बृत्त घन वन माहि बरु रहिबो करै ।
अरु पक्व फल जल सेवनो तृण सेज बरु लहिबो करै ॥
शतछिद्र वल्कल वस्त्र करिबहु चाल यह गहिबो करै ।
निज बन्धु महँ धनहीनह्वै नहिं जीवनो चहिबो करै ।

बाघ और बड़े-बड़े हाथियों के झुण्ड जिस वन में रहते हों उसमें रहना पड़े, निवास करके पके फल तथा जल पर जीवन-यापन करना पड़ जाय, घास फूस पर सोना पड़े और सकड़ों जगह फटे वल्कल वस्त्र पहनना पड़े तो अच्छा पर अपनी बिरादरी में दरिद्र होकर जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥१२॥

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या
वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ।
तस्मात् मूलं यत्नतो रक्षणीयम् ।
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ॥१३॥

७२ चाणक्यनीतिदर्पणः

छन्द--विप्र वृक्ष हैं मूल सन्ध्या वेद शाखा जानिये । धर्म कर्म हैं पत्र दोऊ मूल को नहिं नाशिये ॥ जो नष्ट मूल है जाय तो कुछ शाख पात न फूटिये । यही नीति सुनीति है की मूल रक्षा कीजिये ॥१३॥

ब्राह्मण वृक्ष के समान है, उसकी जड़ है सन्ध्या, वेद हैं शाखा और कर्म पत्ते हैं। इसलिए मूल ( सन्ध्या ) की यत्न पूर्वक रक्षा करो। क्योंकि जब जड़ ही कट जायगी तो न शाखा रहेगी और न पत्र ही रहेगा ॥१३॥

माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः । बान्धवा विष्णु भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१४॥

दोहा--लक्ष्मी देवी मातु हैं, पिता विष्णु सर्वेश । कृष्णभक्त बन्धू सभी, तीन भुवन निज देश ॥१४॥

भक्त मनुष्यकी माता हैं लक्ष्मीजी, विष्णु भगवान् पिता हैं, विष्णुके भक्त भाई बन्धु हैं और तीनों भुवन उसका देश है ॥१४॥

एकवृक्षे समारूढ़ा नानावर्णा विहंगमाः । प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना ? ॥१५॥

दोहा--बहु विधि पक्षी एक तरु, जो बैठें निशि आय । भोर दशो दिशि उड़ि चलें, कह कोही पछिताय ॥१५॥

विविध वर्ण ( रंग ) के पक्षी एक ही वृक्ष पर रात भर बसेरा करते हैं और सबेरे दशों दिशाओं में उड़ जाते हैं। यही दशा मनुष्यों की भी है, फिर इसके लिये सन्ताप करने की क्या जरूरत ? ॥१५॥

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।

चाणक्यनीतिदर्पणः ७३

वने हस्ती मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥१६॥

दोहा—बुद्धि जासु है सो बली, निबुद्धिहि बल नाहिं । अति बल हाथिहिं स्यार लघु, चतुर हतेसि बन माहिं ॥१६॥

जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है, जिसके बुद्धि ही नहीं उसके बल कहाँ से होगा । एक जंगल में एक बुद्धिमान् खरगोश ने एक मतवाले हाथी को मार डाला था ॥१६॥

का चिन्ता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते । नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरेत् ॥ इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलम् । त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ॥१७॥

छन्द—है नाम हरिको पालक मन जीवन शंका क्यों करनी । नहिं तो बालकजीवन को थन से पय निसरत क्यों जननी ॥ यही जानकर बार है यदुपति लक्ष्मीपति तेरे । चरण कमल के सेवन से दिन बीते जायँ सदा मेरे ॥१७॥

यदि भगवान् विश्वंभर कहलाते हैं तो हमें अपने जीवन सम्बन्धी झंझटों (अन्न-वस्त्र आदि) की क्या चिन्ता ? यदि वे विश्वम्भर न होते तो जन्म के पहले ही बच्चे को पीने के लिए माता के स्तन में दूध कैसे उतर आता । बार-बार इसी बात को सोचकर हे यदुपते ! हे लक्ष्मीपते ! मैं केवल आप के चरण-कमलों की सेवा करके अपना समय बिताता हूं ॥१७॥

गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धि— स्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम् ।