चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पण: ६१
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान्सर्वत्र गौरवम् ।
विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते ॥२०॥
दोहा–विदुष प्रशंसित होत जग, सब थल गौरव पाय ।
विद्या से सब मिलत है, थल सब सोइ पुजाय ॥२०॥
विद्वान् का संसार में प्रचार होता है वह सर्वत्र आदर पाता है । कहने का मतलब कि विद्या से सब कुछ प्राप्त हो सकता है और सर्वत्र विद्या ही पूजी जाती है । २०॥
रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥२१॥
दोहा–संयत जीवन रूप तैं, कहियत बड़े कुलीन ।
विद्या बिन सोभै न जिमि, पुहुप गंध तै हीन ॥२१॥
रूप यौवन युक्त और विशाल कुल में उत्पन्न होकर भी मनुष्य यदि विद्याहीन होते हैं तो वे उसी तरह भले नहीं मालम होते जैसे सुगन्धि रहित टेसू के फूल ॥२१॥
मांसभक्षैः सुरापानैः मूर्खैश्चाऽक्षरवर्जितैः
पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराक्रान्ताऽस्ति मेदिनी ॥२२॥
दोहाँ–मांस भक्ष मदिरा पियत, मूरख अक्षर हीन ।
नरकार पशुभार गृह, पृथ्वी नहिं सहु तीन ॥२२॥
मांसाहारी, शराबी और निरक्षर मूर्ख इन मानवरूपधारी पशुओं से पृथ्वी मारे बोझ के दबी जा रही है ॥२२॥
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मंत्रहीनश्च ऋत्विजः ।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥२३॥