चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० चाणक्यनीतिदर्पणः
नहीं उसका कुल नष्ट है, जिसको सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकी उसकी विद्या व्यर्थ है और जिसका भोग न किया जाय वह धन व्यर्थ है ॥१६॥
शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता । शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तोषी ब्राह्मणः शुचिः ॥१७॥
दोहा--शुद्ध भूमिगत वारि है, नारि पतिव्रता जोन ।
क्षेम करै सो भूप शुचि, विप्र तोस सुचि तौन ॥१७॥
जमीन पर पहुँचा पानी, पतिव्रता स्त्री, प्रजा का कल्याण करनेवाला राजा और सन्तोषी ब्राह्मण--ये पवित्रमाने गये हैं ॥१७॥
असंतृष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभृतः । सलज्जागणिकानष्टाःनिर्लज्जाश्च कुलांगनाः ॥१८॥
दोहा--असन्तोष ते विप्र हत, नृत्प संन्तोष तै रन्वारि ।
गनिका विनशे लाज ते, लाज बिना कुल नारि ॥१८॥
असन्तोषी ब्राह्मण, सन्तोषी राजे, लज्जावती वेश्या और निर्लज्ज कुल-स्त्रियाँ से निकृष्ट माने गये हैं ॥१९॥
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम् । दुष्कुलं चापि विदुषो देवैरपि हि पूज्यते ॥१६॥
दोहा--कहा होत बड़ वंश ते, जो नर विद्या हीन ।
प्रगट सुरनतैं पूजियत, विद्या ते कुलहीन ॥१९॥
यदि मूर्ख का कुल बड़ा भी हो तो उससे क्या लाभ ? चाहे नीच ही कुल का क्यों न हो, पर यदि वह विद्वान् हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है ॥१९॥