चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ५९
दोहा--नहीं सन्तोष समान सुख, तप न क्षमा सम आन ।
तृष्णा सम नहिं व्याधि तन, धरम दया सम मान ॥१३॥
शान्ति के समान कोई तप नहीं है, सन्तोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, तृष्णा से बड़ी कोई व्याधि नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है ॥१३॥
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी ।
विद्या कामदुघा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम् ॥१४॥
दोहा--त्रिसना वैतरणी नदी, बरमराज सह रोष ।
कामधेनु विद्या कहिय, नन्दन वन सन्तोष ॥१४॥
क्रोध यमराज है, तृष्णा वैतरणी नदी है, विद्या कामधेनु गौ है और सन्तोष नन्दन वन है ॥१४॥
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम् ।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम् ॥१५॥
दोहा--गुने भूषन है रूप को, कुल को शील कहाय ।
विद्या भूषन सिद्धि जन, तेहि खरचत सो पाय ॥१५॥
गुण रूप का शृङ्गार है, शील कुलका भूषण है, सिद्धि विद्या का अलंकार है और भोग धन का आभूषण है ॥१५॥
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम् ।
असिद्धस्य हता विद्या अभोगेन हतं धनम् ॥१६॥
दोहा--निर्गुण का हत रूप है, हत कुशील कुलमान ।
हत विद्याहू असिद्धको, हत अभोग धन धान ॥१६॥
गुण विहीन मनुष्य का रूप व्यर्थ है, जिसका शील ठीक