चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ चाणक्यनीतिदर्पणः
अग्निहोत्रं विना वेदाः न च दानं विना क्रियाः ।
न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद्भावो हि कारणम् ॥१०॥
दोहा--अग्निहोत्र बिनु वेद नहिं, यज्ञ क्रिया बिनु दान ।
भाव बिना नहिं सिद्धि है, सबमें भाव प्रधान ॥१०॥
बिना अग्निहोत्र के वेदपाठ व्यर्थ है और दान के बिना यज्ञादि कर्म व्यर्थ हैं । भाव के बिना सिद्धि नहीं प्राप्त होती इसलिए भाव ही प्रधान है ॥१०॥
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम् ॥११॥
दोहा--देव न काठ पाषाणमृत, मूर्ती में न रहाय ।
भाव तहाँही देवथल, कारन भाव कहाय ॥११॥
देवता न काठ में, न पत्थर में और न मिट्टी ही में रहते हैं वे तो रहते हैं भाव में । इससे यह निष्कर्ष निकला कि भाव ही सबका कारण है ॥११॥
काष्ठ-पाषाण-धातूनां कृत्वा भावेन सेवनम् ।
श्रद्धया च तया सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः ॥१२॥
दोहा--धातु काठ पाषाण का, करु सेवन युत भाव ।
श्रद्धा से भगवत्कृपा, तैसे तेहि सिद्धि आव ॥१२॥
काठ, पाषाण तथा धातु की भी श्रद्धापूर्वक सेवा करने से और भगवत्कृपा से सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१२॥
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न तृष्णया परो व्याधिर्न च धर्मो दया परः ॥१३॥