चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ५७
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् ।
भोजने चाऽमृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ॥७॥
दोहा--वारि अजीरण औषधी, जीरण में बलवान ।
भोजन के संग अमृत है, भोजनान्त विषपान ॥७॥
जब तक कि भोजन पच न जाय, इस बीच में पिया हुआ पानी विष है और वही पानी भोजन पच जाने के बाद पीने से अमृत के समान हो जाता है । भोजन करते समय जल अमृत और उसके पश्चात् विषका काम करता है ॥७॥
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः ।
हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः ॥८॥
दोहा--ज्ञान क्रिया बिन नष्ट है, नर जो नष्ट अज्ञान ।
बिन नायक जसु सैनहू, त्यों पति बिनु तिय जान ॥८॥
वह ज्ञान व्यर्थ है कि जिसके अनुसार आचरण न हो और उस मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ है कि जिसे ज्ञान प्राप्त न हो । जिस सेना का कोई सेनापति न हो वह सेना व्यर्थ है और जिसके पति न हो वे स्त्रियाँ व्यर्थ हैं ॥८॥
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनम् ।
भोजनं च पराधीनं त्रयः पुंसां विडम्बनाः ॥६॥
दोहा--वृद्ध समय जो मरु तिया, बन्धु हाथ धन जाय ।
पराधीन भोजन मिलै, अहै तीन दुखदाय ॥९॥
बुढ़ौती में स्त्री का मरना, निजी धन का बन्धुओं के हाथ में चला जाना और पराधीन जीविका रहना, ये पुरुषों के लिए अभाग्य की बात है ॥९॥