चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ | चाणक्यनीतिदर्पणः
जीवाः स्थावरजङ्गमाश्च सकला संजीव्य भूमण्डलम् ।
भूयः पश्य तदेवकोटिगुणितंगच्छत्वमम्भोनिधिम् ॥४॥
दोहा--गुणिहिं न औरहिं देइ धन, लखिय जलद धन खाय ।
मधुर कोटि गुण करि जगत, जीवन जलनिधि जाय ॥४॥
हे मतिमान् ! गुणियों को धन दो औरों को कभी मत दो । समुद्र से मेघ के मुख में प्राप्त होकर जल सदा मधुर हो जाता है और पृथिवी पर चर-अचर सब जीवों को जिला कर फिर वही जल कोटि गुण होकर उसी समुद्र में चला जाता है ॥४॥
चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः ॥५॥
दोहा—एक सहस्र चाण्डाल सम, यवन नीच इक होय ।
तत्त्वदर्शी कह यवन ते, नीच और नहिं कोय ॥५॥
तत्त्वदर्शी विद्वानों की राय है कि सहस्रों चाण्डालों के इतना नीच एक यवन होता है । यवन से बढ़कर नीच कोई नहीं होता ॥५॥
तैलाभ्यङ्गे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि ।
तावद् भवति चाण्डालो यावत्स्नानं न चाचरेत् ॥६॥
दोहा--चिताधूम तनुतेल लगि, मैथुन क्षौर बनाय ।
तब लौं है चण्डाल सम, जबलौं नाहिं नहाय ॥६॥
तेल लगाने पर, स्त्री प्रसंग करने के बाद और चिता का धुआँ लग जाने पर मनुष्य जब तक स्नान नहीं करता तब तक चाण्डाल रहता है ॥६॥