भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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६२ चाणक्यनीतिदर्पणः

दोहा—जज्ञहीन राज्यही दहत, दानहीन यजमान । मन्त्रहीन ऋत्विजन कहँ, क्रतुसम रिपु नहिं आन ॥२३॥

अन्नरहित यज्ञ देश का, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विजों का और दान विहीन यज्ञ यजमान का नाश कर देता है । यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं है ॥२३॥

इति चाणक्येऽष्टमोऽध्यायः ॥८॥


अथ नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात ! विषयान् विषवत्त्यज । क्षमाऽऽर्जवं दया शौचं सत्यं पीयूषवत्पिब ॥१॥

सो०—मुक्ति चहौ जो तात ! विषय । तजहु विष सरिस । दयाशील सब बात, शौच सरलता क्षमा गहु ॥१॥

हे भाई ! यदि तुम मुक्ति चाहते हो विषयों को विष के समान समझ कर त्याग दो और क्षमा, ऋजुता (कोमलता), दया और पवित्रता इनको अमृत की तरह पी जाओ ॥१॥

परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः । त एव विलयं यान्ति बल्मीकोदरसर्पवत् ॥२॥

दोहा—नीच अधम नर भाषते, मर्म परस्पर आप । ते विलाय जै हैं यथा, संधि विमवट को साँप ॥२॥

जो लोग आपस के भेद की बात बतला देते हैं वे नराधम उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे बाँबी के भीतर घुसा साँप ॥२॥