चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ५१
बाहुवीर्यबलं राज्ञो ब्रह्मणां ब्रह्मवित्बली । रूप-यौवन-माधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम् ॥११॥
दोध--नृपहिं बाहुबल ब्राह्मणहिं, वेद ब्रह्म की जान । तिय बल मधुरता कह्यो, रूप शील गुणवान ॥११॥
राजाओं में बाहुबल सम्पन्न राजा और ब्राह्मणों में ब्रह्म-ज्ञानी ब्राह्मण बली होता है और रूप तथा यौवन की मधुरता स्त्रियों का सबसे उत्तम बल है ॥११॥
नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् । छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥१२॥
दोहा--अतिहि सरल नहिं होइये, देखहु जा बनमाहिं । तरु सीधे छेदत तिनहिं, बाँके तरु रहि जाहिं ॥१२॥
अधिक सीधा-साधा होना भी अच्छा नहीं होता । जाकर बन में देखो--वहाँ सीधे वृक्ष काट लिये जाते हैं और टेढ़े खड़े रह जाते हैं ॥१२॥
यत्रोदकस्तत्र वसन्ति हंसा- स्तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति । न हंसतुल्येन नरेण भाव्यं पुनस्त्यजन्तः पुनराश्रयन्तः ॥ १३ ॥
दोहा--सजल सरोवर हंस बसि, सूखत उड़िहैं सोउ । देखि सजल आवत बहुरि, हंस समान न होउ ॥१३॥
जहाँ जल रहता है वहाँ ही हंस बसते हैं । वैसे ही सूखे