चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ चाणक्यनीतिदर्पण।
सरोवरको छोड़ते हैं और बार-बार आश्रय कर लेते हैं । सो मनुष्य को हंस के समान न होना चाहिये ।
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम् ॥१४॥
दोहा---धन संग्रहको पेखिये, प्रगट दान प्रतिपाल । जो मोरी जल जानकूँ, तब नहिं फूटत ताल ॥१४॥
अर्जित धन का व्यय करना ही रक्षा है । जैसे नये जल आने पर तड़ाग के भीतर के जल को निकालना ही रक्षा है ॥१४॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाःस पुमाँल्लोके यस्यार्थाः सच जीवति ॥१५॥
दोहा---जिनके धन तेहि मीत बहु, जेहि धन बन्धु अनन्त । धन सोइ जग में पुरुषवर, सोई जन जीवन्त ॥१५॥
जिनके धन रहता है उसके मित्र होते हैं, जिसके पास अर्थ रहता है उसी के बंधु होते हैं । जिसके धन रहता है वही पुरुष गिना जाता है, जिसके अर्थ है वही जीता है ॥१५॥
स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे । दानप्रसंगो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च ॥ १६ ॥
दोहा---स्वर्गवासि जन के सदा, चार चिह्न लखि येहि । देव विप्र पूजा मधुर, वाक्य दान करि देहि ॥१६॥