चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
* श्रीः *
चाणक्य-नीति-दर्पणः
भाषाटीका-सहितः
साहित्य-शास्त्र्युपाधिधारिणा—
पं० रामतेजपाण्डेयेन च संस्कृतः
तथा
पं० रामविहारी मिश्रेण संशोधितः
प्रकाशक—
ठाकुरप्रसाद एण्ड सन्स बुकसेलर
राजादरवाजा, वाराणसी।
सन् १९८२ ] \hfill
CC-0. Swami Atmanand Giri (Prabhuji) . Veda Nidhi Varanasi. Digitized by eGangotri
* श्रीगणेशाय नमः *
चाणक्यनीतिदर्पणः
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥१॥
दोहा—सुमति बढ़ावन सबहि जन, पावन नीति प्रकास ।
टीका चाणकनीति कर, भनत भवानीदास ॥ १ ॥
मैं उन विष्णु भगवान्को प्रणाम करके कि जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, अनेक शास्त्रों से उद्धृत राजनीति-समुच्चय विषयक बातें कहूँगा ॥ १ ॥
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।
धर्मोपदेशं विख्यातं कार्याऽकार्य शुभाऽशुभम् ॥२॥
दोहा—तत्व सहित पढ़ि शास्त्र यह, नर जानत सब बात ।
काज अकाज शुभाशुभहिं, मरम नीति विख्यात ॥२॥
इस नीति के विषय को शास्त्र के अनुसार अध्ययन करके सज्जन धर्मशास्त्र में कहे शुभाशुभ कार्यको जान लेते हैं ॥२॥
तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥३॥
४ चाणक्यनीतिदर्पणः
दोहा—मैं सोइ अब बरनन करूँ, अति हितकारक अङ्ग । जाके जानत होहिं जन, सबही विधि सर्वज्ञ ॥ ३ ॥
लोगों की भलाई के लिए मैं वह बात बताऊँगा कि जिसे समझ लेने से मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ॥ ३ ॥
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च ।
दुःखिते सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥ ४ ॥
दोहा--उपदेशत शिपमूढ़ कहँ, व्यभिचारिणि ढिग वास ।
अरि को करत विश्वास उर, विदुषहु लहत विनास ॥४॥
मूर्खशिष्य को उपदेश देनेसे, कर्कशा स्त्री का भरण-पोषण करने से और दुखियों का सम्पर्क रखने से समझदार मनुष्य को भी दुःखी होना पड़ता है ॥ ४ ॥
दुष्टाभार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ ५ ॥
दोहा—भामिनि दुष्टा मित्र शठ, प्रति उत्तरदा भृत्य ।
अहि युत बसत अगार में, सब विधि मरिबो सत्य ॥५॥
जिस मनुष्य की स्त्री दुष्टा है, नौकर उत्तर देनेवाला (मुँह लगा) है और जिस घर में साँप रहता है उस घरमें जो रह रहा है तो निश्चय है कि किसी न किसी रोज उसकी मौत होगी ही ॥५॥
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ६ ॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ५
दोहा—धन गहि राखहु विपति हित, धनं ते वनिता धीर ।
तजि वनिता धनकूँ तुरत, सबते राख शरीर ॥ ६ ॥
आपत्तिकाल के लिए धनको और धन से भी बढ़कर स्त्री की रक्षा करनी चाहिये । किन्तु स्त्री और धन से भी बढ़कर अपनी रक्षा करनी उचित है ॥ ६ ॥
आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमंतश्च किमापदः ।
काचिच्चलिता लक्ष्मीः संचितोऽपिविनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा—आपद् हित धन रखिये, धनिहिं आपदा कौन ।
संचितहूं नशि जात है, जो लक्ष्मी करु गौन ॥ ७ ॥
आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिये । इस पर यह प्रश्न होता है कि श्रीमान् के पास आपत्ति आयेगी ही क्यों ? उत्तर देते हैं कि कोई ऐसा समय भी आ जाता है, जब लक्ष्मी रानी भी चल देती हैं । फिर प्रश्न होता है कि लक्ष्मी के चले जानेपर जो कुछ बचा बचाया धन है, वह भी चला जायगा ही ॥ ७ ॥
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवः ।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ॥ ८ ॥
दोहा—जहाँ न आदर जीविका, नहिं प्रिय बन्धु निवास ।
नहिं विद्या जिस देश में, करहु न दिन इक वास ॥ ८ ॥
जिस देश में न सम्मान हो, न रोजी हो, न कोई भाई-बन्धु हो और न विद्या का ही आगम हो, वहाँ निवास नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥
६ चाणक्यनीतिदर्पण।
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥६॥
दोहा—धनिक वेदप्रिय भूप अरु, नदी वैद्य पुनि सोय ।
बसहु नाहिं इक दिवस तहँ, जहँ यह पञ्च न होय ॥९॥
धनी (महाजन) वेदपाठी ब्राह्मण, राजा, नदी और पाँचवें वैद्य, ये पाँच जहाँ न हों, वहाँ एक दिन भी न बसो ॥ ९ ॥
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र सङ्गतिम् ॥१०॥
दोहा—दानदक्षता लाज भय, यात्रा लोक न जान ।
पाँच नहीं जहँ देखिये, तहाँ न बसहु सुजान ॥ १० ॥
जिसमें रोजी, भय, लज्जा, उदारता और त्यागशीलता, ये पाँच गुण विद्यमान नहीं, ऐसे मनुष्य से मित्रता नहीं करनी चाहिये ॥ १० ॥
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।
मित्रं चापत्तिकोले तु भार्यां च विभवक्षये ॥११॥
दोहा—काज भृत्य कूँ जानिये, बन्धु परम दुख होय ।
मित्र परखियतु विपति में विभव विनाशित जोय ॥११॥
सेवा कार्य उपस्थित होने पर सेवकों की, आपत्तिकाल में मित्र की, दुःख में, बान्धवों की और धन के नष्ट हो जाने पर स्त्री की परीक्षा की जाती है ॥ ११ ॥
चाणक्यनीतिदर्पणः
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥१२॥ दोहा—दुख आतुर दुरभिक्ष में, अरि जय कलह अभङ्ग । भूपति भवन मसान में, बन्धु सोई रहे सङ्ग ॥१२॥ जो बीमारी में, दुख में, दुर्भिक्ष में, शत्रु द्वारा किसी प्रकार का सङ्कट उपस्थित होनेपर, राजद्वार में और श्मशान पर जो ठीक समय पर पहुँचता है, वही बान्धव कहलाने का अधिकारी है॥१२॥
यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवं परिषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेवहि ॥१३॥ दोहा—ध्रुव कूँ तजि अध्रुव गहै, चित्तमैं अति सुख चाहि । ध्रुव तिनके नाशत तुरत, अध्रुव नष्ट ह्वै जाहि ॥१३॥ जो मनुष्य निश्चित वस्तु को छोड़कर अनिश्चित की ओर दौड़ता है तो उसकी निश्चित वस्तु भी नष्ट हो जाती है और अनिश्चित तो मनो पहले ही नष्ट थी ॥१३॥
वरयेत्कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् । रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥१४॥ दोहा—कुल जातीय विरूप दोउ, चतुर वर करि चाह । रूपवती तउ नीच तजि, समकुल करिय विवाह ॥१४॥ समझदार मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह कुरुपा भी कुलवती कन्या के साथ विवाह कर ले, पर नीच सुरूपवती के साथ न करे ।
८ चाणक्यनीतिदर्पणः
क्योंकि विवाह अपने समान कुल में ही अच्छा होता है ॥१४॥
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा । विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषुराजकुलेषु च ॥१५॥
दोहा—सरिता शृङ्गी शस्त्र अरु, जिव जितने नखवन्त । तियको नृपकुलको तथा, करहिं विश्वास न सन्त ॥१५॥
नदियों का, शस्त्रधारियों का, बड़े-बड़े नखवाले जन्तुओं का, सींगवालों का, स्त्रियों का और राजकुल के लोगों का विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम् । नीचादप्युत्तमां विद्यां स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥१६॥
दोहा—गहु सुधा विषते कनक, मलते बहुकरि यत्न । नी... विद्या विमल, दुष्कुलते तियरत्न ॥१६॥
विष से भी अमृत, अपवित्र स्थान से भी कञ्चन, नीच मनुष्य से भी उत्तम विद्या और दुष्कुल से भी स्त्रीरत्न को ले लेना चाहिए ॥ १६ ॥
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा । साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥१७॥
दोहा—तिय अहार देखिय द्विगुण, लाज चतुरगुन जान । षटगुन तेहि व्यवसाय तिय, काम अष्टगुन मान ॥१७॥
स्त्रियों में पुरुषकी अपेक्षा दूना आहार चौगुनी लज्जा छगुना
चाणक्यनीतिदर्पण : ९
साहस और अठगुना काम का वेग रहता है ॥ १७ ॥
इति चाणक्यनीतिदर्पणे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
—:०:—
अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता ।
अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥१॥
दोहा—
अनृत साहस मूढ़ता, कपटरु कृतघन आइ ।
निर्दयतारु मलीनता, तियमें सहज रजाइ ॥ १ ॥
झूठ बोलना, एकाएक कोई काम कर बैठना, नखरे करना, मूर्खता करना, ज्यादा लालच रखना, अपवित्र रहना और निर्दयता का बर्ताव करना ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं ॥ १ ॥
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना ।
विभवो दानशक्तिश्च नाऽल्पस्य तपसः फलम् ॥२॥
दोहा—
सुन्दर भोजन शक्ति रति, शक्ति सदा वर नारि ।
विभव दान की शक्ति यह, बड़ तपफल सुखकारि ॥२॥
भोज्य पदार्थों का उपलब्ध होते रहना, भोजन की शक्ति विद्यमान रहना (अर्थात् स्वास्थ्य में किसी तरह की खराबी न रहना) रतिशक्ति बनी रहना, सुन्दरी स्त्री का मिलना, इच्छानुकूल धन रहना और साथ ही दानशक्तिका भी रहना, ये बातें होना साधारण तपस्या का फल नहीं है । जो अखण्ड तपस्य किये रहता है । उसको ये चीजें उपलब्ध होती हैं ॥ २ ॥
१० चाणक्यनीतिदर्पणः
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी । विभवे यश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ॥३॥ दोहा--सुत आज्ञाकारी जिनहिं, अनुगामिनि तिय जान । विभव अल्प सन्तोष तेहि, सुर पुर इहाँ पिछान ॥३॥ जिसका पुत्र अपने वश में हो, स्त्री आज्ञाकारिणी हो और जो प्राप्त धन से सन्तुष्ट है, उसके लिये यहाँ ही स्वर्ग है ॥ ३ ॥
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः । तन्मित्रंयत्रविश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः ॥४॥ दोहा—ते सुत जे पितु भक्तिरत, हितकारक पितु होय । जेहि विश्वास सो मित्रवर, सुखदायक तिय होय ॥ ४ ॥ वे ही पुत्र, पुत्र हैं जो पिताके भक्त हैं। वही पिता, पिता है, जो अपनी सन्तानका उचित रीति से पालन पोषण करता है। वही मित्र, मित्र है कि जिसपर अपना विश्वास है और वही स्त्री स्त्री है कि जहाँ हृदय आनन्दित होता है ॥ ४ ॥
परोक्षे कार्य्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्ज्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भम्पयोमुखम् ॥५॥ दोहा—ओट कार्य की हानि करि, सम्मुख करै बखान । अस मित्रन कहँ दूर तज, विष घट पयमुख जान ॥ ५ ॥ जो पीठ पीछे अपना काम बिगाड़ता हो और मुँहपर मीठी-मीठी बातें करता हो ऐसे मित्र को त्याग देना चाहिए । वह
चाणक्यनीतिदर्पणः । १४
वैसे ही है जैसे किसी घड़े में गले तक विष भरा हो, किन्तु मुँह पर थोड़ा सा दूध डाल दिया गया हो ॥५॥
न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रं चापि न विश्वसेत् ।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत् ॥६॥
दोहा—नहिं विश्वास कुमित्र कर, कीजिय मित्तहु कौन ।
कहहि मित्त कहुँ कोपकरि, गोपहु सब दुख मौन ॥६॥
(अपनी किसी गुप्त बात के विषय में) कुमित्र पर तो किसी तरह विश्वास न करे और मित्र पर भी न करे। क्योंकि हो सकता है कि वह मित्र कभी बिगड़ जाय और सारे गुप्त भेद खोल दे ॥६॥
मनसा चिन्तितं कार्यं वचसा न प्रकाशयेत् ।
मंत्रेण रक्षयेद्गूढं कार्ये चापि नियोजयेत् ॥७॥
दोहा—मनते चिंतित काज जो, बैनन ते कहियेन ।
मन्त्र गूढ़ राखिय कहिय, दोष काज सुखदैन ॥७॥
जो बात मनमें सोचे, वह वचन से प्रकाशित न करे। उस गुप्त बात की मन्त्रणा द्वारा रक्षा करे और गुप्त ढंग से ही उसे काम में भी लावे ॥७॥
कष्टञ्च खलु मूर्खत्वं कष्टं च खलुयौवनम् ।
कष्टात् कष्टतरं चैव परगेहे निवासनम् ॥८॥
दोहा—मूरखता अरु तरुणता, हैं दोऊ दुखदाय ।
पर घर बसिबो कष्ट अति, नीति कहत अस गाय ॥८॥
१२ | चाणक्यनीतिदर्पणः
पहला कष्ट तो मूर्ख होना है, दूसरा कष्ट है जवानी और सब कष्टों से बढ़कर कष्ट है, पराये घर में रहना ॥८॥
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
साधवो नहि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ॥९॥
दोहा—प्रतिगिरि नहिं माणिक गनिय, मौक्ति न प्रतिगज माहिं ।
सभी ठौर नहिं साधु जन, बन बन चन्दन नाहिं ॥९॥
हर एक पहाड़ पर माणिक नहीं होता, सब हाथियों के मस्तक में मुक्ता नहीं होता, सज्जन सर्वत्र नहीं होते और चन्दन सब जंगलों में नहीं होता ॥९॥
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः ।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः ॥१०॥
दोहा—चातुरता सुतकू सुपितु, सिखवत बारहिं बार ।
नीतिमन्त बुधवन्त को, पूजत सब संसार ॥१०॥
समझदार मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने पुत्रों को विविध प्रकार के शील की शिक्षा दे । क्योंकि नीति को जानने वाले और शीलवान् पुत्र अपने कुल में पूजित होते हैं ॥१०॥
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥११॥
दोहा—तात मात अरि तुल्यते, सुत न पढ़ावत नीच ।
सभा मध्य शोभत न सो, जिमि बक हंसन बीच ॥११॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १३
जो माता अपने बेटे को पढ़ाती नहीं, वह शत्रु है । उसी तरह पुत्र को न पढ़ानेवाला पिता पुत्र का बैरी है । क्योंकि (इस तरह माता-पिता की ना समझी से वह पुत्र) सभा में उसी तरह शोभित नहीं होता, जैसे हंसों के बीच में बगुला ॥११॥
लालनाद् बहवो दोषास्ताडनात् बहवो गुणाः ।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्नतुलालयेत् ॥१२॥
दोहा—सुत लालन में दोष बहु, गुण ताड़न ही माहिं ।
तेहि ते सुत अरु शिष्य कूँ, ताड़िय लालिय नाहिं॥१२॥
बच्चों का दुलार करने में दोष है और ताड़न करने में बहुत से गुण हैं । इसलिए पुत्र और शिष्य को ताड़ना अधिक दे, दुलार न करे ॥१२॥
श्लोकेन वा तदर्द्धेन तदर्द्धाऽर्द्धाक्षरेण वा ।
अवन्ध्यं दिवस कुर्याद्दानाध्ययनकर्मभिः ॥१३॥
दोहा—सीखत श्लोकहु अरध कै, पावहु अक्षर कोय ।
वृथा गमावत दिवस ना, शुभ चाहत निज सोय ॥१३॥
किसी एक श्लोक या उसके आधे-आधे भाग या आधे के भी आधे भाग का मनन करे । क्योंकि भारतीय महर्षियों का कहना यही है कि जैसे भी हो दान, अध्ययन ( स्वाध्याय ) आदि सब कर्म करके बीतते हुए दिनों को सार्थक करो, इन्हें यों ही न गुजर न जाने दो ॥१३॥
१४ चाणक्यनीतिदर्पणः
कान्ता-वियोगः स्वजनापमानो ।
रणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा ॥
दरिद्रभावो विषमा सभा च ।
विनाग्निना ते प्रदहन्ति कायम् ॥१४॥
दोहा—युद्ध शेष प्यारी विरह, दरिद बन्धु अपमान ।
दुष्टराज खलकी सभा, दाहत बिनहिं कृशान ॥१४॥
स्त्री का वियोग, अपने जनों द्वारा अपमान, युद्ध में बचा हुआ शत्रु, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और स्वार्थिंयों की सभा, ये बातें अग्नि के बिना ही शरीर को जला डालती हैं ॥१४॥
नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी ।
मंत्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम् ॥१५॥
दोहा—तरुवर सरिता तीरपर, निपट निरंकुश नारि ।
नरपति हीन सलाह नित, विनसत लगे न बारि ॥१५॥
नदी के तट पर लगे वृक्ष, पराये घर रहनेवाली स्त्री, बिना मंत्री का राजा, ये शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥१५॥
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा ।
बलंवित्तञ्च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्य्यिका ॥१६॥
दोहा—विद्या बल है विप्रको, राजा को बल सैन ।
धन वैश्यन बल शूद्रको, सेवा ही बलदैन ॥१६॥
ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है,
चाणक्यनीतिदर्पणः १५
वैश्यों का बल धन है और शूद्रों का बल द्विजाति की सेवा है।१६।
निर्द्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत् ।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वाचाभ्यागतोगृहम् ॥१७॥
दोहा—वेश्या निर्धन पुरुष को, प्रजा पराजित राय।
तजहिं पखेरू निष्फल तरु, खाय अतिथि चल जाय।१७।
धनविहीन पुरुष को वेश्या, शक्तिहीन राजा को प्रजा, जिसका फल झड़ गया है, ऐसे वृक्ष को पक्षी त्याग देते हैं और भोजन कर लेने के बाद अतिथि उस घर को छोड़ देता है।१७।
गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम् ।
प्राप्तविद्यागुरुंशिष्योदग्धारण्यंमृगास्तथा ॥१८॥
दोहा---लेइ दक्षिणा यजमान को, तजि दे ब्राह्मण वर्ग।
पढ़ि शिष्यन गुरु को तजहिं, हरिन दग्ध बन पर्व ॥१८॥
ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान को छोड़ देते हैं। विद्या प्राप्त कर लेने के बाद विद्यार्थी गुरु को छोड़ देता है और जले हुए जंगल को बनैले जीव त्याग देते हैं ॥ १८ ॥
दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्रीक्रियते पुम्भिर्नरःशीघ्रं विनश्यति ॥१९॥
दोहा--पाप दृष्टि दुर्जन दुराचारी दुर्बस जोय।
जेहि नर सों मैत्री करत, अवशि नष्ट सो होय ॥१९॥
दुराचारी, व्यभिचारी, दूषित स्थान के निवासी, इन तीन
१६ चाणक्यनीतिदर्पण।
प्रकार के मनुष्यों से जो मनुष्य मित्रता करता है, उसका बहुत जल्दी विनाश हो जाता है ॥ १९ ॥
समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते । वाणिज्यंव्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे ॥२०॥
दोहा--सम सों सोहत मित्रता, नृप सेवा सुसोहात । बनियाई व्यवहार में, सुन्दरि भवन सुहात ॥२०॥
बराबरवाले के साथ मित्रता भली मालूम होती है । राजा की सेवा अच्छी लगती है व्यवहार में बनियापन भला लगता है और घर के अन्दर स्त्री भली मालूम होती है ॥ २० ॥
इति चाणक्य नीतिदर्पणे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना के न पीडितः । व्यसनं केन संप्राप्तं कस्य सौख्यंनिरन्तरम् ॥१॥
दोहा—केहि कुल में दूषण नहीं, व्याधि न काहि सताय । कष्ट न भोग्यो कौन जन, सुखी सदा कोउ नाय ॥१॥
किसके कुल नहीं है ? कितने ऐसे प्राणी हैं जो किसी प्रकार के रोगी नहीं हैं ? कौन ऐसा जीव है कि हमेशा जिसे सुख ही सुख मिल रहा है ? ॥ १ ॥
२ चाणक्यनीतिदर्पणः १७
आचारःकुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम् । सम्भ्रमः स्नेहमाख्यातिवपुराख्याति भोजनम् ॥२॥
दोहा—महत कुलहिं आचार भल, भाषन देश बताय । आदर प्रीति जनावहि, भोजन देहू मुटाय ॥२॥
मनुष्य का आचरण उसके कुल को बता देता है, उसका भाषण देश का पता दे देता है, उसका आदर भाव प्रेम का परिचय दे देता है और शरीर भोजनका हाल कह देता है ॥२॥
सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत् । व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत् ॥३॥
दोहा—कन्या व्याहिय उच्च कुल, पुत्रहिं शास्त्र पढ़ाय । शत्रुहिं दुख दीजै सदा, मित्रहिं धर्म सिखाय ॥३॥
मनुष्य का कर्त्तव्य है कि अपनी कन्या किसी अच्छे खान-दान वाले को दे । पुत्र को विद्याभ्यास में लगा दे । शत्रु को विपत्ति में फँसा दे और मित्र को धर्मकार्य में लगा दे ॥३॥
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः । सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ॥४॥
दोहा—खलहु सर्प इन दुहुन में, भलो सर्प खल नाहिं । सर्प दशत है काल में, खलजन पद पद माहिं ॥ ४॥
दुर्जन और साँप इन दोनों में, दुर्जन की अपेक्षा साँप कहीं अच्छा है । क्योंकि साँप समय पाकर एक ही बार काटता है और दुर्जन पद पद पर काटता रहता है ॥ ४ ॥
१८ | चाणक्यनीतिदर्पणः
एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् ।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम् ॥५॥
दोहा—भूप कुलीनन्ह को कर, संग्रह याही हेत ।
आदि मध्य और अन्त में, नृपहि न ते तजि देत ॥ ५ ॥
राजा लोग कुलीन पुरुषों को अपने पास इसलिए रखते हैं कि जो आदि मध्य और अन्त किसी समय भी राजा को नहीं छोड़ते ॥ ५ ॥
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥६॥
दोहा—मर्यादा सागर तजे, प्रलय होन के काल ।
उत साधू छोड़े नहीं, सदा आपनी चाल ॥ ६ ॥
समुद्र तो प्रलयकाल में अपनी मर्यादा भी भंग कर देते हैं ( उमड़ कर सारे संसार को डुबो देते हैं ) । पर सज्जन लोग प्रलयकाल में भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हैं ॥६॥
मूर्खस्तु परिहर्त्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।
भिद्यते वाक्यशूलेन अदृश्यं कण्टकं यथा ॥७॥
दोहा—मूरख को तजि दीजिये, प्रकट द्विपद पशु जान ।
वचन शल्यते वेधहीं, अङ्गहिं काँट समान ॥ ७ ॥
मूर्ख को दो पैरवाला पशु समझ कर उसे त्याग ही देना चाहिए । क्योंकि यह समय-समय पर अपने वाक्यरूपी शूल
चाणक्यनीतिदर्पणः १९
से उसी तरह वेधता है जैसे न दिखायी पड़ता हुआ काँटा चुभ जाता है ॥७॥
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥८॥
दोहा—संयुत जीवन रूपते, कहिये बड़े कुलीन ।
विद्या बिन शोभत नहीं, पुहुप गंध ते हीन ॥८॥
रूप और यौवन से युक्त, विशाल कुल में उत्पन्न होता हुआ भी विद्याविहीन मनुष्य उसी प्रकार अच्छा नहीं लगता, जैसे सुगन्धित रहित पलास का फूल ॥८॥
कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम् ।
विद्यारूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ॥९॥
दोहा—रूप कोकिला रव तियन, पतिव्रत रूप अनूप ।
विद्यारूप कुरूप को, क्षमा तपस्वी रूप ॥९॥
कोयल का सौन्दर्य उसकी बोली, स्त्री का सौन्दर्य है उसका पातिव्रत । कुरूप का सौन्दर्य है उसकी विद्या और तपस्वियों का सौन्दर्य है उनकी क्षमाशक्ति ॥९॥
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥१०॥
दोहा—कुलहित त्यागिय एककूँ, गृहहु छाड़ि कुल ग्राम ।
जनपद हित ग्रामहि तजिय, तनहित अवनि तमाम ॥१०॥
२० चाणक्यनीतिदर्पणः
जहाँ एक के त्यागने से कुल की रक्षा हो सकती हो, वहाँ एक को त्याग दे । यदि कुल के त्यागने से गाँव की रक्षा होती हो तो उस कुल को त्याग दे । यदि उस गाँव के त्यागने से जिले की रक्षा हो तो गाँव को त्याग दे और यदि पृथ्वी के त्यागने से आत्मरक्षा सम्भव हो तो उस पृथिवी को ही त्याग दे ॥१०॥
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम् ।
मौनेनकलहोनास्ति नास्ति जागरितो भयम् ॥११॥
दोहा--नहिं दारिद उद्योग पर, जपते पातक नाहिं ।
कलह रहे ना मौन में, नहिं भय जागत माहिं ॥११॥
उद्योग करने पर दरिद्रता नहीं रह सकती । ईश्वर का बार-बार स्मरण करते रहने पर पाप नहीं हो सकता । चुप रहने पर लड़ाई झगड़ा नहीं हो सकता और जागते हुए मनुष्य के पास भय नहीं टिक सकता ॥११॥
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेणः रावणः ।
अतिदानाद्बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत् ॥१२॥
दोहा-अति छवि ते सिय हरण भौ, नशि रावण अति गर्व ।
अतिहि दान ते बलि बँधे, अति तजिये थल सर्व ॥१२॥
अतिशय रूपवती होने के कारण सीता हरी गई । अतिशय गर्व से रावण का नाश हुआ । अतिशय दानी होने के कारण