चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१ टिप्पणी—(१) खानजहाँ—यह दिल्लीके तुगलकवंशीय सुल्तानोंकी ओरसे दी जाने वाली एक उपाधि थी। यहाँ खानजहाँसे तात्पर्य खानजहाँ मक़बूलसे है, जिन्हें खाने-आज़म और कवाम-उल-मुल्ककी भी उपाधि प्राप्त थी। वे मूलतः तेलंगानाके निवासी ब्राह्मण थे और उनका नाम कन्नू था। मुसलमान हो जानेपर वे सुल्तान मुहम्मद तुगलकके कृपापात्र बने। निरक्षर होते हुए भी वे अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि थे। मुहम्मद तुगलक उनका अत्यन्त सम्मान करता था। फीरोज तुगलक ने उन्हें अपना वज़ीर नियुक्त किया। वे फीरोजशाहके इतने विश्वास- पात्र थे कि जब कभी वह राजधानीसे बाहर रहता उस समय वे ही उसका प्रतिनिधित्व करते थे। वे अत्यन्त धार्मिक, प्रभावोत्पादक और दीनबन्धु थे। सुप्रसिद्ध इतिहासकार अफ़ीफ़ने उनके जीवन चरित और उनके कार्योंका बड़े विस्तारसे वर्णन किया है। उसका कहना है कि ख़ॉनजहाँ मक़बूल चिश्ती सन्त नसीरुद्दीन महमूद अवधीके मुरीद (भक्त) थे। ७७२ हिजरी (१३७४ ई ) में उनकी मृत्यु हुई। १२ ( बम्बई १ ) ऐजन; बहु, पी मदहे खानजहाँ दर बाबे अदल व इन्साफ ( बहो खानजहाँकी प्रशंसा और उसके न्यायकी चर्चा ) एक खम्भ मेदिनि कहँ कीन्हा। डोल परै जो होत न दीन्हा ॥१ एकै पैरैं लोग चढ़ावइ। कर गुन खीचि तीर लइ लावइ ॥२ हिन्दू तुरुक दुहूँ सम राखै। सत जो होइ दुहुन्ह कहँ भाखै ॥३ गउव सिंह एक पन्थ रँगावइ। एक घाट दुहुँ पानि पियावइ ॥४ एक दीठि देखइ सँसारू। अधल न चलै चलै बेवहारू ॥५ मेरु धरनि जस भारन, सग मारन संस्यार ॥६ खानजहानहु कौन बड़ाई, बड़ जो कीन्हि करतार ॥७ टिप्पणी—(४) गउव—गौ गाय। वासुदेवशरण अग्रवालकी धारणा है कि यह सम्भवतः (रा ) गवय (नील गाय)का रूप है। जंगलमें नील गाय और शेरका मिलना और एक ही मागपर साथ चलकर पानी पीना अधिक सम्भव है (पद्मावत, पृ १५)। किन्तु अवधी-भोजपुरी क्षेत्रोंमें गायके लिए ही गउव सामान्य और प्रचलित शब्द है।